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ग़ज़ल:- आँखों का पूरा शह्र ही सैलाब कर गया -आलोक मिश्रा

आँखों का पूरा शह्र ही सैलाब कर गया
ये कौन मुझमें नज़्म की सूरत उतर गया

जंगल में तेरी याद के जुगनूँ चमक उठे
मैदां सियाह शब का उजालों से भर गया

वरना सियाह रात में झुलसा हुआ था मैं
ये तो तुम्हारी धूप में कुछ कुछ निखर गया

झूमा थिरकते नाचते जोड़ों में कुछ घड़ी
दिल फिर न जाने कैसी उदासी भर गया

दोनों अना में चूर थे अनबन सी हो गई
रिश्ता नया नया सा था कुछ दिन में मर गया

पहले कुछ एक दिन तो कटी मुश्किलों में रात
फिर तेरा हिज़्र मेरी रगों में उतर गया

हाथों से अपने, ख़ुद ही नशेमन उजाड़ कर
देखो उदास होके परिंदा किधर गया

इक चीख़ आसमान के दामन में सो गई
दिल की ज़मीं पे दर्द हर इक सू बिखर गया

आलोक मिश्रा 09876789610

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6 comments on “ग़ज़ल:- आँखों का पूरा शह्र ही सैलाब कर गया -आलोक मिश्रा

  1. झूमा थिरकते नाचते जोड़ों में कुछ घड़ी
    दिल फिर न जाने कैसी उदासी भर गया

    दोनों अना में चूर थे अनबन सी हो गई
    रिश्ता नया नया सा था कुछ दिन में मर गया

    पहले कुछ एक दिन तो कटी मुश्किलों में रात
    फिर तेरा हिज़्र मेरी रगों में उतर गया

    हाथों से अपने, ख़ुद ही नशेमन उजाड़ कर
    देखो उदास होके परिंदा किधर गया

    ahaaaa..ahhaaa…zindabad bhai..waah

  2. आँखों का पूरा शह्र ही सैलाब कर गया
    ये कौन मुझमें नज़्म की सूरत उतर गया

    जंगल में तेरी याद के जुगनूँ चमक उठे
    मैदां सियाह शब का उजालों से भर गया

    झूमा थिरकते नाचते जोड़ों में कुछ घड़ी
    दिल फिर न जाने कैसी उदासी भर गया

    पहले कुछ एक दिन तो कटी मुश्किलों में रात
    फिर तेरा हिज़्र मेरी रगों में उतर गया

    हाथों से अपने, ख़ुद ही नशेमन उजाड़ कर
    देखो उदास होके परिंदा किधर गया

    इक चीख़ आसमान के दामन में सो गई
    दिल की ज़मीं पे दर्द हर इक सू बिखर गया

    Alok Bhai….kaise kaise sher nikaale hai yaar… Bechain karne waale shaayri….. Aankho ka shahr Sailaab kar dena….Hijr ka ragon mein utar jaana….Aise aise manzar… waah waah waah… Kash aise sher main bhi keh paata kabhi…. Waah waah Bhai… salamat raho….

  3. alok mere pasandida shayro’n me ek hai jise padhne ka jee chahta hai….. shukriya bhai ek behtarin ghazal padhwane ke liye……

  4. Alok ji poori gazal hi kamaal hui hae. Wahhhhh dheron daad
    Sadar
    Pooja

  5. पहले कुछ एक दिन तो कटी मुश्किलों में रात
    फिर तेरा हिज़्र मेरी रगों में उतर गया

    हाथों से अपने, ख़ुद ही नशेमन उजाड़ कर
    देखो उदास होके परिंदा किधर गया

    bahut achi gazal hui bade bhai
    Dili daad qubul kijiye
    SAdar

  6. bahut bahut khubsurat ghazal alok… kai sher behad pasand aaye

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