6 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- रात से दिन का वो जो रिश्ता थी-दिनेश नायडू

रात से दिन का वो जो रिश्ता थी
शाम थी और कैसी तन्हा थी

ख़त के पुर्ज़े पड़े थे कमरे में
इक पुरानी किताब भी वा थी

सबके मतलब के ख़ाब थे उसमें
शब के हाथों में एक पुड़िया थी

रात भर आँधियों का दौर चला
शाख़ पर इक उदास चिड़िया थी

उन दिनों जब वो मेरे साथ ही था
मेरी दुनिया भी एक दुनिया थी

झील जैसी थीं उसकी ही आँखें
बाक़ी दुनिया तो ख़ैर सहरा थी

आख़िरश डूबना पड़ा मुझको
आरज़ू थी या कोई दरिया थी

दिनेश नायडू 09303985412

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6 comments on “ग़ज़ल:- रात से दिन का वो जो रिश्ता थी-दिनेश नायडू

  1. सबके मतलब के ख़ाब थे उसमें
    शब के हाथों में एक पुड़िया थी

    रात भर आँधियों का दौर चला
    शाख़ पर इक उदास चिड़िया थी

    उन दिनों जब वो मेरे साथ ही था
    मेरी दुनिया भी एक दुनिया थी
    Bahut achi gazal bhaia
    dili daad qubul kijiye
    regards
    Imran

  2. ख़त के पुर्ज़े पड़े थे कमरे में
    इक पुरानी किताब भी वा थी

    सबके मतलब के ख़ाब थे उसमें
    शब के हाथों में एक पुड़िया थी

    रात भर आँधियों का दौर चला
    शाख़ पर इक उदास चिड़िया थी
    kya baat hai dinesh bhai ..ahaa

    kya khoob..ak aur badhiya gazal

    waahhh waahhh

  3. सबके मतलब के ख़ाब थे उसमें
    शब के हाथों में एक पुड़िया थी

    रात भर आँधियों का दौर चला
    शाख़ पर इक उदास चिड़िया थी

    Kamaal ke sher hue hain dinesh… waah waah

  4. क्या बात हा नायडू साहेब क्या अच्छी गज़ल मुश्किल ज़मीन… पुरअसर बयान… मुबारक

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