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ग़ज़ल:- बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं-बकुल देव

बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं
ज़ख़्म फिर से हरे-भरे देखूं

ये बसीरत अजब बसीरत है
आइनों में भी आइने देखूं

ज़ावियों से अगर निजात मिले
सारे मंज़र घुले-मिले देखूं

नज़्म करना है बेहिसाबी को
लफ़्ज़ सारे नपे तुले देखूं

आख़िर आख़िर जो दास्तां न बने
अव्वल अव्वल वो वाक़ये देखूं

दूरियां धुंध बन के बिखरी हैं
कुछ क़रीब आ कि फ़ासिले देखूं

एक नश्शा है ख़ुदनुमाई भी
जो ये उतरे तो फिर तुझे देखूं

ले गया वो बची-खुची नींदें
ख़्वाब कैसे रहे सहे देखूं

रात फैली हुई है मीलों तक
क्या चराग़ों के दाइरे देखूं

बकुल देव 09672992110

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6 comments on “ग़ज़ल:- बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं-बकुल देव

  1. Kamaal ki ghazal Bakul bhai….zaaviyon se agar nijaat mile… yaar shaandaar sher hai.. waah waah

  2. Bahut achhi ghazal hui hai Bakul Bhai….Bahut bahut Mubarakbaad

  3. दूरियां धुंध बन के बिखरी हैं
    कुछ क़रीब आ कि फ़ासिले देखूं..Ahaaa

    ak aur khoobsoorat gazal ke liye Mubarqbad.

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