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T-24/20 मैं दास्ताँ सुना रहा था एक रेगज़ार की-दिनेश नायडू

मैं दास्ताँ सुना रहा था एक रेगज़ार की
कहाँ से मुझमें आ गयीं सदायें आबशार की

अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की

न कोई आरज़ू, न कोई ख़ाब है, न जुस्तजू
किसी ने दिल के शहर में कुछ ऐसी लूटमार की

अभी तो सिर्फ दश्त की हवाएं रास आईं हैं
अभी तो इब्तिदा हुई है अपने इंतिशार की

कभी लगाईं थी तुम्हें पुकार मैंने टूट कर
भटक रही है वादियों में रूह उस पुकार की

हमें जुनूँ हमेशा मंज़िलों से दूर ले गया
सो अब की बार हमने बस सुनी ही रहगुज़ार की

वो आ गया मुंडेर पे न जाने आगे क्या हुआ
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की ”

दिनेश नायडू 09303985412

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15 comments on “T-24/20 मैं दास्ताँ सुना रहा था एक रेगज़ार की-दिनेश नायडू

  1. Badhiya ghazal hai dinesh bhai….waah…waah

  2. shandaar ghazal…girah bahut badhiya….wahhhh

  3. Waah waah waah….
    Dheron daad qubool karein Dinesh ji . Bahut umda gazal hui hae.
    Sadar
    Pooja

  4. मैं दास्ताँ सुना रहा था एक रेगज़ार की
    कहाँ से मुझमें आ गयीं सदायें आबशार की
    रवानी और तसाद दोनो काबिले सत्ताइश हैं शेर मे !! वाह !!!
    अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
    बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की
    निगाह के दिये बिखरना !!! ज़बान दिलकश है !!!
    न कोई आरज़ू, न कोई ख़ाब है, न जुस्तजू
    किसी ने दिल के शहर में कुछ ऐसी लूटमार की
    वाह वाह !!! इसी मफ्हूम पर एक शेर — खूब आती थी शिकन मेरी ज़बीं पर भी कभी
    जब मैं इस दौर के गूँगों मे नहीं शामिल था –मयंक
    अभी तो सिर्फ दश्त की हवाएं रास आईं हैं
    अभी तो इब्तिदा हुई है अपने इंतिशार की
    इब्तिदा ए इश्क है …. आगे – आगे देखिये !!! शेर पर दाद !!
    हमें जुनूँ हमेशा मंज़िलों से दूर ले गया
    सो अब की बार हमने बस सुनी ही रहगुज़ार की
    दिनेश आप शायर हो भाई !! आवारगी की आबरू रखो !!! ):
    वो आ गया मुंडेर पे न जाने आगे क्या हुआ
    “ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की ”
    सूरज उगने से जोडा है महबूब के इम्कान को !! बहुत खूब !!! बहुत खूब !!
    दिनेश भाई बहुत खूब !! दाद !! –मयंक

  5. dinesh..kamaal ki ghazal hui hai….matla is qadar khoobsurat hai ke jiska jawaab nahi…uske baad ke teen she’r bhi kamaal hue hain…. waah waah waah

  6. वाह वाह
    शफीक रायपुरी

  7. अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
    बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की

    न कोई आरज़ू, न कोई ख़ाब है, न जुस्तजू
    किसी ने दिल के शहर में कुछ ऐसी लूटमार की

    वाह दिनेश भाई वाह ,सुभानअल्लाह ,कमाल किया है आपने । एक एक शेर खड़े हो कर तालियाँ बजवा रहा है । बेजोड़ शायरी

    नीरज

  8. अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
    बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की

    अभी तो सिर्फ दश्त की हवाएं रास आईं हैं
    अभी तो इब्तिदा हुई है अपने इंतिशार की

    कभी लगाईं थी तुम्हें पुकार मैंने टूट कर
    भटक रही है वादियों में रूह उस पुकार की

    Ahaa..

    kya kahne Dinesh bhai ….nihayat hi khoobsoorat gazal hui hai..

    dili daad

  9. क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है
    ज़िंदाबाद !!!

  10. Ek do teen nahi saare ashaar achche hain dinesh aur kuchh to bahut achchhe hain..bhai bahut bahut mubarakbaad..

  11. अँधेरे में बिखर गए सभी दिए निगाह के
    बड़ी तवील रात थी तुम्हारे इंतज़ार की
    हमें जुनूँ हमेशा मंज़िलों से दूर ले गया
    सो अब की बार हमने बस सुनी ही रहगुज़ार की
    Wahh wahhh bhaia
    bahut achi gazal hui hai
    dili daad qubul kijiye

    sadar
    IMran

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