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T-24/29 ज़रूरतें नहीं हैं कुछ भी सोच की विचार की-कुमार अभय

ज़रूरतें नहीं हैं कुछ भी सोच की विचार की
कि रास आ ही जायगी ये ज़िन्दगी उधार की

विसाल के ख़ुमार की न हिज्र के निखार की
“ये दास्तान है नज़र प रौशनी के वार की”

तमाम उम्र मौत से दू ब दू रही मगर
कोई भी काट ला सका न ज़िन्दगी के वार की

ये दिल की धड़कनें तुम्हें समाअतों प बार हैं
जो ग़ौर से सुनो है इनमें नग़मगी सितार की

फ़ज़ा महक महक उठी धनक के रंग खुल गए
लबों प बात आ गयी जो आपके सिंगार की

अँधेरे के ही उस तरफ़ था रौशनी का इक हजूम
ख़िज़ाँ ने ही ख़बर दी हमको आमदे-बहार की

ग़मो-अलम को कर लिया है दोस्तदारे-ज़िन्दगी
कि जुस्तजू हमें नहीं है चैन की क़रार की

ये जह्दे-ज़िन्दगी रही है कामयाबो-कामरां
कि रोज़ कम से कम हुई हैं दूरियां मज़ार की

अभय कुमार अभय 08171611298

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3 comments on “T-24/29 ज़रूरतें नहीं हैं कुछ भी सोच की विचार की-कुमार अभय

  1. क्या बात है
    बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है.

  2. ये दिल की धड़कनें तुम्हें समाअतों प बार हैं
    जो ग़ौर से सुनो है इनमें नग़मगी सितार की

    फ़ज़ा महक महक उठी धनक के रंग खुल गए
    लबों प बात आ गयी जो आपके सिंगार की

    Subhan Allah…waah….daad kaboolen janab behtareen ghazal hui hai.

  3. ये दिल की धड़कनें तुम्हें समाअतों प बार हैं
    जो ग़ौर से सुनो है इनमें नग़मगी सितार की

    kya kahne Abhay sahab

    bahut umda gazal hui hai

    dili daad

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