12 Comments

ग़ज़ल:- तड़प उठा, झुका, गिरा, ख़मोश लब सहार की-तुफ़ैल चतुर्वेदी

तड़प उठा, झुका, गिरा, ख़मोश लब सहार की
ये बात है हमारे दिल की बांके, तरहदार की

जो दिल में ज़ख़्म था तो दिल में ज़ख़्म था दिखाते क्या
अनापरस्त थे बहुत हँसी ही इश्तहार की

कहाँ तलक तिरा ख़याल भी रफ़ू करे, सो ख़ुद
कटी-फटी रिदा-ए-ज़िन्दगी थी तार-तार की

सरल नहीं था आंसुओं की तेज़ धार तैरना
बहुत बहाव था मगर नदी तो हमने पर की

हरेक नोके-ख़ार को लहू से रंग दे दिया
ख़ज़ां हमारी सम्त जब भी आई यूँ बहार की

लबों पे मुस्कुराहटों की कहकशां सजी रहे
ये साअतें हैं ज़िन्दगी पे ग़म के ऐतबार की

उलझ पड़े थे उनसे हम, ख़फ़ा हैं हमसे दिल बहुत
लड़ाई ठन गयी है अबके उस से आर-पार की

वो तुल गए हैं आज क़त्ल करके छोड़ेंगे मिरा
घडी क़रीब आ रही है मेरे इंकिसार की

जहाँ पे ‘मुसहफ़ी’ का सिलसिला था नूर बांटता
वहां पे आके मैंने सारी बज़्म शर्मसार की

वो एक शक्ल क्या दिखी जहाँ डगमगा गया
”ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

तुफ़ैल चतुर्वेदी 9711296239

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

12 comments on “ग़ज़ल:- तड़प उठा, झुका, गिरा, ख़मोश लब सहार की-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. क्या कहूं और क्या न कहूं ? ख़ाकसार की मामूली काविश को आप सबने हद से ज़ियादा नवाज़ा। शुक्रिया इस करम के लिए बहुत छोटा लफ्ज़ है। हदिया-ए-ख़ुलूस क़ुबूल फ़रमाइये

  2. दादा प्रणाम

    इस ज़मीन में ग़ज़ल कैसे कही जाती है , समझ में आ गया 🙂

    ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद !!!!

    .
    .
    .
    कहाँ तलक तिरा ख़याल भी रफ़ू करे, सो ख़ुद
    कटी-फटी रिदा-ए-ज़िन्दगी थी तार-तार की
    .
    .
    .
    अहा हा हा हा हा हा हा हा हा …. तार तार की …. ज़िंदाबाद

    हरेक नोके-ख़ार को लहू से रंग दे दिया
    ख़ज़ां हमारी सम्त जब भी आई यूँ बहार की

    लहू से रंग देना …क्या कहने वाह वाह वाह ….

    जो दिल में ज़ख़्म था तो दिल में ज़ख़्म था दिखाते क्या
    अनापरस्त थे बहुत हँसी ही इश्तहार की

    बला का शेर है दादा ….बल्कि बला का बब्बर शेर है

    वो एक शक्ल क्या दिखी जहाँ डगमगा गया
    ”ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

    कैसे तारीफ़ की जाए … तारीफ़ की भी कैसे जा सकती है…..

    नमन आदरणीय !!!!

  3. Zindabaad dada… kamaal ki ghazal hui hai… tamaam sher acche hue hain… waah….
    Pranam…

  4. तुफ़ैलसाहब, जो दिल में ज़ख़्म था तो दिल में ज़ख़्म था दिखाते क्या। क्‍या ख़ूब मिस्रा कहा है। आफ़रीन सद आफ़रीन। कहाँ तलक तिरा ख़याल भी रफ़ू करे, सो ख़ुद
    कटी-फटी रिदा-ए-ज़िन्दगी थी तार-तार की। क्‍ैसा अच्‍छा शै’र है.। षानदार ग़ज़ल। हज़ार दाद।

  5. Dada, apki ghazal, qabile daad. har sheir men apka tajriba bolta hai. wah, kya baat hai.
    “KAHAN TALAK TERA KHYAL BHI RAFOO KRE, SO KHUD
    KATI PHATI RIDAAYE ZINDAGI THI, TAR TAR KI.”

  6. Bade dada sadar pranam…kya hi umda ghazal hai dada..ek ek sher moti ki tarah chamak rha..daad qubule’n..sadar

  7. Kya achche ashaar nikale hain aapne ye “labon pe muskurahto ki kahkashan” ismein Sa’atein ka istemaal kya khoob hai…

  8. प्रणाम दादा
    बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है। ख़ास तौर पर ये शेर तो क़माल है
    जो दिल में ज़ख्म था तो……
    इसे संग लिए जा रही हूँ।
    दिन बनाने का शुक्रिया
    ढेर सारी दाद के साथ
    सादर
    पूजा

  9. इतनी जल्दी यूं तो मुझे यहाँ पर लौटना नहीं था पर ये कहने के लिए लौटा हूँ कि ये बात बहुत ग़लत है , गलत मतलब बहुत ज्यादा गलत ,सारे के सारे बेहतरीन खूबसूरत अलफ़ाज़ तो आप अपनी ग़ज़ल में पिरो लेते हैं, अब हम जैसे कमअक्ल इसकी तारीफ़ के लिए खूबसूरत अलफ़ाज़ कहाँ से लाएं ? बताइये तो गलत बात है कि नहीं ?

  10. Dada pranam
    kaise hain?

    Dada kya hi umda Gazal hui hai …ak ak sher laazwaab hai
    Matla sunane ke baad se hi Aapki is gazal ka arse se muntzir tha..
    padhkar lutf duuna ho gaya …

    तड़प उठा, झुका, गिरा, ख़मोश लब सहार की
    ये बात है हमारे दिल की बांके, तरहदार की ..kya hi shaandaar matla hai Dada…ahaa.

    कहाँ तलक तिरा ख़याल भी रफ़ू करे, सो ख़ुद
    कटी-फटी रिदा-ए-ज़िन्दगी थी तार-तार की .

    सरल नहीं था आंसुओं की तेज़ धार तैरना
    बहुत बहाव था मगर नदी तो हमने पर की..

    हरेक नोके-ख़ार को लहू से रंग दे दिया….
    ख़ज़ां हमारी सम्त जब भी आई यूँ बहार की…waahhhh waahh
    .
    जहाँ पे ‘मुसहफ़ी’ का सिलसिला था नूर बांटता
    वहां पे आके मैंने सारी बज़्म शर्मसार की

    वो एक शक्ल क्या दिखी जहाँ डगमगा गया
    ”ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

    Ahaaa…ahaa..
    .Bala ki khuubsoorat Gazal hai Dada ..sabhi ash-aar behad umda hain
    Gazal post karne ke liye tahe dil se shukria Dada
    aur is umda gazal ke liye
    dili daad qubool keejiye ..

    Pranam sahit

    ..

  11. प्रणाम गुरुदेव
    ग़ज़ल पढ़ कर निःशब्द हूँ।

    बहुत ख़ूब। आज का दिन बन गया।

  12. प्रभु आपके चरण कहाँ है ? थोड़ा होश में आलूँ फिर लौटता हूँ

    नीरज

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: