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T-24/24 जो सह सके न इक चुभन भी जां पे नोके-ख़ार की-असरारुल हक़ ‘असरार’

जो सह सके न इक चुभन भी जां पे नोके-ख़ार की
सुना रहे हैं दास्ताँ हमें सलीबो-दार की

अगर यही है ज़िन्दगी तो क्या करें ये ज़िन्दगी
न सुब्ह ऐतबार की न शाम ऐतबार की

हर इक दरे-मुराद से फिरे हैं नामुराद हम
बक़ौले-मीर सर धरे ये तुहमत अख़्तियार की

जो दिन को दिन कहा किये तो शब को भी कहा है शब
यही ख़ता है उम्र भर जो हमने बार-बार की

हसीनो-जां पज़ीर है मगर कभी न सके
कि ज़िन्दगी ने भी अदा तो आपकी शिआर की

हैं लज़्ज़तें अलग-अलग मगर जिसे जो भा गयी
तुम्हें तुम्हारी जीत की हमें हमारी हार की

वो साज़े-जां फ़िज़ा जो था कभी का अब ख़मोश है
कि बाज़गश्त सुन रहे हैं महज़ हम सितार की

मैं लफ़्ज़-लफ़्ज़ फ़िक्र को जो कर रहा था ख़ुशनगीं
ग़ज़ल मिसाल बन रही थी मोतियों के हार की

असरारुल हक़ ‘असरार’ 09410274896

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3 comments on “T-24/24 जो सह सके न इक चुभन भी जां पे नोके-ख़ार की-असरारुल हक़ ‘असरार’

  1. kya kehne Asrar sahab..behad umdaa ghazal .daad qubule’n

  2. Agar yahi hae zindagi to kya karein ye zindagi…..
    Bhai waaaahhhh
    Bahut achhi gazal hui hae. Badhayi swikaar karein Asraar sahab
    Sadar
    Pooja

  3. kya kahne Asraar ul haq Asraar sahab …
    bahut umda gazal hui hai
    dili daad qubool keejiye

    regards

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