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ग़ज़ल:- तूफ़ान से बचना ही मुक़द्दर में नहीं था-शाहिद हसन ‘शाहिद ‘

तूफ़ान से बचना ही मुक़द्दर में नहीं था
हालांकि सफ़ीना मिरा साहिल के क़रीं था

गुलशन में नया रंग था हर बर्गो-शजर पर
पौधा मिरी उम्मीद ही का ज़ेरे-ज़मीं था

हर लम्हा हुआ जाता है अब बाइसे-उलझन
मेरी कभी ख़ुशहाली का ये वक़्त अमीं था

सुलझा लिया इस वास्ते हर पेच को तूने
क़िस्मत का मिरी ख़म, तेरी ज़ुल्फ़ों में नहीं था

दिल बाख़्ता कर पाया न यूँ गर्दिशे-दौराँ
हालात बदल जायेंगे कल , हमको यक़ीं था

टूटी हुई कश्ती से भी मिल जाएगा साहिल
‘शाहिद ‘ ये कभी ख़ाब में सोचा भी नहीं था

शाहिद हसन ‘शाहिद ‘ 09759698300

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7 comments on “ग़ज़ल:- तूफ़ान से बचना ही मुक़द्दर में नहीं था-शाहिद हसन ‘शाहिद ‘

  1. गुलशन में नया रंग था हर बर्गो-शजर पर
    पौधा मिरी उम्मीद ही का ज़ेरे-ज़मीं था

    वाह वाह क्या अच्छी ग़ज़ल हुई है , शाहिद साहब … बहुत बहुत मुबारकबाद …

  2. Achhi gazal hui hae shahid sahab
    Daad qubool karein
    Sadar
    Pooja

  3. Bahut achhii gazal hai SHahid hasan sahab.

    dili daad qubool keejiye

  4. bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye

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