19 टिप्पणियाँ

T-24/15 ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की-नीरज गोस्वामी

ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की
कभी तो बात भी हो पालकी लिए कहार की

गुलों की तितलियों की वो भला करेगा बात क्या
जिसे कि फ़िक्र रात दिन लगी हो रोज़गार की

बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की

वो खुश रहे ये सोच कर सदा मैं हारता गया
लड़ाई जब लड़ी किसी के साथ आर-पार की

जिसे भी देखिये इसे वो तोड़ कर के ही बढ़ा
कहाँ रहीं हैं देश में ज़रूरतें क़तार की

तुझे पढ़ा हमेशा मैंने अपनी बंद आँखों से
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

नीरज गोस्वामी 09860211911

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19 comments on “T-24/15 ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की-नीरज गोस्वामी

  1. kya kahne Sir…kya kahne ..
    bharpoor gazal hui hai ..
    Mayank bhaiya ne pahle hi itna kuch kah diya ki ab main kya kahuu..n..

    dili daad qubuul keejiye

    regards

    • आलोक आप जैसे होनहार शायर जब तारीफ़ करते हैं तो सच में झैंप जाता हूँ ।आप लोग ही आने वाले वक़्त में शायरी का परचम ऊँचा उठाये रखेंगे । स्नेह बनाये रखें

      नीरज

  2. ग़ज़ल के आशिक़ों की बात हो और नीरज गोस्‍वामी साहब का जि़क्र न हो, यह हो नहीं सकता।
    मयंक भाई साहब ने क्‍याख़ूब लिखा है कि , ‘ बधाई मोगरे के फूलों के लिए’
    वास्‍तव में बहुत ख़ूबसूरत अश्‍आर को पढ़ कर बहुत अच्‍छा लगा। सारी ग़ज़ल के लिए भरपूर दाद भाई साहब।

    ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की
    कभी तो बात भी हो पालकी लिए कहार की

    गुलों की तितलियों की वो भला करेगा बात क्या
    जिसे कि फ़िक्र रात दिन लगी हो रोज़गार की

    बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की

    वो खुश रहे ये सोच कर सदा मैं हारता गया
    लड़ाई जब लड़ी किसी के साथ आर-पार की

    जिसे भी देखिये इसे वो तोड़ कर के ही बढ़ा
    कहाँ रहीं हैं देश में ज़रूरतें क़तार की

    तुझे पढ़ा हमेशा मैंने अपनी बंद आँखों से
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

    वाह…………….वा……………
    सादर
    नवनीत

    • नवनीत भाई ये आपका और मयंक भाई का प्यार है जिसकी वजह से आप मेरे बारे में इतना अच्छा कह रहे हैं ।भाई मैं कोई बड़ा शायर नहीं , अपनी सीमायें जानता हूँ सीधी सरल भाषा में अपनी बात कहता हूँ । अभी तो सीखने की शुरूआत ही की है और तमन्ना है हमेशा सीखता ही रहूँ । द्विज भाई का भी शुक्रगुज़ार हूँ और रहूँगा मैंने उनकी उँगली पकड़ कर ही पहला क़दम उठाया था । स्नेह बनाये रखें

      नीरज

  3. क्या बात है गुरुदेव।
    बहुत शानदार अशआर।
    बहुत सूंदर ग़ज़ल हुई है।

    आप की ग़ज़लें हमेशा मार्गदर्शन करती हैं।
    मयंक जी की समीक्षा से मैं शब्दशः सहमत हूँ।

