16 टिप्पणियाँ

T-24/21 हरी-भरी हैं वादियां समंदरों के पार की-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

हरी-भरी हैं वादियां समंदरों के पार की
मगर वो ठंडकें हमारे नीम सायादार की

यक़ीन की गुमान की दुआ की इंतिज़ार की
हमारी दासतां रही है अनसुनी पुकार की

रखी है आबरू तिरे किये हर एक वार की
अमान की तलब न की न चाह ग़मगुसार की

मुशावरत हुर्इं कई नसीहतें हुईं बहुत
मगर रविश वही रही दिले-वफ़ाशिआर की

हुआ जो शेर सरबसर तमाम ज़ख्‍़म खुल गए
जहां पे चोट थी लगी वहीं सुख़न ने मार की

हमारे ग़मकदे में आके हाल पूछते हो क्‍या
बुझी शम’अ दलील है फि़राक़-ए-हुस्‍न-यार की

सुख़़नवरी सिपहगरी इबादतें ज़ि‍यारतें
कोई भी तो बदल नहीं हुई तुम्‍हारे प्‍यार की

तमाचे धूप के ज़मीं के रुख़ पे आग रख गए
दुलारने लगीं फ़लक से उंगलियां फुहार की

ख़ुदानख्‍़वास्‍ता कभी तुझे मिरी तलाश हो
तो रास्‍तों पे ही उमीद रखियो तू दुचार की

यहां सिवा खि़ज़ां के और रुत कोई नहीं रही
मगर तलब रही है सिर्फ़ अजनबी बहार की

यहां कहां पे अब्र है शजर नहीं समर नहीं
किसे जलाने आगई हवा ये रेगज़ार की

ज़रा सी बात थी अना के ग़ार में बदल गई
न वो भुला सके उसे न हमने दरकिनार की

खि़ज़ां प अब ज़वाल है मगर ये डर का हाल है
सहम सहम के झांकती हैं कोंपलें अनार की

हर एक तीरगी में नूर और ग़म का ख़ौफ़ दूर
ये दिल है इक शम’अ उसकी याद के मज़ार की

सफ़र का जोश था क़दम उठे तो फिर न रुक सके
न उनके बस की बात थी न अपने इख़्तियार की

चमन तिरे बदन के अक्‍स के सिवा नहीं रहे
हर इक कली निशां हुई अगर तिरे निगार की

वो जिसकी छांव में जहां की धूप से पनाह है
उसी बदन की शोख़ियाँ दलील हैं शरार की

जो है नज़र के सामने वो सच का एक जुज्‍़व है
कर्इ तहें बची हुई हैं राज़े-आश्‍कार की

मुबादा इसके जोश से समाअतें ही जल उठें
‘ये दास्‍तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

बसीरतों पे रह गया मदार उसकी दीद का
‘ये दास्‍तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

वो रूप राहे-चश्‍म से उतर गया वुजूद में
‘ये दास्‍तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

क़त’आ
चलो कि चाक-ए-दामने-तही का एहतमाम है
चलो कि फिर से मुंत‍ज़ि‍र है रात इंतिज़ार की
चलो कि ज़ि‍न्‍दगी कमाल की तलब है कर रही
चलो कि राह खुल गई है अब हिसारे-दार की
चलो कि आंधियां हमारी राहबर बनेंगी अब
चलो कि मंज़ि‍लें तमाम होगी रेगज़ार की
चलो कि तश्‍नालब भी हो चलो थकन भी है बहुत
चलो कि ये सफ़र है शर्त आखि़री क़रार की

मनोज मित्तल ‘कैफ़’ 09887099295

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16 comments on “T-24/21 हरी-भरी हैं वादियां समंदरों के पार की-मनोज मित्तल ‘कैफ़’

  1. शुक्रिया इरशाद साहब।

  2. Kaif sahab ,kamaal, bemisaal ,khoobsoorat purasar ,mukkamil or behad umda gazal hui hae. Dher sari taliyon ki gadgadahat ke saath mubarakbaad qubool farmayein.
    Sadar
    Pooja

  3. Mayank ji ke kehne ke baad kuch bachta nahi hai kehne ko… Kaif Sahab bas itna kahunga… Hatss off 🙂

  4. क़ैफ साहब की गज़ल इसलिये विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि तरही मिसरा भी उअंकी ही ग़ज़ल के हवाले से हासिल किया गया है !! अब उन्हें इस ज़मीन पर एक समन्दर और खंगालना था जिसके कि वो मुस्तहक भी हैं क्योंकि इस समन्दर के ज्वार भाटे और गहराइयों से उनसे ज़ियादा वाकिफ और कौन हो सकता है !! और यह गज़ल काबिले सत्तैश भी है !! अरूज़े फिक्रो फन के मानदण्डों पर भी कहन और जदीदियत से ज़ाविये से भी !!! कोई काफिया बाकी नहीं रहा इस बार और सभी का बेहतरीन /सम्यक और खूबसूरत निर्वाह भी उन्होन्ने किया है !!!
    हरी-भरी हैं वादियां समंदरों के पार की
    मगर वो ठंडकें हमारे नीम सायादार की
    इसे NOSTALGIA कहते हैं !!मतले की नावेल्टी लुभा रही है !!
    यक़ीन की गुमान की दुआ की इंतिज़ार की
    हमारी दासतां रही है अनसुनी पुकार की
    ज़ुबान का शेर कहा है !!! एक भतकन और एक जुस्तजू –ज़िन्दगी की नियति है !!
    रखी है आबरू तिरे किये हर एक वार की
    अमान की तलब न की न चाह ग़मगुसार की
    समर्पण की बात है !!! और ये सम्बोधन ईश्वर वक्त या महबूब किसी के भी तईं बहुत अच्छा कहा है !!!
    मुशावरत हुर्इं कई नसीहतें हुईं बहुत
    मगर रविश वही रही दिले-वफ़ाशिआर की
    ये नातवान करारी शिकस्त देता है
    हम अपने दिल पे अगर ज़ोर आजमाते हैं –मयंक
    हमारे ग़मकदे में आके हाल पूछते हो क्या
    बुझी शम’अ दलील है फि़राक़-ए-हुस्नय-यार की
    रिवायत की रहगुज़र आज भी शाइरी की जल्वागाह है !! तस्दीक़ की इस शेर ने !!!
    सुख़़नवरी सिपहगरी इबादतें ज़ि‍यारतें
    कोई भी तो बदल नहीं हुई तुम्हाकरे प्यायर की
    बडी मुकम्मल परिभाषा है प्यार की !! कई ज़ाविये दायरे मे आ गये शेर के !!!
    तमाचे धूप के ज़मीं के रुख़ पे आग रख गए
    दुलारने लगीं फ़लक से उंगलियां फुहार की
    सानी मे जिस मौसम का ज़िक्र है उसकी आजकल सख़्त दरकार है UP मे !!
    ख़ुदानख़्िवास्ता् कभी तुझे मिरी तलाश हो
    तो रास्तोंस पे ही उमीद रखियो तू दुचार की
    यानी कि मैं तेरी तलाश मे आज भी दरबदर हूँ /भटक रहा हूँ !!!
    यहां सिवा खि़ज़ां के और रुत कोई नहीं रही
    मगर तलब रही है सिर्फ़ अजनबी बहार की
    एक कदुवा सच है आम आदमी के ज़िन्दगी का !!!!
    यहां कहां पे अब्र है शजर नहीं समर नहीं
    किसे जलाने आगई हवा ये रेगज़ार की
    ये हवा नौहागरी के लिये तो नहीं आई !!! जलाने ही आई है पहले से जले हुये को !!
    ज़रा सी बात थी अना के ग़ार में बदल गई
    न वो भुला सके उसे न हमने दरकिनार की
    इस तरह साथ निभना है दुश्वार सा
    तू भी तलवार सा मैं भी तलवार सा –बशीर
    खि़ज़ां प अब ज़वाल है मगर ये डर का हाल है
    सहम सहम के झांकती हैं कोंपलें अनार की
    तल्ख़ अहसासात जल्द नहीं मिटते !!!
    सफ़र का जोश था क़दम उठे तो फिर न रुक सके
    न उनके बस की बात थी न अपने इख़्तियार की
    बहुत खूब अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं !!!
    जो है नज़र के सामने वो सच का एक जुज़्ीव है
    कर्इ तहें बची हुई हैं राज़े-आश्कावर की
    सब कहाँ कुछ – yes !! कुछ लाला –ओ गुल मे नुमाया हो गईं
    मुबादा इसके जोश से समाअतें ही जल उठें
    ‘ये दास्ताोन है नज़र पे रौशनी के वार की’
    मूल गज़ल का शेर बेहतर था !!! रोशनी से समाअतों का जलना ??!! दूर की बात है !!!
    बसीरतों पे रह गया मदार उसकी दीद का
    ‘ये दास्ता न है नज़र पे रौशनी के वार की’
    ये शेर बहुत खूब कहा है !!! वाह वाह !!!
    वो रूप राहे-चश्मह से उतर गया वुजूद में
    ‘ये दास्ताून है नज़र पे रौशनी के वार की’
    खूबसूरत !! यकीनन खूबसूरत कहा है !!!!
    क़त’आ
    चलो कि चाक-ए-दामने-तही का एहतमाम है
    चलो कि फिर से मुंतज़िए‍र है रात इंतिज़ार की
    चलो कि ज़ि‍न्दिगी कमाल की तलब है कर रही
    चलो कि राह खुल गई है अब हिसारे-दार की
    चलो कि आंधियां हमारी राहबर बनेंगी अब
    चलो कि मंज़ि‍लें तमाम होगी रेगज़ार की
    चलो कि तश्नाालब भी हो चलो थकन भी है बहुत
    चलो कि ये सफ़र है शर्त आखि़री क़रार की
    मनोज मित्तल ‘कैफ़’ साहब !! पहले गज़ल फिर कतआ –इस ज़मीन को शाइरी आपके नाम से मंसूब करेगी !!! बहुत शानदार प्रस्तुति है आपकी !!! बधाई –मयंक

    • मयंकजी आपकी मुहब्‍बत का बेहद शुक्रिया। काफ़ी दिनों के बाद अज मेरे कंप्‍यूटर पर साइट खुल पाई है। ताख़़ीर की यही वजह रही।

  5. taveel ghazal….. behtareen ashaar……khoob soorat qita….wah wah..bahut khoob

  6. taveel ghazal behtareen ashaar……aur qita….bahut khoob…….tahe dil se daad qubool farmayen ……wah wah

  7. कैफ़ साहब ये आपके हुनर का कमाल है कि तवील ग़ज़ल होने के बावजूद एक भी शेर कमज़ोर नहीं है । ढेरों दाद क़बूलें

    नीरज

  8. Kya kahne Kaif sahab…bahut umda gazal hui hai …
    dili mubarakbad qubool keejiye

  9. Kamaal hai kaif sahab kya bharpoor ghazal kahi hai waah waah
    Pichhli ghazal se bhi ziyaada pasand aayi ye ghazal bahut bahut mubarakbaad..

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