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T-24/18 क़ज़ा को मिल गयी है फिर घड़ी उसी क़रार की-पूजा भाटिया

क़ज़ा को मिल गयी है फिर घड़ी उसी क़रार की
भरी बहार में गिरीं जो पत्तियां चिनार की

चिलम में भर के ग़म नए जो खींचते रहे हैं क़श
मज़े में ही गुज़र रही है ज़िन्दगी ख़ुमार की

लरज़ रहे हैं होंठ भी, है आँख भी भरी हुई
लड़ाई लड़ रहे हैं अश्क जैसे आर पार की

वो देखिये तो बादलों ने भेस कितने धर लिए
ठनेगी आज कितनों से न जाने इस फ़ुहार की

न झुक सकी निगाह जो बुझा दिया गया उसे
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

गुज़र गयी जो ज़िन्दगी सुकून से थी वो भरी
समन्दरों में कश्तियाँ हो दोस्त जैसे धार की

जहां तलक नज़र गयी ग़ुबार ही ग़ुबार था
दिखा रहा था आइना भी शक्ल सब उतार की

भरे जो रंग थे ग़ज़ल में वो न जाने क्या हुए
मिरी क़लम की तुमतराक़ किसने तार तार की

ठहर गया है मुझ में सारा वक़्त तेरे साथ का
है ज़ह्न में अभी भी बू तिरे हर इक सिगार की

ये शर्त किसने है रखी, फ़लक़ -ज़मीं के सामने
हो दूरियां ही दरमियाँ, मगर नज़र हो प्यार की

भंवर के पास आते ही जो तैर कर निकल गया
वो शख़्स बात कर रहा है मुझसे एतबार की

रुको ज़रा, न जाओ तुम, अभी नहीं, अभी नहीं
ये कैसी रट लगा रखी है तुमने बार-बार की

वो एक दौर था कि जब था तू ही तू हर इक तरफ़
ये एक दौर है कि अब है हर ख़ुशी उधार की

ये तीरगी कहीं न जीत जाय रौशनी से सो
चिरौरी एक दिये की हमने जाने कितनी बार की

पूजा भाटिया 08425848550

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28 comments on “T-24/18 क़ज़ा को मिल गयी है फिर घड़ी उसी क़रार की-पूजा भाटिया

  1. Achhi ghazal kahi hai, salaamat rahiye

  2. khoobsoorat ghazal par badhaayi…wahhh

  3. ये शर्त किसने है रखी, फ़लक़ -ज़मीं के सामने
    हो दूरियां ही दरमियाँ, मगर नज़र हो प्यार की

    bahut khuub

  4. लरज़ रहे हैं होंठ भी, है आँख भी भरी हुई
    लड़ाई लड़ रहे हैं अश्क जैसे आर पार की
    बहुत ही सुन्दर अर्थ है ज़ब्त और ज़ब्त के कारन का द्वन्द्व बडी मर्मस्पर्शी तस्वीर के साथ सामने आया है !!!
    न झुक सकी निगाह जो बुझा दिया गया उसे
    “ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”
    अच्छी गिरह है !! बहर्क़ैफ सानी मिसरा तूर के एक मंज़र की ओर स्पष्ट इशारा करता है लेकिन इसके इतर अर्थों मे इसका इस्तेमाल काबिले सत्ताइश है !!!
    भरे जो रंग थे ग़ज़ल में वो न जाने क्या हुए
    मिरी क़लम की तुमतराक़ किसने तार तार की
    एक लफ़्ज़ तुमतराक –जदीदियत का पैरोकार है और कामयाब है !!!
    ये शर्त किसने है रखी, फ़लक़ -ज़मीं के सामने
    हो दूरियां ही दरमियाँ, मगर नज़र हो प्यार की
    एक काइअनाती मंज़र से एक बात निकाली है !!
    भंवर के पास आते ही जो तैर कर निकल गया
    वो शख़्स बात कर रहा है मुझसे एतबार की
    एक शेर है शिकेब जलाली का — छुडा के हाथ बहुत दूर बह गया है चाँद
    किसी के साथ समन्दर में डूबता है कोई –शिकेब
    ये तीरगी कहीं न जीत जाय रौशनी से सो
    चिरौरी एक दिये की हमने जाने कितनी बार की
    हमारे पास कठिन वक्त से लडने के संसाधन बेहद कम हैं और हम उनपर अति आश्रित हैं !! इस पर शिकेब का एक शेर है — क्यों रो रहे हो राह के अन्धे चराग़ को
    क्या बुझ गया हवा से लहू का शरार भी –शिकेब
    ग़ज़ल पूरी तारीफ की हकदार है !! इसमे सिगार जैसे नये सिम्बल्स को जदीदियत के साथ निभाया गया है और शायरा ने अपने वर्तमान परिवेश को कैंवास पर रखा है जो इज़हार के साथ कथ्य की ईमानदारी है !! तस्व्वुर का भी जितना ज़रूरी है उतना इस्तेमाल किया गया है !!! जदीदियत से इतर जो शेर बेहतर अर्थ पैदा कर सके हैं और शेर की बुनियादी आवश्यकताओं जैसे कि दोनो मिसरों क अलग अलग सम्पूर्ण होना और ऊला सानी के सन्योग से तीसरा अर्थ निकलना इस अर्थ का भी काफिये पर आ कर अर्थ विस्फोट करना जैसी बारीकियाँ भी अनेक अश आर मे सर की गईं – इसलिये गज़ल पर दाद !!!

