8 टिप्पणियाँ

ग़ज़ल:- मुझमें आबाद सराबों का इलाका करने-दिनेश नायडू

मुझमें आबाद सराबों का इलाका करने
फिर चली आई तेरी याद उजाला करने

दिन मेरा फिर भी किसी तौर गुज़र जाएगा
रात आएगी उदासी को कुशादा करने

वक़्त-बेवक़्त चला आता है सावन मुझमें
एक गुज़रे हुए मौसम का तकाज़ा करने

मैंने जलते हुए सहरा में तिरा नाम लिया
सायबाँ खुद ही चला आया है साया करने

कैसा लावा है तहे-आब यहां आँखों में
कौन आया है समंदर को जज़ीरा करने

हमको ही दीप बुझाने पड़ेंगे आँखों के
कौन आएगा यहां कारे-मसीहा करने

दिनेश नायडू 09303985412

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8 comments on “ग़ज़ल:- मुझमें आबाद सराबों का इलाका करने-दिनेश नायडू

  1. Kya kahne Dinesh bhaii ..kya hi achhii gazal hui hai ..aur ye teen sher to laazwaab hai.n…mere bhai..

    दिन मेरा फिर भी किसी तौर गुज़र जाएगा
    रात आएगी उदासी को कुशादा करने

    वक़्त-बेवक़्त चला आता है सावन मुझमें
    एक गुज़रे हुए मौसम का तकाज़ा करने..KYA KAHNE WAAH

    कैसा लावा है तहे-आब यहां आँखों में
    कौन आया है समंदर को जज़ीरा करने/…ahaa

    zindabad bhai

  2. Dinesh sahab khoob gazal hui hae.
    Dheron wah wahi ke saath daad qubool karein.
    Sadar
    Pooja

  3. वक़्त-बेवक़्त चला आता है सावन मुझमें
    एक गुज़रे हुए मौसम का तकाज़ा करने

    मैंने जलते हुए सहरा में तिरा नाम लिया
    सायबाँ खुद ही चला आया है साया करने
    Bahut achi gazal hui bhaia
    dili daad qubul kijiye
    SAdar

  4. kamaal kar diya dinesh… zindabaad… poori ghazal zabardast hai… waah waah

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