20 टिप्पणियाँ

T-24/37 तज़्मीन-बकुल देव

साहिबो इस तज़ामीनी ग़ज़ल को कल ही पोस्ट होना था मगर पोस्ट करते-करते रात के डेढ़ बज गए और नींद से बोझल हो कर आँखें झुंझलाने लगीं तो मैंने बकुल की इस ग़ज़ल, नूरुद्दीन साहब की ग़ज़ल और अपनी ग़ज़ल को रोक लिया। बकुल, नूरुद्दीन साहब की ग़ज़ल के लिए माफ़ी और अपनी ग़ज़ल का क्या है पोस्ट की……..की न की

ग़ज़ल के फ़न की एक शक्ल तज़्मीन भी होती है। आम तौर पर किसी मिसरे को गिरह करना भी तज़्मीन कहलाता है। आप सब ख़ुद भी तरही मिसरे को गिरह करते हैं। मैंने ख़ुद तफ़रीहन कई दोस्तों के मिसरों पर काम किया है। हाज़िरे-ख़िदमत कर रहा हूँ
उसे पाने की खाहिश है सभी को
ख़ुदा आँखें न दे ऐसी किसी को

बहुत पछता रहा है मुझको खो कर
मयस्सर हो गया हूँ अब सभी को { विकास शर्मा राज़ }

सदा इक देखती है दूसरी को
ख़ुदा आँखें न दे ऐसी किसी को

बहुत पछता रहा है मुझको खो कर
मयस्सर हो गयी हूँ अब सभी को

बकुल देव साहब ने इब्तिदा में कही गयी ग़ज़लों के कुछ मिसरे छांट कर उनको गिरह किया है और इस तरह पूरी तज़्मीनी ग़ज़ल उभर आई है। मज़ेदार शरारती काम है। इस का भी मज़ा लीजिये। जिन हज़रात के मिसरे हैं अगर उन्हें कुछ ख़राब लगे तो उसने मैं स्वयं क्षमा चाहता हूँ। इसे आनंद की तरह ही लीजियेगा।

‘चलेंगी जब हवेलियों से ख़ुश्बुएं बघार की’,(राजामोहन चौहान)
खुलेंगी अपने झोंपड़े में बरनियां अचार की.

बयाज़ फड़फड़ा रही है मेज पर रखी हुई,
‘कहीं प इक नहंग है तलाश में शिकार की’.(शाज जहानी)

दहन से कत्थई फुआर आ गिरी ज़मीन पर,
‘खुली जो लाल बत्ती पर वो खिड़की नीली कार की’.(गौतम राजरिषि)

बड़ा ही घटिया ब्रांड था जो फूंक के गया है तू,
‘है ज़ेह्न में अभी भी बू तिरे हर इक सिगार की’.(पूजा भाटिया)

हर एक घर में आजकल अटैच लैट बाथ है,
‘कहां रही हैं देश में ज़रूरतें कतार की’.(नीरज गोस्वामी)

ये रंगो-रौग़नो सफू़फ़ सारे रुख़ पे पुत गये,
‘बताइये बची है क्या जगह किसी निखार की’.(शाज जहानी)

न फ़न्ने-ज़रगरी को आहनी सरों पे आज़मा
‘बस एक ज़र्ब काफ़ी है जो पड़ गयी लुहार की’.(मुमताज़ नाज़ां)

गज़ल न पढ़ने का हमें मुआवज़ा डबल मिला
‘जहां है गुफ़्त सौ वहीं है ख़ामुशी हज़ार की’.(शाज जहानी)

न ताल और धुन का फ़र्क़ था पता सो यूं कहा
‘धिनक धिनक धिनक धिनाक धिन धुनें धमार की’.(नवीन चतुर्वेदी)

‘तवील इस ग़ज़ल में सिर्फ़ एक शेर काम का’,(शाज जहानी)
बताओ यार किस गधे के मज्मुए से पार की

चढ़ा हुआ हूं बांस पर वहीं टंगा रहूंगा मैं
‘कभी न आएगी जनाब रुत मेमिरे उतार की’ (इरशाद)

शबे-विसाल मूलियां फ़िराक़ का सबब हुईं
‘न उनके बस की बात थी न अपने इख़्तियार की’.(मनोज मित्तल क़ैफ़)

अफ़ीम पहले खा चुके मिठाई भी गटक गये
‘तो अब लड़ो हवाओं से लड़ाई आर पार की’.(इरशाद)

चलो कि फ़ारिग़ुल-बियर इसी जगह पे हो चलें
‘कमी है बन में आज सिर्फ़ एक आबशार की’.(स्वप्निल तिवारी)

पड़ेंगी जूतियां अगर कहीं पकड़ में आ गये,
‘न आज़म आप लीजिये गज़ल कोई उधार की’.

बकुल देव 09672992110

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20 comments on “T-24/37 तज़्मीन-बकुल देव

  1. बकुल जी, फ़न अपनी जगह ज़राफ़त कमाल। वाह वाह।

  2. बकुल देव सर, “बड़े लोगों के विनोद” स्थायी स्तम्भ हुआ करते थे पत्रिकाओं मे , हम किशोरावस्था मे पढ़ कर बहुत ही प्रसन्न होते थे कि चलो, बड़े लोग भी मनोविनोद किया करते हैं, आज लगा कि यहाँ भी ज़िंदादिली और हास्य-व्यंग्य से कोई परहेज नहीं है, अपितु इन बड़े गंभीर और विशेषज्ञ शायरों के अंदर humour कूट कूट कर छिपा हुआ है। आभारी हूँ कि आप ने बघार की ख़ुशबुओं के साथ साथ अचार की बरनियों का उत्तम प्रबंध कर दिया, सारा माहौल चटखारेदार हो गया… साधुवाद और आभार

  3. भई वाह
    बकुल जी, कुछ दिन की व्यस्तता के बाद लफ्ज़ पर लौटा, और लौटते ही आपकी इस लाजवाब पेशकश ने पूरी थकान उतार दी

    कमाल कर दिया साहेब

  4. बेहद आनंददायक…

  5. बकुल भाई अ मयंक भाई आप दूनो जन मिलके कसम से तहलका मचाई दिह्यो माने की महफिल मा गजब कइ दिह्यो।
    गंगा कसम हँसत हँसत पेट पाका होइ गै
    अ कहो बकुल भाई आप त् हममै बांसे प चढ़ाई दिह्यो आँय??जॉन एलिया साहेब देवाल प चढ़िके पछताने अ हम बांस प।

  6. बकुल साहब और मयंक भाई ने तो रंग जमा दिया 🙂

  7. नीरज गोस्वामी साहब के शेर पर एक तज़्मीन

    हयात से चुरा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    निगाहों से बचा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    फ़ुतूर में उठा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    “बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की”
    लुफ़्त – Pleasure

  8. बकुल भाई आप के शेर पर एक तज़्मीन

    ये किस तरह का दौर है उतार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    दिलों पे अन्धकार का दयार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    फ़ज़ाओं पे ख़िज़ाओं का वक़ार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    “नयी रुतों के जिस्म पर ग़ुबार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की”

  9. बकुल भाई शुक्रिया। इस मनोरंजक पोस्ट का हिस्सा बन कर ख़ुशी हुई। मयंक भाई की पेशकश भी कमाल की है। मूड बना तो कुछ तज़्मीनें पेश करूँगा।

    दादा आप की ग़ज़ल की प्रतीक्षा रहेगी।

  10. Bakul ji kya tazmeen ki hae. Bhai waah waah waah….aanand aa gaya.
    Dheron daad…..😂😂😂😂😂
    Sadar
    Pooja

  11. ha H aha ha ha ha ha ha ha ha ha ha …Poore din ki thakaan utar gayi…bhai maza aa gaya…waah waah waah waah…bejod hunar ka muzahira…jiyo…

  12. शबे विसाल मूलियां…….
    क्या गज़ब किया है 😂😂😂😂😂

  13. ha ha ha
    kya tazmiin pesh ki hai Mayank bhaiya aapne….
    ohhh zoron ki hansi aa rhi hai…

    bahut shukria

    Alok

  14. बकुल भाई !! इस पेशकश के लिये बहुत बहुत मुबारकबाद !!! आपकी ग़ज़ल पर तज़्मीन पेश है !!!! —
    कुछ और देर के लिए है याद उस छिनार की
    न दिन हैं फिर चढ़ाव के न रात हैं उतार की

    चुरा के ले गया कोई किताब मस्तराम की
    यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की

    खराब लिफ्ट थी लिहाजा सीढियाँ चढे थे हम
    तो मुश्किलों ने मंज़िलों की शक्ल इख़्तियार की

    तुम्हारे बाप ने रसीद गाल पे किया है वो
    निदा ज़मीं प आ गई है आसमां के पार की

    मुझे भी नौकरानियों से कुछ सुकून मिल गया
    उसे भी मिल गयीं कहीं सहूलतें उधार की

    किसी ने पान खा के थूक यूँ दिया है फर्श पर
    ज़मीं प बिछ गयीं हैं सुर्ख़ पत्तियां चिनार की

    नदी ग़मों की थी कोई विवाह जिसका नाम था
    न ग़र्क ही हुए कभी न यूं हुआ कि पार की

    वो खाँसने लगा तो कफ गले से सब निकल गया
    बरस गयीं हैं चार सू अशर्फियां क़रार की

    लगा के चार पैग जब निकल पडे तो क्या ख़बर
    हों मंज़िलें वो होश की कि राह हो ख़ुमार की

    न तेरी है तलाश अब ,न तेरी माँ का डर है अब
    न ख़ौफ़ ही ख़िजां का है न जुस्तजू बहार की

    हमारी ट्रेन शाम को जरा सी लेट थी पर अब
    चलो कि फिर से रात कट गयी है इंतज़ार की

    तमाम भाभियों से इक उमीद थी कभी मगर
    बड़ी लतीफ़ बाज़ियां थीं अव्वलनीं क़िमार की

    चारग़ मे जो तेल था वो जिस्म पर छिडक लिया
    ‘ये दास्तान है नज़र प रौशनी के वार की’

    भाई बकुल देव माज़रत !!!! ): सस्नेह –मयंक

  15. HAHAHA.. kamaal kiya hai apane Bakul bhai.. meri to hasi hi nahi ruk rahi.. lekin meiN samajh sakta hu ki ye mazahiya kaam kitni sanjeedgi se kiya hoga aapne.. 🙂
    aur iska to jawab hi nahi..

    शबे-विसाल मूलियां फ़िराक़ का सबब हुईं
    ‘न उनके बस की बात थी न अपने इख़्तियार की’.(मनोज मित्तल क़ैफ़)

    Asif

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