16 टिप्पणियाँ

T-24/33 किसी के ग़म की मार ने बड़ी हसीन मार की-नवनीत शर्मा

किसी के ग़म की मार ने बड़ी हसीन मार की
कि चोट खा के गा रही है रूह मुझ सितार की

ले देख बन गई न आज ! खाई इक दरार की
उजड़ गई वो वादियां जो दिल में थी चिनार की

बिछड़ के भी मैं उससे खिलखिला रहा हूं आज भी
कि रौनक़ें बनी रही हैं इश्‍क़ के मज़ार की हुआ है

ज़ाेर कम मगर, है कैफ़ियत बनी हुई
चढ़ा था मेरे सर पे जो उस इश्‍क़ के बुख़ार की

मैं जिस नदी की राह देखता था छू गई मुझे
लगा उसी में मिल गई है ख़ाक ख़ाकसार की

हरा, सफेद, सुर्ख़, संतरी सियाह हो गए
‘ये दास्‍तान है नज़र पे रोशनी के वार की’

‘मैं खुश हूं’ उसने ये कहा था फ़ोन पर मुझे
मगर उभर रही है दिल में शक्‍ल कैसे ज़ख्‍़मे-यार की

अब आंच, वार, भटिठयां नसीब उनका हो गईं
निगाह पड़ गई है जिनपे वक़्त के लुहार की

सुलग-सुलग के जल गया, बुझा अगर तो फिर जला
जो की है मैंने ज़िन्दगी, थी ज़िन्दगी सिगार की

लिखा है जो वो सच नहीं जो सच था वो लिखा नहीं
बयाज़े-ज़िन्दगी है जैसे बात इश्तिहार की

न उसको कोई ग़म रहा न मेरे दिल पे बोझ है
उसी की दी हुई थी जान उस पे जो निसार की

वो मेरा ख़ुद से वास्‍ता बड़ा अजीब राबिता
थी मुश्किलों की इक नदी जो मुश्किलों से पार की

जो दिल था वो तो मर गया बचेगा जिस्‍म कब तलक
कि अब तलब तलक नहीं हमें ज़रा क़रार की

वो पत्‍थरों की फि़क्र क्‍या, वो ज़हमतों का जि़क्र क्‍या
कि आबलों पे कब नज़र गई किसी कहार की

नवनीत शर्मा 09418040160

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

16 comments on “T-24/33 किसी के ग़म की मार ने बड़ी हसीन मार की-नवनीत शर्मा

  1. नवनीत जी, उम्‍दा ग़ज़ल के लिये मुबारकबाद। दाद सुम्‍म: दाद।

  2. क्या बात है सर
    बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है. सभी शेर कमाल कर रहे हैं
    बहुत बहुत बधाई

    सुलग-सुलग के जल गया, बुझा अगर तो फिर जला
    जो की है मैंने ज़िन्दगी, थी ज़िन्दगी सिगार की
    इस शेर में मुहे अपनी सेल्फ़ी नज़र आ रही है। क्या बात है

    लिखा है जो वो सच नहीं जो सच था वो लिखा नहीं
    बयाज़े-ज़िन्दगी है जैसे बात इश्तिहार की

    इस शेर से मुझे एक पुराना शेर याद आ गया..
    अब तो सच लिखने से मुझको रोक लेती है क़लम
    हो न जाए सर क़लम, छोटा सा धड़ मेरा भी है

