6 टिप्पणियाँ

T-24/38 न ज़ुल्मतों के शहर की न यूरिशे-ग़ुबार की-नूरुद्दीन ‘नूर’

न ज़ुल्मतों के शहर की न यूरिशे-ग़ुबार की
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

हमारे दीनो-धर्म आज आंधियों की ज़द में हैं
कि नस्ले-नौ ने दहरियत की राह अख़्तियार की

बहुत से लोग जिसको काम कह के मुजतनिब रहे
हयात की नदी उसी घड़े से हमने पार की

ये ज़िदगी तो दश्ते-नामुराद बन के रह गयी
न होश है मचान का न फ़िक्र है शिकार की

इनब में इन दिनों नहीं रहा इनब का ज़ायक़ा
अनार में सिफत कहाँ रही है अब अनार की

भरी हुई हैं नफरतों के ज़हर से फ़िज़ाएं भी
ख़िज़ाँ में ढल चुकी हैं सारी रौनक़ें बहार की

ये अहदे-नौ ‘नूर’ इक हवसकदे में ढल गया
तभी तो क़द्र कम हुई ख़ुलूस और प्यार की

नूरुद्दीन ‘नूर’ 09663435838

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6 comments on “T-24/38 न ज़ुल्मतों के शहर की न यूरिशे-ग़ुबार की-नूरुद्दीन ‘नूर’

  1. नूर साहब दाद क़ुबूल फ़रमाएं

  2. हमारे दीनो-धर्म आज आंधियों की ज़द में हैं
    कि नस्ले-नौ ने दहरियत की राह अख़्तियार की

    bahut hi umda ashaar hue hain. daad qabool karein.

  3. बड़ी खूबसूरत ग़ज़ल हुई है जनाब नूर साहब, दाद कुबूल कीजिए

  4. ये ज़िदगी तो दश्ते-नामुराद बन के रह गयी
    न होश है मचान का न फ़िक्र है शिकार की

    Aha ha …kya baat hai…behtareen ghazal

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