20 टिप्पणियाँ

T-24/9 बढा रही हैं रंगतें हुज़ूर के दयार की -नवीन

बढा रही हैं रंगतें हुज़ूर के दयार की।
धिनक-धिनक-धिनक-धिनाक-धिन धुनें धमार की॥

निकुंज के सनेहियों को और चाहिये भी क्या।
वही किशन की बाँसुरी वही धुनें धमार की॥

इसी लिये तो आप से सनेह छूटता नहीं।
इक आप ही तो सुनते हैं शिकायतें शिकार की॥

लता-पताएँ छोड़िये महक तलक उदास है।
बिछोह में झटक गयी हैं बेटियाँ बहार की॥

कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा।
बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुख़ार की॥

न कल्प-वृक्ष चाहिये न कामधेनु चाहिये।
हुज़ूर हम तो चींटियाँ हैं आप के दयार की॥

ज़ुरूर उन को भी हमारी याद आई है ‘नवीन’।
तभी तो बात हो रही है नन्द के कुमार की॥

गिरह:-
तजल्लियों* ने आदमी को सोचना सिखा दिया।
” ‘ये’ दासतान है नज़र पै रौशनी के वार की”॥

*तेज-पुंज / दैवीय-प्रकाश / ज्ञान-रश्मियाँ / प्रकाश-किरणें

तसव्वुर (कल्पना) बतलाता है कि मानव की दृष्टि पर सबसे पहला रश्मि-वार सूर्य-चन्द्रमा के प्रकाश की किरणों का हुआ होगा।

नवीन सी. चतुर्वेदी
+919967024593

Advertisements

About Navin C. Chaturvedi

www.saahityam.org 09967024593 navincchaturvedi@gmail.com http://vensys.in

20 comments on “T-24/9 बढा रही हैं रंगतें हुज़ूर के दयार की -नवीन

  1. Waaaaaah, bilul munfarid andaaz ki is ghazal men zara zara si brij ki mithaas bhi shaamil hai

  2. bahut achhii gazal hui hai dada..
    Azam sahab ka comments waqai khaas hai..

    dher sari daad

  3. ghazal meN aksar faarsi arabic talmeehaat ka zor raha hai…Firaq Gorakhpuri ne bhaartiya qisse kahaniyoN ..devmaalaayi roopakoN ke istemaal ki bharpoor taayeed ki thi…aur ghazal ko Hindustaani parivesh me laane ki koshish bhi….aap kie yehaan bhi mujhe ghazal meN bhrpoor bhaartiyata ka ehsaas hota hai…aur jo khaas to hai hi… zaroori bhi hai…har sher par aap ki apni makhsoos chhap hai…daad hi daad
    aap ka isi ghazal ke silsile me tafseeli comment bhi padha aur motassir huwa ki aap ghazal ke shilp par bahut kaar aamad baateN ki haiN…phir se mubarakbaad

  4. यह और ऐसी ग़ज़ल केवल आ. नवीन भाई साहब की ही हो सकती है। वाह..वाह.. कैसे-कैसे प्रयोग और सुंदर प्रयोग।
    भाई साहब। भरपूर दाद स्‍वीकार करें।
    सादर
    नवनीत

  5. लता-पताएँ छोड़िये महक तलक उदास है।
    बिछोह में झटक गयी हैं बेटियाँ बहार की॥
    कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा।
    बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुख़ार की॥
    न कल्प-वृक्ष चाहिये न कामधेनु चाहिये।
    हुज़ूर हम तो चींटियाँ हैं आप के दयार की॥
    वाह वाह आदरणीय नवीन जी कमाल की सुझबुझ और हमार लिएे इक सीखने का जरिया है आपका हर शेर लाजवाब

  6. लता-पताएँ छोड़िये महक तलक उदास है।
    बिछोह में झटक गयी हैं बेटियाँ बहार की॥
    कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा।
    बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुख़ार की॥
    न कल्प-वृक्ष चाहिये न कामधेनु चाहिये।
    हुज़ूर हम तो चींटियाँ हैं आप के दयार की॥
    क्या बात है behtreeen बधाई हो दिल से दाद

  7. प्रणाम

    यह ग़ज़ल पोस्ट होने के बाद कुछ सनेहियों ने whatsapp पर सम्पर्क साधा और अपनी शंकाएँ प्रस्तुत कीं। सम्भव है ये शंकाएँ अन्य पाठकों के मन में भी आई हों, इसलिये यहाँ भी उन शंकाओं का स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर रहा हूँ

    1 – सनेही

    संस्कृत का शब्द है ‘स्नेह’ और उस का पदभार 21 होता है। संस्कृत के ही अन्य शब्द ‘अमृत’ का पदभार 12 होता है।

    ग़ज़ल के आशिक़ों ने ‘अमृत’ के ग्रामीण वर्जन अमरित [पदभार 22] का भरपूर इस्तेमाल किया है। मुझे नहीं पता कि इस से पहले ग़ज़ल में ‘सनेह’ का प्रयोग हुआ है या नहीं। अलबत्ता तुलसी, रहीम के अलावा और भी बहुतेरे साहित्यानुरागियों ने ब्रज के ‘सनेह’ [पदभार 121] का भरपूर इस्तेमाल किया है।

    अगर ग़ज़ल में इस से पहले ‘सनेह’ का इस्तेमाल न हुआ हो तो इसे मेरी रिस्क समझा जाय।

    2 – दवाइयाँ

    मैं जानता हूँ कि फ़सीह लफ़्ज़ है ‘दवा’ जिस की जमा [बहुवचन] है ‘दवाएँ’। बेशक। मगर साथ ही ‘दवा’ के बहुवचन के रूप में ‘दवाइयाँ’ लफ़्ज़ का आम बोलचाल की ज़ुबान में अच्छी-ख़ासी तादाद में अब इस्तेमाल होना लगा है। मेरे अनुज मेरे उस्ताज़ भाई हमारे समय के एक बहुत ही अच्छे और प्यारे शायर इरशाद भाई ने भी इस का इस्तेमाल अपने एक मतले में किया है ।

    मेरी साँसों की चाबियाँ रख दीं।
    बैग में सब दवाइयाँ रख दीं॥

    ‘चाबी’ की जमा ‘चाबियाँ’ और ‘दवाई’ की जमा ‘दवाइयाँ’। ग़ज़ल इसी पोर्टल पर है।

    3- शिकस्ते- नारवा / बेजा

    शायरी बड़ी मज़ेदार सिन्फ़ है। दिल सलामत रहता है मगर कह दिया जाता है दिल के टुकड़े हो गये। सच में दिल से ख़ून के फ़व्वारे निकल रहे होते तो शायद शायर लोग आँखों से बहने वाले आँसुओं से दिल से निकलने वाले वाले ख़ून के फ़व्वारों तक का सफ़र तय न करते। मगर कुछ एक बातें मसलन शिल्प की बातें बहुत ही अह्म होती हैं। बेशक, मानना न मानना अपनी जगह होता है मगर अगर कोई सनेही पोइण्ट उठाये वो भी मुहब्बत और आबरू का ख़याल र्रखते हुए तो ये हम पर फर्ज़ है कि हम मुमकिनतन शक़्ल में उस शंका का समाधान करने का प्रयास करें।

    जैसा कि इसी पोर्टल की एक पोस्ट ‘अतीत से समाज की विडम्बना समान है’ में मैं ने स्पष्ट किया था कि पुरातन ‘पञ्च-चामर छन्द’ [जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले] से प्रेरित हो कर ग़ज़ल के प्रवर्तकों ने हमें बहरे हज़ज मुसम्मन मक़्बूज़ अता की। कालान्तर में आचार्यों ने तय किया कि इस बह्र के हर मिसरे को दो स्वतन्त्र भागों में विभक्त किया जाये और एक भाग दूसरे पर आश्रित न रहे इस बात का ख़याल रखा जाये। सब से पहले इस बह्र का रुक्न

    मुफ़ायलुन मुफ़ायलुन मुफ़ायलुन मुफ़ायलुन
    1212 1212 1212 1212

    अब, कुछ नज़ीरें

    1. ये क्या जगह है दोस्तो / ये कौन सा दयार है
    2. अभी न जाओ छोड़ कर / कि दिल अभी भरा नहीं
    3. तरक़्क़ियों के दौर में / उसी का ज़ोर चल गया

    तो, हम पाते हैं कि किस तरह एक मिसरे को दो स्वतन्त्र भागों में विभक्त किया जाता है। मगर मेरी विवेच्य ग़ज़ल में इस से बचा नहीं जा सका है। विवेच्य ग़ज़ल में ऐसी ख़ामियाँ कई जगहों पर हैं। मैं उन सभी ख़ामियों को यहाँ कोष्ठक में प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि इन के आईने में अन्य इच्छुक व्यक्ति अपनी ग़ज़लों को चेक कर सकें

    बढा रही हैं रंगतें / हुज़ूर के दयार की।
    धिनक-धिनक-धिनक-धिना / [क]-धिन धुनें धमार की॥