    ३० जून को भी पढ़ी थी, टिप्पणी भी की थी, मगर शायद वह पोस्ट नही हुई

  3. Kya kehne…bahut umdaa ghazal hui hai bhaiya..waah..daad qubule’n

  4. किसी के ग़म की मार ने बड़ी शदीद मार की
    कि चोट खा के गुनगुना रही है रूह तक सितार की
    इस सु-गम संगीत के मौके पर मैं आपके साथ हूँ !!
    जो तार से निकली है वो धुन सबने सुनी है
    जो साज़ पे गुज़री है कहाँ किसको ख़बर है
    ले देख बन गई न आज ! खाई इक दरार की
    उजड़ गई वो वादियां जो दिल में थी चिनार की
    सीलन को राह मिल गई दीमक को सैरगाह
    अंजाम देख लीजिये घर की दरार के –मयंक
    लेकिन जब घर वालों को ही पडोसी का घर अच्छा लगने लगे तो क्या किया जाय !! भितरघातियों पर गुस्सा तो ऐसा आता है कि अपना चिनार उखाड कर इनकी दरार में घुसेड दिया जाय लेकिन ख़ैर हम भले आदमी हैं अल अजल ताबद सिर्फ और सिर्फ ये मंज़र देखते रहेंगे और काव्यपाठ करेंगे !! ( कश्मीर)
    बिछड़ के भी मैं उससे खिलखिला रहा हूं आज भी
    कि रौनक़ें बनी रही हैं इश्क़ के मज़ार की
    अच्छा शेर कहा है नवनीत भाई !!!सानी मिसरा बहुत रवाँ है !!
    हुआ है ज़ाेर कम मगर, है कैफ़ियत बनी हुई
    चढ़ा था मेरे सर पे जो उस इश्क़ा के बुख़ार की
    ये बुखार सेहत के लिये नहीं अच्छा –लेकिन ज़िन्दगी की सेहत इसी से है –शाइर हैं आप ज़रूरी है ये रोग आपके लिये !!!
    मैं जिस नदी की राह देखता था छू गई मुझे
    लगा उसी में मिल गई है ख़ाक ख़ाकसार की
    कमाल किया है !! क्या फल्सफहा बाँधा है !! वाह वाह !! ये नदी कितने ज़ाविये रखती है !!?? और इतना अर्थ विस्फोट है इस शेर में बहुत खूब !!! –ये नदी ज़िन्दगी भी हो सकती है मौत भी महबूब भी , यज़दाँ भी , इल्म भी , आगही भी और बेखुदी भी –हर लफ़्ज़ पर मुफीद है ये शेर क्या बात है !!
    हरे, सफेद, सुर्ख़, संतरी सियाह हो गए
    ‘ये दास्ता न है नज़र पे रोशनी के वार की’
    बिल्कुल नई गिरह !! और सम्प्रेषनीय है लफ़्ज़ बोल रहे हैं !!
    ‘मैं खुश हूं’ उसने ये कहा था फ़ोन पर मुझे मगर
    उभर रही है दिल में शक्लउ कैसे ज़ख़्रमे-यार की
    शब्दों की तुलना में आवाज़ ज़ियादा कुछ कहती है
    अब आंच, वार, भटिठयां नसीब उनका हो गईं
    निगाह पड़ गई है जिनपे वक़्त के लुहार की
    अह्ह्ह्ह क्या बात है !! बहुत खूब बहुत खूब !!
    सुलग-सुलग के जल गया, बुझा अगर तो फिर जला
    जो की है मैंने ज़िन्दगी, थी ज़िन्दगी सिगार की
    सिगार काफिये का इस्तेमाल तो हुआ है इस तरही मे लेकिन ये प्रयोग बेहतरीन है !!!
    लिखा है जो वो सच नहीं जो सच था वो लिखा नहीं
    बयाज़े-ज़िन्दगी है जैसे बात इश्तिहार की
    इस शेर पर भी भरपूर दाद !! नवनीत भाई शुरूअ के कुछ अश आर के बाद एक मुसल्सल गज़ल बनी है बाद के शेरों से !!
    न उसको कोई ग़म रहा न मेरे दिल पे बोझ है
    उसी की दी हुई थी जान उस पे जो निसार की
    आसान – और प्रभावी शेर कहा है !!!
    वो मेरा ख़ुद से वास्ताउ बड़ा अजीब राबिता
    थी मुश्किलों की इक नदी जो मुश्किलों से पार की
    यहाँ भी शेर की रवानी और ज़बान पर दाद !!
    वो पत्थ रों की फि़क्र क्या , वो ज़हमतों का जि़क्र क्याु
    कि आबलों पे कब नज़र गई किसी कहार की
    ये भी नया शेर है और यहाँ भी काफिये को बहुत सुन्दर बर्ता है !!!
    नवनीत भाई बहुत बहुत मुबारकबाद –तवील गज़ल लेकिन्हर शेर अच्छा कहा है –मयंक

    • आदरणीय मयंक भाई साहब।
      प्रणाम।
      आपके धैर्य को सलाम, आपके अध्‍ययन को नमस्‍कार आैर उस जज्‍़बे को प्रणाम जो हम जैसों की हौसलाअफ़ज़ाई करता है। सबकी ग़ज़लों के लिए वक्‍़त निकालना और उन पर टिप्‍पणी करना।
      पुन: प्रणाम।
      सादर
      नवनीत

  5. बहुत खूब नवनीत साहब, अच्छी ग़ज़ल हुई है। दाद कुबूल कीजिए

  6. हरा, सफेद, सुर्ख़, संतरी सियाह हो गए
    ‘ये दास्‍तान है नज़र पे रोशनी के वार की’

    Aha kya girah baandhi hai…waah waah waah…

    अब आंच, वार, भटिठयां नसीब उनका हो गईं
    निगाह पड़ गई है जिनपे वक़्त के लुहार की

    Kya khoobsurat andaaz-e-bayan hai…waah waah waah…lajawab…

    वो पत्‍थरों की फि़क्र क्‍या, वो ज़हमतों का जि़क्र क्‍या
    कि आबलों पे कब नज़र गई किसी कहार की

    Subhan Allah…waah waah waah…Navniit bhai dheron daad kaboolen is kamaal ki ghazal par…Jiyo bhai jiyo…

  7. ज़ाेर कम मगर, है कैफ़ियत बनी हुई
    चढ़ा था मेरे सर पे जो उस इश्‍क़ के बुख़ार की

    मैं जिस नदी की राह देखता था छू गई मुझे
    लगा उसी में मिल गई है ख़ाक ख़ाकसार की

    ‘मैं खुश हूं’ उसने ये कहा था फ़ोन पर मुझे
    मगर उभर रही है दिल में शक्‍ल कैसे ज़ख्‍़मे-यार की

    लिखा है जो वो सच नहीं जो सच था वो लिखा नहीं
    बयाज़े-ज़िन्दगी है जैसे बात इश्तिहार की

    जो दिल था वो तो मर गया बचेगा जिस्‍म कब तलक
    कि अब तलब तलक नहीं हमें ज़रा क़रार की

    kya kahne bhaiya Tamaam gazal hi behad umda hai……. waahhh waahh

    dili mubarkbad

    • शुक्रिया आलोक भाई। सेटिंग में गड़बड़ होने से ‘हुआ है ‘ ऊपर रह गया है। दोनों शे’र इस तरह हैं :

      बिछड़ के भी मैं उससे खिलखिला रहा हूं आज भी
      कि रौनक़ें बनी रही हैं इश्‍क़ के मज़ार की

      हुआ है ज़ाेर कम मगर, है कैफ़ियत बनी हुई
      चढ़ा था मेरे सर पे जो उस इश्‍क़ के बुख़ार की

  8. बहुत शुक्रिया इंदौरी साहब।
    ममनून हूं।

  9. लिखा है जो वो सच नहीं जो सच था वो लिखा नहीं
    बयाज़े-ज़िन्दगी है जैसे बात इश्तिहार की

    bahut khuub

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: