25 Comments

T-24/13 कुछ और देर के लिए है शोरिशें ग़ुबार की-बकुल देव

कुछ और देर के लिए हैं शोरिशें ग़ुबार की
न दिन हैं फिर चढ़ाव के न रात हैं उतार की

नयी रुतों के जिस्म पर ग़ुबार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की

जब आ सकी न इश्क की मुसाफ़िरत मक़ाम तक
तो मुश्किलों ने मंज़िलों की शक्ल इख़्तियार की

सजे-सजाये ख़्वाब थे जो गर्द-गर्द हो गये
निदा ज़मीं प आ गई है आसमां के पार की

निबाहना हमें भी मुश्किलों के साथ आ गया
उसे भी मिल गयीं कहीं सहूलतें उधार की

ये सब्ज़ वादियों में किस फ़ज़ा की बाज़गश्त है
ज़मीं प बिछ गयीं हैं सुर्ख़ पत्तियां चिनार की

नदी ग़मों की थी कोई हयात जिसका नाम था
न ग़र्क ही हुए कभी न यूं हुआ कि पार की

सदा उठी ज़मीन से तो अब्र की गिरह खुली
बरस गयीं हैं चार सू अशर्फियां क़रार की

सफ़र उरूज़ पर है या ज़वाल पर किसे ख़बर
हों मंज़िलें वो होश की कि राह हो ख़ुमार की

उतर गया है आंख में ये रंग कौन सा कि अब
न ख़ौफ़ ही ख़िजां का है न जुस्तजू बहार की

चलो किसी तरह ये एक मारिका तो सर हुआ
चलो कि फिर से रात कट गयी है इंतज़ार की

गरां बहुत पड़ा ये ज़िन्दगी का खेल आख़िरश
बड़ी लतीफ़ बाज़ियां थीं अव्वलनीं क़िमार की

फिर उसके बाद लौ किसी चराग़ में नहीं बची
‘ये दास्तान है नज़र प रौशनी के वार की’
बकुल देव 09672992110

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

25 comments on “T-24/13 कुछ और देर के लिए है शोरिशें ग़ुबार की-बकुल देव

  1. Behad haseen ghazal hui hai janaab, kya kehne

  2. bahut khoobsoorat ghazal huyi hai janaab…har sher maani aur mafhoom se bharpoor..dadd hi daad

  3. बकुल जी
    बहुत शानदार ग़ज़ल

    बार बार पढ़ने का दिल कर रहा है।
    हर शेर् धारदार

    बधाई
    नकुल

  4. Manoj ji ke baad meri nazar me sabse badhiya ghazal!!

  5. MeiN kuch kehna chaah rha tha ghazal padh ke, phir socha kahan se shuru karu, phir Mayank Awasthi bhai ka comment padha aur bas mera kaam ho gya.. 🙂

  6. बकुल भाई !! लफ्ज़ को बर्तना तो आपसे ही सीखने की चीज़ है !! गज़ल मुकम्मल है और एक मूड की है !! इसका कैनवस सर्द और गहरे रंगों से बना है !! बयान की रवानी देखते ही बनती है !!!
    कुछ और देर के लिए हैं शोरिशें ग़ुबार की
    न दिन हैं फिर चढ़ाव के न रात हैं उतार की
    सहर के बाद वो मिट्टी का जिस्म छूट गया
    जो तेरी लौ से मुनव्वर शबे सियाह मे था –मयंक
    नयी रुतों के जिस्म पर ग़ुबार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की
    दौरे हाज़िर का संकेतक है शेर – अगले वक़्त ऐसा नहीं था !! अब संशय और अवसाद का दौर है !!!
    जब आ सकी न इश्क की मुसाफ़िरत मक़ाम तक
    तो मुश्किलों ने मंज़िलों की शक्ल इख़्तियार की
    मरहले मकाम भी बन जाते हैं जब सफर कठिन हो !!
    सजे-सजाये ख़्वाब थे जो गर्द-गर्द हो गये
    निदा ज़मीं प आ गई है आसमां के पार की
    शेर पिछले बयानो का परिपूरक है
    निबाहना हमें भी मुश्किलों के साथ आ गया
    उसे भी मिल गयीं कहीं सहूलतें उधार की
    तर्क ए तआल्लुक रब्त को ही नहीं जुदा होने वालों को भी तक़्सीम करता है ये सच है !!!
    नदी ग़मों की थी कोई हयात जिसका नाम था
    न ग़र्क ही हुए कभी न यूं हुआ कि पार की
    ये तमाम उम्र गुज़री बडे सख़्त इंम्तिहाँ से
    न थी खुदकुशी की ताकत , नही लड सके जहाँ से –मयंक
    सदा उठी ज़मीन से तो अब्र की गिरह खुली
    बरस गयीं हैं चार सू अशर्फियां क़रार की
    सानी मिस्रे का शिल्प ग़ज़ब का है –क्या खूब !!
    सफ़र उरूज़ पर है या ज़वाल पर किसे ख़बर
    हों मंज़िलें वो होश की कि राह हो ख़ुमार की
    सच तो यही है कि दीवानगी और दानाई मे बस थोडा सा फर्क है –दीवानगी थोडा आगे की शै है !! अभी उठा है जो मयकदे से बरहनगी का लिबास ओढे
    तुम्हें ख़बर है वो आगही की तमाम शम्मे बुझा चुका है ((??!!)
    बकुल देव भाई !! आपके कलम का जवाब नहीं !!! बहुत खूब !! क्या आला गज़ल कही है आपने इस ज़मीन पर!! वाह –मयंक

