9 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- नहीं है अरे ये बग़ावत नहीं है-नीरज गोस्वामी

नहीं है अरे ये बग़ावत नहीं है
हमें सर झुकाने की आदत नहीं है

छुपाये हुए हैं सभी लोग खंज़र
बज़ाहिर किसी से अदावत नहीं है

करूँ क्या परों का अगर इनसे मुझको
फ़लक़ नापने की इज़ाज़त नहीं है

उठा कर गिराना गिरा कर मिटाना
हमारे यहाँ की रिवायत नहीं है

तमाम उम्र जिनके लिये वक़्फ़ कर दी
वही कह रहे हैं मुहब्बत नहीं है

कभी ख़ुद से भी रंज रखते थे साहब
हमें अब किसी से शिकायत नहीं है

करोगे घटाओं का क्या यार ‘नीरज’
अगर भीग जाने की चाहत नहीं है

नीरज गोस्वामी 09860211911

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9 comments on “ग़ज़ल:- नहीं है अरे ये बग़ावत नहीं है-नीरज गोस्वामी

  1. Kya kehne Neeraj sir..bahut hi umdaa ghazal hai..sare sher khoob pasand aaye..daad qubule’n

  2. क्या कहने नीरज जी…. बहुत उम्दा….

  3. क्या अच्छी ग़ज़ल कही है नीरज जी आपने

    मतला तो बेइंतिहा खूबसूरत है

    तमाम उम्र जिनके लिये वक़्फ़ कर दी
    वही कह रहे हैं मुहब्बत नहीं है

    कभी ख़ुद से भी रंज रखते थे साहब
    हमें अब किसी से शिकायत नहीं है

    वाह वाह बहुत मुबारकबाद सर

  4. क्या बात है गुरुदेव

    बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है। अद्भुत
    कमाल का मक़्ता हुआ है। क्या बात है

  5. सभी शेर बेहतरीन.. नीरज साहब, बधाई कुबूल करें! ख़ास कर ये दिल के बेहद करीब से गुजरा –
    तमाम उम्र जिनके लिये वक़्फ़ कर दी
    वही कह रहे हैं मुहब्बत नहीं है

  6. नीरज जी,
    वाह वाह
    बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है आपने।
    ढेरों ढेर दाद क़ुबूल फरमायें
    सादर
    पूजा😇

  7. उठा कर गिराना गिरा कर मिटाना
    हमारे यहाँ की रिवायत नहीं है

    तमाम उम्र जिनके लिये वक़्फ़ कर दी
    वही कह रहे हैं मुहब्बत नहीं है

    कभी ख़ुद से भी रंज रखते थे साहब
    हमें अब किसी से शिकायत नहीं है

    Kya baat hai Neeraj Sir ..Bahut achhii gazal hui hai

    dili daad qubool keejiye

    regrads

  8. छुपाये हुए हैं सभी लोग खंज़र
    बज़ाहिर किसी से अदावत नहीं है

    करूँ क्या परों का अगर इनसे मुझको
    फ़लक़ नापने की इज़ाज़त नहीं है

    उठा कर गिराना गिरा कर मिटाना
    हमारे यहाँ की रिवायत नहीं है

    तमाम उम्र जिनके लिये वक़्फ़ कर दी
    वही कह रहे हैं मुहब्बत नहीं है

    bahut achi gazal hui sir
    dili daad qubul kijiye
    regards

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