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T-24/34 बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की -नवीन सी. चतुर्वेदी

बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की
तो मुलतवी नहीं करें अरज किरायेदार की

न तो किसी उरूज की न ही किसी निखार की
ये दासतान है सनम उतार के उतार की

बहुत हुआ तो ये हुआ कि हक़ पे फ़ैसला हुआ
कहाँ समझ सका कोई शिकायतें शिकार की

चमन की जान ख़ुश्बुएँ हवा से डर गयीं अगर
तो कैसे महमहाएँगी ये बेटियाँ बहार की

मरज़ मिटाने की जगह मरज़ बढाने लग गयीं
बुराइयों में मिल गयीं दवाइयाँ बुख़ार की

ज़मीन पर हरिक तरफ़ तरन्नुमों का राज है
कमाल का ख़याल हैं सदाएँ आबशार की॥

धुआँ धुआँ धुआँ धुआँ उड़ाते जा रहे हैं सब
न जाने क्या दिखायेगी अब और ये एनारकी { anarchy }

उठा-पटक के दौर में न शर्म है न लाज है
भलाइयों की तश्तरी हमीं ने छार-छार की

अज़ीब कर दिया समाँ बिगाड़ दी है कुल फ़जा
पसरती जा रही है लू मरुस्थली बयार की

न ख़ाक हूँ न चाक हूँ छड़ी न जल न डोरियाँ।
‘नवीन’ सच तो ये है बस कला हूँ मैं कुम्हार की॥

नवीन सी. चतुर्वेदी 09967024593

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11 comments on “T-24/34 बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की -नवीन सी. चतुर्वेदी

  1. नवीन जी,

    आपकी ज़बान और कलाम अपनी पहचान आप है। निहायत दिलचस्‍प। अनार्की को ‘बांधना’ कमाल। वाह वाह। दाद क़ुबूल फ़रमाएं।

  2. बचानी हो हुज़ूर को जो आबरू दयार की
    तो मुलतवी नहीं करें अरज किरायेदार की
    नवीन !!!!!!!!!!!!!!! शेर कहा है !! वैसे किरायेदार की ये अरज वेमानी नहीं है कि हम आपके मकान में भी रहेंगे और आपसे उल्टे किराया भी लेंगें ???!!! ह ह ह हा!!!!!
    न तो किसी उरूज की न ही किसी निखार की
    ये दासतान है सनम उतार के उतार की
    उतार
    के
    उतार की ……………वाह वाह !!
    बहुत हुआ तो ये हुआ कि हक़ पे फ़ैसला हुआ
    कहाँ समझ सका कोई शिकायतें शिकार की
    अरे इतना बहुत है कि हक़ मे फैसला हुआ वर्ना –
    मुंसिफ हो या गवाह मनायेंगे अपनी ख़ैर
    गर फैसला अना से मेरी कुछ भी कम हुआ –मयंक
    चमन की जान ख़ुश्बुएँ हवा से डर गयीं अगर
    तो कैसे महमहाएँगी ये बेटियाँ बहार की
    ध्व्न्यनुसारिता बहुत आलोडित कर रही है इस शेर की !!! महमहाऐगी लफ़्ज़ खुद खुश्बूओ से गमक रहा है !!!
    मरज़ मिटाने की जगह मरज़ बढाने लग गयीं
    बुराइयों में मिल गयीं दवाइयाँ बुख़ार की
    पण्डित के पास वेद , लिये मौलवी कुरान
    बीमारियाँ खडी हैं दवाओं के साथ साथ –मयंक
    ज़मीन पर हरिक तरफ़ तरन्नुमों का राज है
    कमाल का ख़याल हैं सदाएँ आबशार की॥
    कहाँ की बात कर रहे हो नवीन भाई !! लालच लगता है ऐसी जगह का चित्र खीचते हो !! वगरन हमारा शेर तो ये है — ज़मीन पर हरिक तरफ़ जहन्नुमों का राज है
    सुनी हैं चार सू फकत सदाएँ बेकरार की॥
    धुआँ धुआँ धुआँ धुआँ उड़ाते जा रहे हैं सब
    न जाने क्या दिखायेगी अब और ये एनारकी { anarchy }
    यंत्र ,मनुष्य , दिलो दिमाग़ ,बीवियाँ , नेता , आसमान सब धुआँ ही धुआँ उडा रहे हैं !!! वाह वाह !! ज़िन्दगी है कि ग़ुबार है !!!
    उठा-पटक के दौर में न शर्म है न लाज है
    भलाइयों की तश्तरी हमीं ने छार-छार की
    भलाइयों की जगह मलाइयों कीजिये !!!
    अज़ीब कर दिया समाँ बिगाड़ दी है कुल फ़जा
    पसरती जा रही है लू मरुस्थली बयार की
    बिल्कुल भाई !! ईराक सीरिया मिस्र लीबिया और अब अफगानिस्तान और फिर भारत का नम्बर है !! –मरुस्थली बयार पसरती जा रही है –सावधान !!
    न ख़ाक हूँ न चाक हूँ छड़ी न जल न डोरियाँ।
    ‘नवीन’ सच तो ये है बस कला हूँ मैं कुम्हार की॥
    मैं हूँ मिट्ती तो मुझे कूजागरों तक पहुंचा .. बिल्कुल सच कहा लेकिन इधर मेरी तबीयत लग नहीं रही — इक कूजागर मुझमे अक्सर कहता है
    माटी का तन माटी का हो जाता है
    नवीन भाई पूरे जोश ज़िद और जवानी के साथ आप अपनी गज़ल में मौजूद हैं और माहौल पर हावी हैं –बधाई –मयंक

    • प्रणाम आदरणीय। आप के कमेण्ट ने साधारण ग़ज़ल में ख़ूबियाँ तलाश लीं। बहुत बहुत आभार।

  3. अच्छी ग़ज़ल हुई है नवीन भाई। इसमें ताज़गी भी है जो आपकी ग़ज़लों में अकसर मिलती है। दाद कुबूल कीजिए

  4. चमन की जान ख़ुश्बुएँ हवा से डर गयीं अगर
    तो कैसे महमहाएँगी ये बेटियाँ बहार की

    धुआँ धुआँ धुआँ धुआँ उड़ाते जा रहे हैं सब
    न जाने क्या दिखायेगी अब और ये एनारकी

    उठा-पटक के दौर में न शर्म है न लाज है
    भलाइयों की तश्तरी हमीं ने छार-छार की

    Kahte hain ki Naviin ka hai andaaz-e-bayan aur…is ghazal ko padh kar is baat ki sachchai ka pata bhi lag jata hai…anoothe kaafiye dhoondh lana Naviin bhai ka shagal hai…Dheron daad is ghazal ke liye Navin bhai..

  5. kya kahne dada..
    doosri gazal bhi bharpoor hai ..

    dili daad qubool keejiye

  6. Bahut hi achchhi gazal hui hai. Do teen ash_aar jinhone khas dhyan kheencha hai un ka tazkira karna chaahoonga. Sab se pahli baat toh kaafiye ki. Yun dekhen toh kaafiya kuchh khas mushkil-talab nahin hai par phir bhi aathven she_r mein toh ustaadi rang dikhaai deta hai. “Chaar chaar” – kya istemaal kiya hai. Vallah ! Chauthe she_r mein “mahmahaayengi” yeh lafz urdu shaairee mein shaayad hi pahle kabhi istemaal hua ho. Yeh bilkul bol-chaal ka lafz hai lekin yahaan kis khoobsoorti se chaspaan baith gaya hai, maa`shallah.
    Chaturvedi ji, bahut mubarakbaad qubool farmaaiye.

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