    • मयंक भाई..
      आपकी टिप्पणी भी अपने आप में एक ग़ज़ल होती है.
      बहुत शुक्रिया..

  7. poori ghazal umda hai bakul Bhai….

  8. किन अल्‍फ़ाज़ में तारीफ़ की जाए भाई बकुल देव जी।
    वाह…वाह…वाह..वाह..
    सादर
    नवनीत

  9. निबाहना हमें भी मुश्किलों के साथ आ गया
    उसे भी मिल गयीं कहीं सहूलतें उधार की

    चलो किसी तरह ये एक मारिका तो सर हुआ
    चलो कि फिर से रात कट गयी है इंतज़ार की
    kya kahne Bakul bhai
    bharpoor gazal hui hai
    dher saari daad

  10. सजे-सजाये ख़्वाब थे जो गर्द-गर्द हो गये
    निदा ज़मीं प आ गई है आसमां के पार की

    नदी ग़मों की थी कोई हयात जिसका नाम था
    न ग़र्क ही हुए कभी न यूं हुआ कि पार की

    चलो किसी तरह ये एक मारिका तो सर हुआ
    चलो कि फिर से रात कट गयी है इंतज़ार की

    जब आ सकी न इश्क की मुसाफ़िरत मक़ाम तक
    तो मुश्किलों ने मंज़िलों की शक्ल इख़्तियार की

    बकुल भाई तबीयत खुश कर दी आपने, क्या मज़े के शेर हुए हैं, वाह वाह वाह, मज़ा आ गया

  11. नयी रुतों के जिस्म पर ग़ुबार लफ़्ज़-लफ़्ज़ है
    यहीं पे हर्फ़-हर्फ़ थीं कहानियां बहार की

    ये सब्ज़ वादियों में किस फ़ज़ा की बाज़गश्त है
    ज़मीं प बिछ गयीं हैं सुर्ख़ पत्तियां चिनार की

    नदी ग़मों की थी कोई हयात जिसका नाम था
    न ग़र्क ही हुए कभी न यूं हुआ कि पार की

    फिर उसके बाद लौ किसी चराग़ में नहीं बची
    ‘ये दास्तान है नज़र प रौशनी के वार की’

    SubhanAllah Bakul Bhai…samajh nahin aa raha kin lafzon men tariif karun…Kya jaanleva ghazal kahi hai aapne…bhai waah waah waah…kamaal kamaal kamaal…potli bhar ke duayen aur dheron daad kabool farmayen…

  12. Waah…bahut achhi gazal hui hae Bakul ji. Dher sati daad
    Sadar
    Pooja

  13. Umdaa ghazal hui hai bhaiya..waah ..badhai

  14. WAhhhh WAhhhh
    KYA achi gazal hui hai bakul sahab
    dili daad kubul kijiye

  15. क्या ही उम्दा ग़ज़ल हुई बकुल भाई
    तबीयत खुश हो गयी
    बहुत बहुत मुबारकबाद।

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: