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T-24/14 गुलों का ज़िक्र भी नहीं, न मदहे-हुस्ने-यार की-डॉ आज़म

गुलों का ज़िक्र भी नहीं, न मदहे-हुस्ने-यार की
मेरी ग़ज़ल में बात है, रसन की और दार की

बताऊँ दास्तान क्या ,तुम्हें विसाले-यार की
कि इस से लुत्फ़ख़ेज़ तो, घड़ी थी इन्तिज़ार की

गुथे हैं हाथ हाथ में ,नज़र में कोई और है
नहीं नहीं नहीं नहीं, अदा नहीं ये प्यार की

नवा-ए-दर्दो-ग़म सुनो, सदा-ए-ज़ेरो-बम सुनो
ये मौज झील की नहीं, है धार आबशार की

चलो कि इश्क़ हो चुका, चलो कि लुत्फ़ मिल चूका
चलो कि कोशिशें करें, ग़मों के अब शुमार की

जूनूनो-वहशतें मिलीं, ग़मों को वुसअते मिलीं
ख़िज़ाँ के दुःख से बढ़ के थीं, अज़ीयतें बहार की
.
ये कैसा राज धर्म है, हमारे शह्रयार का
बनामे-नज़्मो-ज़ब्त है, यहां फ़क़त अनारकी (anarchy)

उजाला तो बहुत हुआ, सहर की धूम भी मची
मगर अभी कहाँ हुई, वो सुब्ह इन्तिज़ार की

न पूछ क्या गुज़र गयी, बसारते-कलीम पर
“ये दास्तान है नज़र, प रौशनी के वार की”

ख़बर किसी की कब हुयी, बिसाते-ज़ीस्त पर हमें
न शह की और न मात की, न जीत की न हार की

जो ग्यारह माह तक रहे, धंसे हुए गुनाह में
बनाये फिर रहे हैं अब, वो शक्ल दीनदार की

न फ़िक्र है न है बयां, न शेर हैं रवां दवां
अब ‘आज़म’ आप लीजिये, ग़ज़ल कोई उधार की

डॉ आज़म 09827531331

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23 comments on “T-24/14 गुलों का ज़िक्र भी नहीं, न मदहे-हुस्ने-यार की-डॉ आज़म

  1. Aaahahah, khizaN ke dukh se badh ke thin azeeyaten bahaar ki, Waaaaah, behtareen ghzal

  2. क्या बात है आज़म साहब।
    बहुत खूब ग़ज़ल।

    बहुत अच्छा लगा पढ़ के।
    मयंक जी की टिपण्णी के बाद कुछ कहने को नही रह जाता।
    हर एक शेर् ज़िंदाबाद।

    नकुल

  3. गुलों का ज़िक्र भी नहीं, न मदहे-हुस्ने-यार की
    मेरी ग़ज़ल में बात है, रसन की और दार की
    जो दौर का सच है वो ही बयान मे भी आना चाहिये !! तस्व्वुरात की तो कोई सरहद ही नहीं इसलिये गुलों की और हुस्ने यार की बात पलायनवाद जैसी होगी !! बडा सच्चा शेर कहा आपने !! आज का सच रसन और दार ही है !!!
    बताऊँ दास्तान क्या ,तुम्हें विसाले-यार की
    कि इस से लुत्फ़ख़ेज़ तो, घड़ी थी इन्तिज़ार की
    लज्जते सहरा नवर्दी दूरी ए मंज़िल में है —वाह वाह !!!!
    गुथे हैं हाथ हाथ में ,नज़र में कोई और है
    नहीं नहीं नहीं नहीं, अदा नहीं ये प्यार की
    इक नायिका है अंक में औ दूसरी पे ध्यान है
    दोनो समझती हैं कि उनका बालमा नादान है ): — आज का आशिक !!!
    नवा-ए-दर्दो-ग़म सुनो, सदा-ए-ज़ेरो-बम सुनो
    ये मौज झील की नहीं, है धार आबशार की
    एक ज़र्रे का भी टूटे न कहीं दिल वर्ना
    गर्मी ए बज़्म है इक र्क़्से शरर होने तक (नज़्रे गालिब)
    & चार सू जो खामुशी क साज़ है
    वो कयामत की कोई आवाज़ है –
    नवा-ए-दर्दो-ग़म सुनो, सदा-ए-ज़ेरो-बम सुनो… ये ज़रूरी है !!!
    ये कैसा राज धर्म है, हमारे शह्रयार का
    बनामे-नज़्मो-ज़ब्त है, यहां फ़क़त अनारकी (anarchy)
    बहुत खूब !!
    संवार नोक पलक अब्रुओं मे ख़म कर दे
    गिरे पडे हुये लफ़्ज़ों को मुहतरम कर दे _ाज़म साहब – अनार्की को आपने हैसियत दिला दी ग़ज़ल मे भी !!!
    उजाला तो बहुत हुआ, सहर की धूम भी मची
    मगर अभी कहाँ हुई, वो सुब्ह इन्तिज़ार की
    इक धुन्द है सहर की कहानी के नाम पर
    महफूज़ अब तलक हैं सियाही के बाब सब –मयंक
    न पूछ क्या गुज़र गयी, बसारते-कलीम पर
    “ये दास्तान है नज़र, प रौशनी के वार की”
    ये तूर का जल्वा है हर बार नहीं होता !! –लेकिन एक शाहिद बहुत है अफसाने के लिये !!
    जो ग्यारह माह तक रहे, धंसे हुए गुनाह में
    बनाये फिर रहे हैं अब, वो शक्ल दीनदार की
    सभी को रमज़ान मुबारक !!! (कहने की ज़रूरत नहीं आज़म साहब)
    न फ़िक्र है न है बयां, न शेर हैं रवां दवां
    अब ‘आज़म’ आप लीजिये, ग़ज़ल कोई उधार की
    आज़म साहब आप उधार बाँटने वालों मे हैं !!! सब जानते हैं !! मैं आपके अदाकर्ताओं को जानता हूँ हालाँकि वो नहे6 जानते कि मैं उन्हें जानता हूँ हा हा हा !!!
    बहर्क़ैफ इस खूबसूरत गज़ल के लिये हाथ थकने तक तालियाँ और ज़ुबाँ गुंग होने तक दाद !!! –मयंक

