30 टिप्पणियाँ

T-24/12 तलाश मैंने ज़िन्दगी में ,तेरी बेशुमार की-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

तलाश मैंने ज़िन्दगी में ,तेरी बेशुमार की
जो तू नहीं मिला तो तुझ सी शक्ल अख़्तियार की

तक़ाज़ा करने मौत आई तब मुझे पता लगा
अभी तलक मैं ले रहा था सांस भी उधार की

थी सर्द याद की हवा, मैं दश्त में था माज़ी के
न पूछिये जनाब मैंने कैसे रात पार की

तमाम शब गुज़र गयी बस एक इस उमीद में
पलट के आयेगी सदा कभी तो उस पुकार की

ठिठुर रहे हैं क्यों भला, ख़ुदा के ही तो हम भी हैं
चलो उठाके ओढ़ लें, वो चादरें मज़ार की

जला दीं मैंने ज़ेह्न की किताबें सारी इसलिए
कि दास्तान थी सभी में उसके इंतज़ार की

बिखेरती है शब मुझे, समेट लेती है सहर
मैं चाहता हूँ ख़त्म हो ये जंग बार बार की

मुझे ग़ुरूर तोड़ना था मौज का, इसीलिए
उतर पड़ा मैं नाव से बदन से नद्दी पार की

इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ 09536916624

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30 comments on “T-24/12 तलाश मैंने ज़िन्दगी में ,तेरी बेशुमार की-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

  1. achchhe ashaar…asar angez aur maanikhez…daad haazir hai

  2. तक़ाज़ा करने मौत आई तब मुझे पता लगा
    अभी तलक मैं ले रहा था सांस भी उधार की

    bahut khuub

  3. आज़ाद साहब

    हालांकि आपकी पूरी ग़ज़ल लाजवाब है
    लेकिन इस शेर् पर आपको बहुत बहुत बधाई

    ठिठुर रहे हैं क्यों भला, ख़ुदा के ही तो हम भी हैं
    चलो उठाके ओढ़ लें, वो चादरें मज़ार की

    यह बात अगर इस समाज को समझ आ जाए तो कोई भूखा न रहे

    बहुत बहुत बधाई

    नकुल

  4. imraan bahut umda ghazal hai pyaare…. matla bahut pasand aaya… oanchvan aur chatha she’r bhi behad pasand aaye…. waah

  5. ठिठुर रहे हैं क्यों भला, ख़ुदा के ही तो हम भी हैं
    चलो उठाके ओढ़ लें, वो चादरें मज़ार की

    बिखेरती है शब मुझे, समेट लेती है सहर
    मैं चाहता हूँ ख़त्म हो ये जंग बार बार की

    tamam gazal hi khoobsoorat hai mere bhai

    dili daad

  6. तक़ाज़ा करने मौत आई तब मुझे पता लगा
    अभी तलक मैं ले रहा था सांस भी उधार की

    waah waah ..kya kehne bhai..jio

  7. इमरान आपकी मेहनत रंग ला रही है
    इसी तरह अच्छा कहते रहिये
    और सुर्खरू होते रहिये।
    खूब सारी दुआएँ।

  8. तलाश मैंने ज़िन्दगी में ,तेरी बेशुमार की
    जो तू नहीं मिला तो तुझ सी शक्ल अख़्तियार की

    ठिठुर रहे हैं क्यों भला, ख़ुदा के ही तो हम भी हैं
    चलो उठाके ओढ़ लें, वो चादरें मज़ार की

    बिखेरती है शब मुझे, समेट लेती है सहर
    मैं चाहता हूँ ख़त्म हो ये जंग बार बार की

    lajawab…zindabaad… waah..daad kaboool karen….

  9. इमरान भाई
    दिनेश भाई का कहना बिलकुल ठीक है। वाह… वाह.. क्‍या ग़ज़ल हुई है और क्‍या-क्‍या शे’र हुए भाई।
    बहुत बधाई।
    कहने को रह गया अब।
    सादर
    नवनीत

  10. Aazad saahab bahut achhi gazal hui hae. Badhai swikaar karein
    Sadar
    Pooja

  11. ठिठुर रहे हैं क्यों भला, ख़ुदा के ही तो हम भी हैं
    चलो उठाके ओढ़ लें, वो चादरें मज़ार की
    जला दीं मैंने ज़ेह्न की किताबें सारी इसलिए
    कि दास्तान थी सभी में उसके इंतज़ार की
    वाह वाह गजब सुंदर ग़ज़ल आजाद जी बधाई हो दिली दाद

  12. नए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो दे
    कि गिर चुकी है एक-एक धुन मिरे सितार की
    न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए
    गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की
    कि जैसे रख दिए हों हाथ हाथों में बहार ने
    मिरी हथेलियों पे यूँ हैं पत्तियाँ चिनार कीwaaah waaah swapnil ji kamaal ke aashar sunder ghazal waah

  13. तक़ाज़ा करने मौत आई तब मुझे पता लगा
    अभी तलक मैं ले रहा था सांस भी उधार की

    क्या ज़बान है, ऐसा धुला मँझा शेर वो भी इस ज़मीन में, भाई हमारे तो पसीने छूट रहे हैं

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