21 टिप्पणियाँ

T-24/22 सहन तो हो नहीं रही है ज़िन्दगी उधार की-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

सहन तो हो नहीं रही है ज़िन्दगी उधार की
गुहार ख़ुद लगा रहा हूँ एकमुश्त वार की

क़दम क़दम पे तीरगी का इख़्तियार हो गया
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

हरेक आइने में अक्स था अलग अलग मिरा
न जाने ज़िंदगी ने कैसी शक्ल इख़्तियार की

बदन से रूह जा गिरी किसी के पांव पर मिरी
बची हयात जिस्म ने बग़ैर रूह पार की

हमारे शहर में हुआ अजीब हादिसा सुनो
कि साल बीतने को है गयी न रुत बहार की

मिरी उदासियों की उसने दास्तान मांग ली
तड़प के कह उठा ये दिल न बात छेड़ प्यार की

तुम्हारे शहर की ये वादियां बड़ी अजीब हैं
सदायें गूंजती नहीं यहां किसी पुकार की

प्रखर मालवीय ‘कान्हा’ 09911568839

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21 comments on “T-24/22 सहन तो हो नहीं रही है ज़िन्दगी उधार की-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. क़दम क़दम पे तीरगी का इख़्तियार हो गया
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

    Waah… Kya Tazmeen hai Bhai ….

    हरेक आइने में अक्स था अलग अलग मिरा
    न जाने ज़िंदगी ने कैसी शक्ल इख़्तियार की

    बदन से रूह जा गिरी किसी के पांव पर मिरी
    बची हयात जिस्म ने बग़ैर रूह पार की

    Bahut achhi Ghazal hai chhote ustaad… Bahut Mubarakbaad…

  2. सहन तो हो नहीं रही है ज़िन्दगी उधार की
    गुहार ख़ुद लगा रहा हूँ एकमुश्त वार की
    अरे वाह कान्हा !! क्या बात है क्या बात है भई वाह !! वाह वाह वाह वाह !! क्या शेर कहा है !!! मुहब्बत या दौरे हाज़िर की बेदादियाँ दोनो पर शेर खरा कहा है !! वाह !!
    क़दम क़दम पे तीरगी का इख़्तियार हो गया
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’
    क्या खूब इस नज़रिये से तो किसी और ने नहीं सोचा !! क्या बात है !! एक शेर — सूरज पे तूने आँख तरेरी थी याद कर
    बीनैयों पे फिर जो असर रोशनी का था –मयंक
    हरेक आइने में अक्स था अलग अलग मिरा
    न जाने ज़िंदगी ने कैसी शक्ल इख़्तियार की
    जिन आइनों मे बाल है उनसे दूरी बर्तिये !! हा हा हा !!! ):
    बदन से रूह जा गिरी किसी के पांव पर मिरी
    बची हयात जिस्म ने बग़ैर रूह पार की
    कमाल की बात कही है शेर में –बकौल शिकेब –
    मुझको गिरना है तो मैं अपने ही कदमों मे गिरूँ
    जिस तरह सया ए दीवार पे दीवार गिरे –शिकेब
    वगर्ना –कान्हा का शेर आगे की दास्तान के लिये कहा जाय !!!
    हमारे शहर में हुआ अजीब हादिसा सुनो
    कि साल बीतने को है गयी न रुत बहार की
    दोस्त अपनी बीनाई तो सावन मे गई थी –यानी हमारे जैसे और भी हैं हमारे शहरे नाबीना मे !! ??!!
    मिरी उदासियों की उसने दास्तान मांग ली
    तड़प के कह उठा ये दिल न बात छेड़ प्यार की
    ठीक है !!!
    तुम्हारे शहर की ये वादियां बड़ी अजीब हैं
    सदायें गूंजती नहीं यहां किसी पुकार की
    दो सदा तो दर खुले ऐसा मकाँ कोई नहीं
    इस मजारों के नगर में हमज़ुबाँ कोई नहीं
    ‘कान्हा’ !! बहुत बहुत बधाई –दिल जीत लिया आपकी ग़ज़ल ने !! –मयंक

  3. bahut umda gazal hui hai mere bhai

    हरेक आइने में अक्स था अलग अलग मिरा
    न जाने ज़िंदगी ने कैसी शक्ल इख़्तियार की

    बदन से रूह जा गिरी किसी के पांव पर मिरी
    बची हयात जिस्म ने बग़ैर रूह पार की

    ye do sher to khaas taur se pasand aaye

    dili mubarakbad

  4. हमारे शहर में हुआ अजीब हादिसा सुनो
    कि साल बीतने को है गयी न रुत बहार की
    तुम्हारे शहर की ये वादियां बड़ी अजीब हैं
    सदायें गूंजती नहीं यहां किसी पुकार की
    लाजवाब ग़ज़ल प्रखरji -वाह !!!!! Waah waaah kya baat h

  5. हमारे शहर में हुआ अजीब हादिसा सुनो
    कि साल बीतने को है गयी न रुत बहार की

    तुम्हारे शहर की ये वादियां बड़ी अजीब हैं
    सदायें गूंजती नहीं यहां किसी पुकार की

    लाजवाब ग़ज़ल प्रखर -वाह !!!!! जियो

  6. बदन से रूह जा गिरी किसी के पांव पर मिरी
    बची हयात जिस्म ने बग़ैर रूह पार की
    WAhhhhh WAhhhhh kanha bhai

  7. Kamaal ki gazal hui hai prakhar bhai…yun hi kahte rahiye…saadhun

  8. Prakhar bhai kamaal gazal hui hae. . Dheron dher daad qubool karein.
    Pooja:)

  9. हरेक आइने में अक्स था अलग अलग मिरा
    न जाने ज़िंदगी ने कैसी शक्ल इख़्तियार की

    waah waah !! bahut khoob bhai !!

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