9 टिप्पणियाँ

T-24/35 क़फ़स में रात सुन रहे थे सिम्फ़नी बहार की-शबाब मेरठी

क़फ़स में रात सुन रहे थे सिम्फ़नी बहार की
जुनूं बढ़ा तो तोड़ दीं सभी हदें हिसार की

अटारियों पे आके आफ़ताब खांसने लगा
मगर कटी नहीं है शब हमारे इंतज़ार की

मैं ख़ाक हो चुका हूँ अब मुझे जलाना छोड़ दो
नहीं रही है बात अब तुम्हारे अख़्तियार की

चढ़ा हुआ है रात का ग़िलाफ़ हर उमीद पर
नज़र में कैसे आये रौशनी वो आर-पार की

वो हंस दिया तो फूल यूँ हरिक तरफ बिखर गए
कि जैसे छूटती हो फुलझड़ी कहीं अनार की

बड़े-बड़े दरख़्त भी ज़मीन चाटने लगे
मैं बात कर रहा हूँ अब हवा के अख़्तियार की

हर इक तरफ़ बिछी हैं अब उदासियों की किर्चियाँ
लहूलुहान है हरिक गली मिरे दयार की

वफ़ा के नाम पर हज़ार बार खाइये क़सम
क़सम से क्या बने वो बात है जो ऐतबार की

लड़ी थी जंग पैदलों ने अपने हौसलों से ये
बताई जा रही है फिर भी जीत शहसवार की

शबाब मेरठी 09997220102

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9 comments on “T-24/35 क़फ़स में रात सुन रहे थे सिम्फ़नी बहार की-शबाब मेरठी

  1. शबाब साहब,

    वाह वाह।

    भटक रहे थे मुद्दतों से हम भी अपनी जां लिए
    उसे भी एक उम्र से तलाश थी शिकार की

    जुनूँ हुआ, तपिश हुई, ख़लिश हुई, कि ग़म हुआ
    ये दौलतें हैं इश्क़ की ये नेमतें हैं प्यार की
    इन अशआर की दाद दूनी।

  2. लड़ी थी जंग पैदलों ने अपने हौसलों से ये
    बताई जा रही है फिर भी जीत शहसवार की

    शबाब साहब, लफ्ज़ की महफ़िल में आपकी शायरी का शबाब छा गया है
    क्या कहने

  3. Shabaab merathi sahab
    Kya hi umda gazal hui hae. Her sher pr dheron daad.taliyon ke saath.
    Sadar
    Pooja

  4. शबाब साहब !! हमेशा के जैसी पुरनूर और पुर असर गज़ल !! रिवायत की फसील लाँघती जदीदियत और जदीदियत की पासबानी में फलती फूलती रिवायत ये खासियत है शबाब साहब की गज़ल की !! वो नौजवान पीढी के रश्क करने योग्य प्रयोगधर्मी हैं !! इस साठेत्तर की आयु में जब बेशतर शाइर ऊर्जाविहीन हो जाते हैं और पुराने मीटर के पुनराव्रत्ति करने लगते हैं ऐसे में बेहद खूबसूरत –नये और दिलो जेहन पर तारी हो जाने वाले शेर सिर्फ और सिर्फ आप निरंतर कह रहे हैं !! बहुत बहुत मुबारकबाद !! आपका कलम ,चेहरा, बयान सभी कुछ रोशनी का सरमाया है –मयंक

  5. क़फ़स में रात सुन रहे थे सिम्फ़नी बहार की
    जुनूं बढ़ा तो तोड़ दीं सभी हदें हिसार की
    बात सही है शबाब साहब लेकिन इसके बाद भी क्या सुकून मिल सकेगा — जज़ा कहें कि सज़ा इसको बालो पर वाले
    ज़मीं सिकुडती गई जितना आसमान खुला –शिकेब
    & उतर के नाव से भी कब सफर तमाम हुआ
    ज़मीं पे पाँव धरा तो ज़मीन चलने लगी—शिकेब
    अटारियों पे आके आफ़ताब खांसने लगा
    मगर कटी नहीं है शब हमारे इंतज़ार की
    ऊला मिसरे की बलैयाँ ले लूँ पहले फिर शेर पढा जाय !!
    सच यही है कि — कोई उम्मीद क्या पैदा करेगा
    हमारा राहबर नामर्द भी है
    आफताब के खाँसने की बात और उससे पैदा होने वाला भाव बेहद समर्थ है !!!
    मैं ख़ाक हो चुका हूँ अब मुझे जलाना छोड़ दो
    नहीं रही है बात अब तुम्हारे अख़्तियार की
    क्योंकि जली को राख कहते हैं –बुझाने वाले को आब कहते हैं –लेकिन राख से जो बारूद बने उसे शबाब कहते हैं !!
    चढ़ा हुआ है रात का ग़िलाफ़ हर उमीद पर
    नज़र में कैसे आये रौशनी वो आर-पार की
    ये धुन्धलका खुल के बतलाता नहीं
    शाम है या सुबह का आगाज़ है !!
    बड़े-बड़े दरख़्त भी ज़मीन चाटने लगे
    मैं बात कर रहा हूँ अब हवा के अख़्तियार की
    क्या बात है !! हवा के अख़्तियार की !! बहुत सुन्दर शेर कहा है !! इस पर एक जवाबी शेर क़ैफ़ भोपाली का — गुल से लिपटी हुई तितली को उडा कर देखो
    आँधियों तुमने दरख़्तों को गिराया होगा –कैफ भोपाली
    हर इक तरफ़ बिछी हैं अब उदासियों की किर्चियाँ
    लहूलुहान है हरिक गली मिरे दयार की
    शेर के शिल्प पर बलिहारी जाऊँ !! शबाब साहब आप जैसे पुराने चावलों की खुश्बू का यकीनन जवाब नहीं
    वफ़ा के नाम पर हज़ार बार खाइये क़सम
    क़सम से क्या बने वो बात है जो ऐतबार की
    वफाओं पर तुम्हारी शक नहीं पर
    मयंक अपनी कसम देता नहीं है
    क्योंकि मुआमला ऐतबार का ही है सौ फीसदी !!!
    लड़ी थी जंग पैदलों ने अपने हौसलों से ये
    बताई जा रही है फिर भी जीत शहसवार की
    मुहाज़े -वक़्त पे ऐसे भी शहसवार हुये
    कदम कदम पे जिन्हें पैदलों से मात मिली –मयंक

  6. बहुत खूब शबाब साहब, खूबसूरत अश’आर हुए हैं, दाद कुबूल कीजिए

  7. अटारियों पे आके आफ़ताब खांसने लगा
    मगर कटी नहीं है शब हमारे इंतज़ार की

    मैं ख़ाक हो चुका हूँ अब मुझे जलाना छोड़ दो
    नहीं रही है बात अब तुम्हारे अख़्तियार की

    वफ़ा के नाम पर हज़ार बार खाइये क़सम
    क़सम से क्या बने वो बात है जो ऐतबार की

    Kya kahen ? Bejod ghazal hui hai…maza aa gaya…dheron daad kaboolen janab…

  8. क़फ़स में रात सुन रहे थे सिम्फ़नी बहार की…kya khoob hai …ahaa..
    जुनूं बढ़ा तो तोड़ दीं सभी हदें हिसार की

    अटारियों पे आके आफ़ताब खांसने लगा
    मगर कटी नहीं है शब हमारे इंतज़ार की

    वो हंस दिया तो फूल यूँ हरिक तरफ बिखर गए
    कि जैसे छूटती हो फुलझड़ी कहीं अनार की

    हर इक तरफ़ बिछी हैं अब उदासियों की किर्चियाँ
    लहूलुहान है हरिक गली मिरे दयार की

    kya hi umda gazal hui hai Shabaab sahab
    har baar ki tarah
    sabhi ash-aar purasar hain..
    waahhh waahhh waahhh

    dili daad qubool keejiye

  9. अटारियों पे आके आफ़ताब खांसने लगा
    मगर कटी नहीं है शब हमारे इंतज़ार की

    मैं ख़ाक हो चुका हूँ अब मुझे जलाना छोड़ दो
    नहीं रही है बात अब तुम्हारे अख़्तियार की

    चढ़ा हुआ है रात का ग़िलाफ़ हर उमीद पर
    नज़र में कैसे आये रौशनी वो आर-पार की

    Wahhhhh wahhhh sir
    dili daad qubul kijiye
    SAdar

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