    निकुंज के सनेहियों / [को] और चाहिये भी क्या।
    वही किशन की बाँसुरी / वही धुनें धमार की॥

    इसी लिये तो आप से / सनेह छूटता नहीं।
    इक आप ही तो सुनते हैं / शिकायतें शिकार की॥

    लता-पताएँ छोड़िये / महक तलक उदास है।
    बिछोह में झटक गयी / [हैं] बेटियाँ बहार की॥

    कभी कहो हो सब्र कर / कभी कहो हो भूल जा।
    बदल रहे हैं आप क्यों / दवाइयाँ बुख़ार की॥

    न कल्प-वृक्ष चाहिये / न कामधेनु चाहिये।
    हुज़ूर हम तो चींटियाँ / [हैं] आप के दयार की॥

    ज़ुरूर उन को भी हमा / [री] याद आई है ‘नवीन’।
    तभी तो बात हो रही / [है] नन्द के कुमार की॥

    गिरह:-
    तजल्लियों* ने आदमी / [को] सोचना सिखा दिया।
    ” ‘ये’ दासतान है नज़र / [पै] रौशनी के वार की”॥

    यह बात शिल्प की है। नो डाउट अब बहुत से लोग इस शिल्प को नहीं मानते। मैं भी इस का पूरी तरह अनुपालन नहीं कर सका हूँ। मगर अगर कोई सनेही मुझ से शिल्प के हवाले से पूछे तो मुझे मानना ही पड़ेगा कि मैं ने छूट ली है।

    4 – समास की पुनरावृत्ति

    विवेच्य ग़ज़ल के मतले और उस के बाद के शेर में एक समास [शब्द-समूह] की पुनरावृत्ति हुई है।

    बढा रही हैं रंगतें हुज़ूर के दयार की।
    धिनक-धिनक-धिनक-धिनाक-धिन “धुनें धमार की”॥

    निकुंज के सनेहियों को और चाहिये भी क्या।
    वही किशन की बाँसुरी वही “धुनें धमार की”॥

    मतले का समास जिन “धमार की धुनों” का ज़िक्र कर रहा है; मतले के बाद वाले शेर का समास उन्हीं “धमार की धुनों” की चाहना के बारे में ज़िक्र कर रहा है। सुझाव था यहाँ मल्हार ले लिया गया होता। तो वो बात नहीं बनती। धमार का दायरा बड़ा है, मल्हार की धुनें धमार में गायी जाती हैं। धमार ब्रज में लोकगीतों की परम्परा का प्रतिनिधित्व करता / करती है।

    सिवाय, इस समास की पुनरावृत्ति को सार्थक बनाने के उद्देश्य के अन्तर्गत पहले ऊला “निकुंज के सनेहियों को और चाहिये भी क्या “ मिसरे में समास-पुनरावृत्ति की अनिवार्यता सुनिश्चित की गयी; फिर सानी मिसरे में ‘वही’ शब्द जोड़ा गया। अगर यह दौनों न होते तो सार्थकता प्रभावित होती।

    सहमति / असहमति प्रवास / सम्वाद आदि के दो अपरिहार्य पक्ष हैं। हम एक दूसरे से सहमत या असहमत होने के लिये स्वतन्त्र हैं।

    अगर और भी किसी साहित्यानुरागी को शंका हो तो बिना छुपे अपनी पहिचान के साथ प्रकट होने की कृपा करें। स्वागत है।

    प्रणाम

  8. इसी लिये तो आप से सनेह छूटता नहीं।
    इक आप ही तो सुनते हैं शिकायतें शिकार की॥
    waah

  9. कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा।
    बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुख़ार की॥
    क्या कहने हैं नवीन जी। वाह
    बधाई स्वीकार करें।
    सादर
    पूजा

  10. नवीन भाई बहुत उम्दा।
    आप तो निस दिन नए प्रयोग द्वारा अपने नाम को
    पूर्णरूपेण सार्थक करते जा रहे हैं।
    बधाई स्वीकार कीजिये

  11. नीरज जी प्रणाम। बहुत-बहुत आभार आप का।

  12. कभी कहो हो सब्र कर कभी कहो हो भूल जा।
    बदल रहे हैं आप क्यों दवाइयाँ बुख़ार की॥

    बड़ा मुख्तलिफ और दिलचस्प अंदाज़ होता जा रहा है आपकी ग़ज़लों का नवीन भाई। वाह वा वाह। खूबसरत ग़ज़ल के लिए दिली दाद
    नीरज

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: