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T-24/10 छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की
है रौशनी फ़ज़ा में पुरउम्मीद इंतज़ार की

अजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल में
जमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार की

न जाने कैसा ग़म पिला दिया है तूने दिल इसे
हमारी शब को लत सी लग गयी है तेरे बार की

नए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो दे
कि गिर चुकी है एक-एक धुन मिरे सितार की

न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए
गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की

कि जैसे रख दिए हों हाथ हाथों में बहार ने
मिरी हथेलियों पे यूँ हैं पत्तियाँ चिनार की

मैं तेरे दोस्तों से ख़ूब मिल रहा हूँ आजकल
है मेरे पास आज तेरी याद भी उधार की

बहुत घनी है याद तेरी, बस के अब मैं रो पडूँ
कमी है बन में आज सिर्फ़ एक आबशार की

उजाला दाग़ दाग़ तीरगी भी दाग़ दाग़ है
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

भले ही आ भी जाओ तुम रहेंगे मुंतज़िर ही हम
हमें तो लग गयी है लत तुम्हारे इंतज़ार की

ये कौन है जो रुत के रथ पे इन दिनों सवार है
उड़ा रहा है धूल जो फ़ज़ाओं में बहार की

वो चाँद का भंवर हमें तो ले ही डूबता मगर
तेरे ख़याल के बहाव में ये शब भी पार की

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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32 comments on “T-24/10 छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. Aahahahaha, qaafiya nibaah diya aapne

  2. Swapnil bhai aap ki shayari ki ek khaas baat hai ki aapka sher agar naam bhi na likho to aapka hi lagta hai.. badhiya ghazal ke liye dili daad!!

  3. छुपी नहीं हैं शक्ल रात में भी रहगुज़ार की
    है रौशनी फ़ज़ा में पुरउम्मीद इंतज़ार की
    उमीद का बहुत सुन्दर चित्र अच्छे शिल्प के साथ बाँधा है !!
    अजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल में
    जमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार की
    उलटबाँसी जैसी बात है !! कहन का अथ उतना स्पष्ट नहीं लेकिन मंज़र बहुत दिलचस्प है !!
    न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए
    गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की
    अच्छा शेर कहा है !! एक सहज दृश्य से एक अर्थपूर्ण बात निकाली है !! क्षरण का कारण स्पष्ट नहीं है लेकिन ज़वाल हो रहा है ये स्पष्ट है –सुन्दर !!
    मैं तेरे दोस्तों से ख़ूब मिल रहा हूँ आजकल
    है मेरे पास आज तेरी याद भी उधार की
    बात से क्या बात निकाली है !! वाह !!
    मेरी शिकस्त पे दुश्मन हंसे तो क्या शिकवा
    मुझे तो दोस्त भी अन्दर से बाग –बाग मिले –मयंक
    भले ही आ भी जाओ तुम रहेंगे मुंतज़िर ही हम
    हमें तो लग गयी है लत तुम्हारे इंतज़ार की
    मिलन का नाम मत लो !! मुझको विरह में चूर रहने दो !! –महादेवी
    ये कौन है जो रुत के रथ पे इन दिनों सवार है
    उड़ा रहा है धूल जो फ़ज़ाओं में बहार की
    इस आदमी के बारे मे मालूमात तो नहीं हैं लेकिन कयास खूब लगेगी !! पता केजिये कि ये कौन है :
    स्वप्निल !! इन अश आर की कहन पर और दीगर अश आर के शिल्प पर भरपूर दाद !! -मयंक

  4. hamesha ki tarah munfarid fikr aur lab o lahje se saji sanwari ghazal…
    poori ghazal hi bharpoor sanjeedgi ki qayil hai…wahh wahhh

  5. स्‍वप्निल ग़ज़ल
    …………..
    ………………………….
    ……………..
    …………….
    ……………
    …………………………
    नवनीत

  6. अजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल में
    जमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार की

    नए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो दे
    कि गिर चुकी है एक-एक धुन मिरे सितार की

    मैं तेरे दोस्तों से ख़ूब मिल रहा हूँ आजकल
    है मेरे पास आज तेरी याद भी उधार की

    बहुत घनी है याद तेरी, बस के अब मैं रो पडूँ
    कमी है बन में आज सिर्फ़ एक आबशार की

    kya kahne..kya kahne..

    waahhh waahh

  7. Kya hi umda gazal hui hai bhaiya …har sher hi laazwaab hai ..

    superb

    regards

  8. ये कौन है जो रुत के रथ पे इन दिनों सवार है
    उड़ा रहा है धूल जो फ़ज़ाओं में बहार की
    वो चाँद का भंवर हमें तो ले ही डूबता मगर
    तेरे ख़याल के बहाव में ये शब भी पार की
    वाह वाह बधाई हो दिल से दाद स्वप्निल जी कमाल लिखते है

  9. मेरे लिए हासिले मुशायरा 🙂

    न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए
    गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की

  10. नए सुरों की कोंपले उगें मुझे सदा तो दे
    कि गिर चुकी है एक-एक धुन मिरे सितार की

    वो चाँद का भंवर हमें तो ले ही डूबता मगर
    तेरे ख़याल के बहाव में ये शब भी पार की ! वाह वाह !!

    बहुत अच्छी ग़ज़ल कही है स्वप्निल भाई !
    दाद कुबूल कीजिये !!

  11. Waah waah dada kya umda ghazal hai..
    ye sher khas taur pe bahut pasand aaya

    न जाने क्या बरस रहा है ओट बर्फ़ की लिए
    गिरी पड़ी हैं पत्तियाँ तमाम देवदार की

    Pranam

  12. स्वप्निल जी
    आपकी ग़ज़ल हमेशा की तरह ख़ास है, शानदार है
    क्या बात है

  13. दादा ,शब्दकोष कहीं खो गया है इस खूबसूरत ग़ज़ल से रूबरू होने के बाद।
    पूरी ग़ज़ल क़माल है। ढेर सारी दिली दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा:)

  14. Bahut achi gazal hui dada
    WAhhhhhhh wahhhhhhhhh
    dili daad qubul kijiye

    Sadar

  15. अजीब ताल-मेल है हमारी चाल-ढाल में
    जमी हुई है मुझ पे ही नज़र मिरे शिकार की

    कि जैसे रख दिए हों हाथ हाथों में बहार ने
    मिरी हथेलियों पे यूँ हैं पत्तियाँ चिनार की

    उजाला दाग़ दाग़ तीरगी भी दाग़ दाग़ है
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

    स्वप्निल भाई आपकी ग़ज़ल का इंतज़ार था और इंतज़ार का फल मीठा होता है ये बात सच साबित हुई। अब तो खोपोली आ कर तुम्हारी खातिर तवज्जोह करनी ही पड़ेगी। जियो क्या ग़ज़ल कही है मज़ा आ गया।

  16. स्वप्निल भाई मज़ा आ गया ।
    अच्छी ग़ज़ल कही आपने हमेशा की तरह।
    बहुत बहुत मुबारकबाद….

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