8 टिप्पणियाँ

T-24/25 कलीम, तूर, लंतरानी, रब्बे-किरदिगार की-शफ़ीक़ रायपुरी

कलीम, तूर, लंतरानी, रब्बे-किरदिगार की
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

सुकून ही मिला न कुछ फ़ज़ा मिली क़रार की
गुज़र गयी तड़प-तड़प के ज़िन्दगी उधार की

हयातो-मौत एक दूसरे से जूझते रहे
तमाम रात चल रही थी बाज़ी जीत-हार की

चमन में सैर के लिए वो आ गए जो दफ़अतन
उतर के रह गयी है शक्ल देखिये बहार की

ख़याले-ख़ाम भी है ये फ़िज़ूल दौड़-धूप भी
तलाश और इस ज़माने में वफ़ाशिआर की

चला रहे थे वो गले पे ख़ंजरे-सितम मगर
बनी हुई थी रुत हमारे चेहरे पे क़रार की

जनाबे-दाग़ की ग़ज़ल का है गुमान आपको
अरे नहीं ग़ज़ल है ये शफ़ीक़े-ख़ाकसार की

शफ़ीक़ रायपुरी 09406078694

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8 comments on “T-24/25 कलीम, तूर, लंतरानी, रब्बे-किरदिगार की-शफ़ीक़ रायपुरी

  1. Waah waah Shafique sahab..bahut achhi ghazal ke liye tahe dil se badhai..daad qubul kare’n

  2. Bahut umda gazal huii Hia Shafiq raypuri sahab…
    sabhi ash-aar purasar hain

    dili daad qubool keejiye

  3. Mayank ji ke kathan ke baad kuch kahne ko bacha hi nahi Raypuri sahab .so bina kuch kahe dher sari taliyan…….
    Dheron daad
    Sadar
    Pooja

  4. मूड तो वाकई मिर्ज़ा दाग़ देहलवी वाला ही है गज़ल का !! ज़फर के पोते दाग़ देहलवी जो खुद उस्ताद इब्राहीम ज़ौक़ के शागिर्द थे और जिन्होने अल्लामा इकबाल जैसा शागिर्द उर्दू अदब को ही नहीं दिया बल्कि मुस्लिम कौम को भी एक रहबर दिया !! इनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता और अज़ीम शैरों की फेहरिस्त में बिलाशक उनका नाम अव्वल पाँत मे शुमार किया जाता है !!!
    कलीम, तूर, लंतरानी, रब्बे-किरदिगार की
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’
    मुकम्मल कहा है कुछ बाकी नहीं रह गया किसी गिरह के लिये 5 लफ्ज़ों मे पोरी दास्तान बाँध दी है शफीक़ साहब आपने !!!
    तूर पे बर्क़ जो चमकी तो गनीमत ये रही
    एक लम्हा ही मेरे ख़्वाब की ताबीर हुई –मयंक
    वगर्ना रोशनी के नज़र के वार की दास्तान भी देखने वालों से सुनने को मिलती !!!
    सुकून ही मिला न कुछ फ़ज़ा मिली क़रार की
    गुज़र गयी तड़प-तड़प के ज़िन्दगी उधार की
    जिसमे भी उधार का साँसें भी उधार की दोनो जहान किसी और के !! हम यहाँ क्या करने आये हैं ???!! तडप तडप के इस वक़्फे को गुज़ारने के लिये ही सच कहा है !!!
    हयातो-मौत एक दूसरे से जूझते रहे
    तमाम रात चल रही थी बाज़ी जीत-हार की
    अहदे जवानी रो रो काटी पीरी मे लीं आँखे मूँद
    यानी रात बहुत जागे थे सुबह हुई आराम किया –मीर
    ये कालरात्रि ऐसे ही कटती है !!!
    चमन में सैर के लिए वो आ गए जो दफ़अतन
    उत्तर के रह गयी है शक्ल देखिये बहार की
    शफ़ीक़ साहब दफतन दाग़ देहलवी आ गये बयान के लहजे मे !! वाह वाह !!!
    ख़याले-ख़ाम भी है ये फ़िज़ूल दौड़-धूप भी
    तलाश और इस ज़माने में वफ़ाशिआर की
    मुझसे तू पूछने आया है वफा के मानी
    ये तेरी सादादिली मार न डाले मुझको
    चला रहे थे वो गले पे ख़ंजरे-सितम मगर
    बनी हुई थी रुत हमारे चेहरे पे क़रार की
    मैं शेर भूल गया लेकिन ग़ालिब की गज़ल –है बस कि हर इक उनके इशारे में निशाँ और //करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और मे एक शेर है जो यहाँ क़्वोट नहीं कर पा रहा हूँ !! ऐसा ही लज़ज़तदार शेर है !!!
    जनाबे-दाग़ की ग़ज़ल का है गुमान आपको
    अरे नहीं ग़ज़ल है शफ़ीक़े-ख़ाकसार की
    शफ़ीक़ रायपुरी साहब –इस मुख़्तलिफ अन्दाज़ के लिये और बेहतरीन बयान के लिये पूरी दाद !!! –मयंक

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