6 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं-बकुल देव

बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं
ज़ख़्म फिर से हरे-भरे देखूं

ये बसीरत अजब बसीरत है
आइनों में भी आइने देखूं

ज़ावियों से अगर निजात मिले
सारे मंज़र घुले-मिले देखूं

नज़्म करना है बेहिसाबी को
लफ़्ज़ सारे नपे तुले देखूं

आख़िर आख़िर जो दास्तां न बने
अव्वल अव्वल वो वाक़ये देखूं

दूरियां धुंध बन के बिखरी हैं
कुछ क़रीब आ कि फ़ासिले देखूं

एक नश्शा है ख़ुदनुमाई भी
जो ये उतरे तो फिर तुझे देखूं

ले गया वो बची-खुची नींदें
ख़्वाब कैसे रहे सहे देखूं

रात फैली हुई है मीलों तक
क्या चराग़ों के दाइरे देखूं

बकुल देव 09672992110

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6 comments on “ग़ज़ल:- बारे-दीगर ये फ़लसफ़े देखूं-बकुल देव

  1. Kamaal ki ghazal Bakul bhai….zaaviyon se agar nijaat mile… yaar shaandaar sher hai.. waah waah

  2. दूरियां धुंध बन के बिखरी हैं
    कुछ क़रीब आ कि फ़ासिले देखूं..Ahaaa

    ak aur khoobsoorat gazal ke liye Mubarqbad.

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