    • aap is qadar nawaaz dete haiN ki koi soorat nahi bachti shukr adaa karne ki …siwaye is ke ki rasman likh diya jaaye…dili shukriya…magar sach ye hai KI baat dil se pare rooh tak pahunch jaati hai…jo aap ki daad par fida hone ke liye tayyar dikhti hai..aap ne jo apne khoobsoorat ashaar quote kiye haiN…wo lazawaal hai…
      maqte ka raaz poshida hi rahe…hahahah
      bahut bahut shukriya bhai..Mayank ji

  4. bahut umda ghazal hai azam sahib… anarchy ka istemal behad pasand aaya…

  5. न फ़िक्र है न है बयां, न शेर हैं रवां दवां
    अब ‘आज़म’ आप लीजिये, ग़ज़ल कोई उधार की

    क्या ग़ज़ल में झूठ बोलने की भी इजाज़त होती है???

    क्या खूबसूरत फूल खिलाए है आपने साहब इस ज़मीन पर, मज़ा आ गया

    • hahaha….shair..hi.to jhoot bolte haiN bhai …maiN ne sach kaha hai,…aap jaise shayeron ki ghazleN padh kar ye ehsaas aur ghana ho jata hai…jo maqte meN bayan shuda hai…
      bahut shukriya daad ke liye

  6. जनाब आज़म साब।
    बहुत दाद। दिली दाद।
    सादर
    नवनीत

  7. bahut achhii gazal hui hai Aazm sahab …

    dili daad qubuul kare..n..

  8. गुथे हैं हाथ हाथ में ,नज़र में कोई और है
    नहीं नहीं नहीं नहीं, अदा नहीं ये प्यार की

    चलो कि इश्क़ हो चुका, चलो कि लुत्फ़ मिल चूका
    चलो कि कोशिशें करें, ग़मों के अब शुमार की

    उजाला तो बहुत हुआ, सहर की धूम भी मची
    मगर अभी कहाँ हुई, वो सुब्ह इन्तिज़ार की

    Aazam Bhai…Zindabaad…Zindabaad…waah waah waah…kya khoob ghazal kahi hai…dheron daad kabool karen bhai…

  9. Achchi gazal hui hae Azam sahab
    Dheron daad
    Sadar
    Pooja

  10. Bahut achhi ghazal hui hai Azam sahab..waah waah

  11. Kya achi gazal hui hai
    dili daad kubul kijiye

  12. उजाला तो बहुत हुआ, सहर की धूम भी मची
    मगर अभी कहाँ हुई, वो सुब्ह इन्तिज़ार की

    न पूछ क्या गुज़र गयी, बसारते-कलीम पर
    “ये दास्तान है नज़र, प रौशनी के वार की”

    ख़बर किसी की कब हुयी, बिसाते-ज़ीस्त पर हमें
    न शह की और न मात की, न जीत की न हार की

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