  5. Kya kehne puja ji..behad umdaa ..waah waah waah

  6. Khoobsoorat gazal hui hai Pooja ji..

    dili daad

  7. न झुक सकी निगाह जो बुझा दिया गया उसे
    “ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

    क्या बात है। बहुत उम्दा गिरह लगाईं है पूजा जी।
    हर एक शेर खूबसूरत। बहुत अच्छे लफ्ज़ पिरोये हैं आपने।

    इस क़ामयाब और बेमिसाल ग़ज़ल के लिए बधाई।

    नकुल

  8. पूजा जी,
    ज़बान के इतने सुंदर प्रयोग के लिए बहुत बधाई।
    क्‍या ही अच्‍छी ग़ज़ल हुई है।भरपूर दाद।
    सादर
    नवनीत

    • नवनीत जी हौसला बढ़ने का तहेदिल से शुक्रोय।
      मैं आभारी हूँ।
      सादर
      पूजा

  9. लरज़ रहे हैं होंठ भी, है आँख भी भरी हुई
    लड़ाई लड़ रहे हैं अश्क जैसे आर पार की

    उम्दा ग़ज़ल पूजा जी !!

  10. Behtareen behtareen behtareen
    Bahut Achchi ghazal hui pooja ji
    Dher saari mubarakbaad…

    • इरशाद जी
      तीन बेहतरीन ने मुझे शब्दशून्यता पर पहुँच दिया है।:)
      आपका ग़ज़ल अच्छी लगी जान कर अच्छा लगा।
      आपका तहेदिल से शुक्रिया।
      सादर
      पूजा

  11. पूजा जी क्या कमाल किया है आपने वाह तवील ग़ज़ल होने के बावजूद हरिक शेर क़रीने से तराशे गये हीरे की तरह चमक रहा है ।
    सुभानअल्लाह – जियो । इतने कम वक़्त में शायरी में इस मयार तक पहुँचना हैरत अंगेज़ है , ये करिश्मा आपने अपनी मेहनत और लगन से हासिल किया है । आप और आपकी शायरी की जितनी तारीफ़ की जाय कम है ।
    ढ़ेरों दाद क़बूल करें

    • नीरज जी
      आपकी दुआएं हैं। आपके शब्द हमेशा हौसला बढ़ाते हैं आपका बेहद शुक्रिया।स्नेह यूँही बनाये रखियेगा।
      सादर
      पूजा:)

  12. ये शर्त किसने है रखी, फ़लक़ -ज़मीं के सामने
    हो दूरियां ही दरमियाँ, मगर नज़र हो प्यार की

    भंवर के पास आते ही जो तैर कर निकल गया
    वो शख़्स बात कर रहा है मुझसे एतबार की

    रुको ज़रा, न जाओ तुम, अभी नहीं, अभी नहीं
    ये कैसी रट लगा रखी है तुमने बार-बार की
    Wahhh wahhh
    pooja ji bahut achi gazal hui hai
    dili daad qubul kijiye

  13. Behad khoobsoorat ghazal pooja ji.
    Bahut khoob…

  14. ये शर्त किसने है रखी, फ़लक़ -ज़मीं के सामने
    हो दूरियां ही दरमियाँ, मगर नज़र हो प्यार की

    वो एक दौर था कि जब था तू ही तू हर इक तरफ़
    ये एक दौर है कि अब है हर ख़ुशी उधार की

    लरज़ रहे हैं होंठ भी, है आँख भी भरी हुई
    लड़ाई लड़ रहे हैं अश्क जैसे आर पार की

    चिलम में भर के ग़म नए जो खींचते रहे हैं क़श
    मज़े में ही गुज़र रही है ज़िन्दगी ख़ुमार की

    पूजा जी … बहुत संजीदगी से ग़ज़ल कही है आपने… सभी शेर बहुत पसंद आये ….

    बहुत बहुत शुक्रिया

    दिनेश

    • ग़ज़ल आपको पसंद आई जान कर अच्छा लगा। शुक्रिया
      पूजा

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