    यूँ ही रौशनी बांटते रहिये।

    नकुल

  4. तपस्या हो या दीवानगी !!! दोनो रियाज़ आपके किरदार में प्रभुता लाती है !!नीरज भाई गज़ल के दीवाने हैं और अब तपस्वी भी हैं !! हाथ कंगन को आरसी क्या !! ये गज़ल खुद ही एक जीता जागता बयान है कि जदीदियत और इज़हार दोनो मे उन्होने बरस भर मे बरसों का फासला तय कर लिया है !!!
    ज़बान पर सभी की बात है फ़क़त सवार की
    कभी तो बात भी हो पालकी लिए कहार की
    इस शेर पर ज़ोरदार तालियाँ क्योंकि इन काफियों का इस्तेमाल ही खुद में काबिले तारीफ है – इसी ख्याल पर बरसों पहले का एक शेर — वो जिसकी राह कहीं जुर्म औ गुनाह मे है
    उसी का काफिला किस्मत की शाहराह में है
    गुलों की तितलियों की वो भला करेगा बात क्या
    जिसे कि फ़िक्र रात दिन लगी हो रोज़गार की
    बिल्कुल!! एक सच है ये !! तुमसे भी दिलफरेब हैं गम रोज़गार के –संसार के गम गेम जानाम पर भारी पडे हैं !!
    बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की
    तस्लीम !!! मैं इस ख्यल का हामी हूँ !!
    मयंक आवारगी की लाज रखना
    तुम्हारी ताक में मंज़िल खडी है -मयंक
    वो खुश रहे ये सोच कर सदा मैं हारता गया
    लड़ाई जब लड़ी किसी के साथ आर-पार की
    दुश्मन मिरी शिकस्त पे मुँह खोल के हँसा
    और दोस्त अपने जिस्म के अन्दर उछल पडे –मयंक
    जिसे भी देखिये इसे वो तोड़ कर के ही बढ़ा
    कहाँ रहीं हैं देश में ज़रूरतें क़तार की
    तालियाँ और दाद !!! इस शेर मे एक फल्सफहा भी छुपा है –चौथी सम्त जाना चाहिये !! बन्दिशें तोदने के लिये और पाब्न्दियाँ लाँघने के लिये होती हैं बहुत बार ये दुस्साहस नहीं साहस ही होता है –लिहाजा कतार बाँधने और ताली बजाने वलों के देश में जिसने परिधि के बाहर जा कर त्बीतय आजमाई उसई को कामयाबी मिली !! वाह !!
    तुझे पढ़ा हमेशा मैंने अपनी बंद आँखों से
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’
    बहुत अच्छा निभाया है तरही मिसरे को !!
    नीरज साहब !! गज़ल मे ताज़गी है और अशार में खूब दम है –बहुत बहुत बधाई –इन मोंगरे के फूलों के लिये –मयंक

    • मयंक भाई
      तस्लीम करता आया हूँ और करता रहूँगा कि आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा है , आपसे रूबरू नहीं मिला लेकिन कभी इस बात का अहसास नहीं हुआ कि आप अजनबी हैं। आपको ग़ज़ल के अशआर पसंद आये मतलब आप से सीख कर जिस राह पर चल रहा हूँ वो कहीं न कहीं तो ले ही जाएगी , भटकाएगी नहीं। इस हौसला अफ़ज़ाही का तहे दिल से शुक्रिया।

      नीरज

  5. kya kahne neeraj ji..matla bahut umda…

    बिगड़ के जिसने पा लिया तमाम लुफ़्ते-ज़िन्दगी
    बशर सुनेगा ही नहीं वो बात फिर सुधार की
    ye she’r to aapne khaas apne liye kaha lagta hai… 😉

    bahut Mubarak….

    • झूट होगा अगर कहूँ कि आपको पढ़ कर मुझे अहसास-ऐ-कमतरी नहीं होता। ग़ज़ल को जिस अंदाज़ से आप कहते हैं वो निराला है। मेरा अंदाज़ आपसे बिलकुल मुक्तलिफ़ है फिर भी आपको पसंद आया तो मेरे लिए ये बात बाइसे फक्र है। हौसला अफ़ज़ाही का तहे दिल से शुक्रिया।

      नीरज

  6. वो खुश रहे ये सोच कर सदा मैं हारता गया
    लड़ाई जब लड़ी किसी के साथ आर-पार की

    क्या अच्छी ग़ज़ल हुई है नीरज साहब, वाह, बहुत बहुत मुबारकबाद 🙂

    • सच कहूँ ये सोच कर फूल कर कुप्पा हुआ जा रहा हूँ कि आपने मेरी ग़ज़ल पढ़ी और पढ़ कर पसंद की। अब बताइये और जीने को क्या चाहिए ? हौसला अफ़ज़ाही का शुक्रिया भाई।

      नीरज

  7. गुलों की तितलियों की वो भला करेगा बात क्या
    जिसे कि फ़िक्र रात दिन लगी हो रोज़गार की
    WAhhhh wahhhhh
    Dili daad qubul kijiye

  8. bahut umda ghazal hui hai neeraj ji..girah bhi khoob hai ..waah..badhai

  9. Waah Neeraj ji . Achhi gazal hui hae. Dili daad qubool karein.
    Sadar
    Pooja

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