टिप्पणी करे

ग़ज़ल:- कभी वफ़ाएँ कभी बेवफ़ाइयाँ देखीं-हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

कभी वफ़ाएँ कभी बेवफ़ाइयाँ देखीं
मैं उन बुतों की ग़रज़ आशनाईयाँ देखीं

हम उठ चले जो कभी उस गली को वहशत में
तो उस घड़ी न कुएँ और न खाइयाँ देखीं

जहे-नसीब हैं उस के के जिसने वस्ल की शब
गले में अपने वा नाज़ुक कलाइयाँ देखीं

से सतहे-ख़ाक है क्या रज़्म-गाह का मैदान
कि जिस पे होती हुई नित लड़ाइयाँ देखीं

गली में उस की ये बाज़ारे-मर्ग गर्म हुआ
कि दादख़्वाहों की वाँ चारपाइयाँ देखीं

रखा न ख़त कभी आरिज़ पे उस परीरू ने
बंरगे-आइया नित वाँ सफ़ाइयाँ देखीं

हुनूज़ जीते रहे हैं तो सख़्त-जानी से
वगरना हम ने भी क्या क्या जुदाइयाँ देखीं

न हाथ आई मिरे ‘मुसहफ़ी’ वो ज़ुल्फ़े-रसा
मैं तालओं की भी अपने रसाइयाँ देखीं

हज़रते-ग़ुलाम हमदानी मुसहफ़ी

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: