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ग़ज़ल:- मिरा ये मलबा, मिरा ख़राबा तुम्हारी यादों से लड़ रहा है

मिरा ये मलबा, मिरा ख़राबा तुम्हारी यादों से लड़ रहा है
उसी की तामीर हो रही है, वो एक घर जो नहीं बचा है

पड़े हुए हैं जली-बुझी सिगरटों के टुकड़े हर इक जगह पर
और एक चेहरा शगुफ़्ता चेहरा तमाम घर में बसा हुआ है

लगा रही है मुझे सदायें हवा दरीचे से लड़ते लड़ते
मिरा ये कमरा, ख़मोश कमरा किसी की आहट से भर गया है

कहीं से साये भी आ गये हैं मुझे सुनाने कहानी अपनी
कोई फ़साना भी धीरे धीरे बुलंद मंज़र से हो रहा है

बुला रहीं हैं मुझे दुबारा उदासियों की हसीन वादी
किसी की यादों का सब्ज़ मौसम अभी भी ताज़ा बना हुआ है

जो रंग रोग़न बिखर रहे हैं तमाम घर में, अता है उसकी
बस एक आमद से उसकी वीराँ खंडर सा ये घर भी जी उठा है

दिनेश नायडू 09303985412

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4 comments on “ग़ज़ल:- मिरा ये मलबा, मिरा ख़राबा तुम्हारी यादों से लड़ रहा है

  1. लगा रही है मुझे सदायें हवा दरीचे से लड़ते लड़ते
    मिरा ये कमरा, ख़मोश कमरा किसी की आहट से भर गया

    Wahhhhh Wahhhhhh kya gazal hai bhaia
    dili daad kubul kijiye

  2. Dinesh ji
    Aapne udasi ke manzar ka kamaal khaka khincha hae. Neeraj ji ki baat se mein bhi sahmat huun….
    Waah waah…ke saath dher sari daad
    Sadar
    Pooja

  3. सुभान अल्लाह दिनेश, क्या जादू सा बिखेर दिया है भाई , ये कैसा तिलिस्म रच दिया है जिस से बाहर आने को मन ही नहीं कर रहा अहा हा हा वाह वाह वाह जियो भाई जियो। इस ग़ज़ल को अपने साथ लिए जाये बिना चैन नहीं आएगा।

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