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T-24/8 कोई कलीम हो गया किसी ने जां निसार की-नाज़िम ‘नक़वी’

कोई कलीम हो गया किसी ने जां निसार की
”ये दस्तान है नज़र पे रोशनी के वार की”

ये लिजिये ख़ुदी बुलन्द हो चुकी है और हम
बना रहे हैं ख़ुद ही हद भी अपने इख़्तियार की

ये नज़्म है वो अज़्म है वो रज्म है वो बज़्म है
बयानियां ही की हैं सबने अपने अपने प्यार की

हज़ार रंग में फिराक़ फिर फिराक़ है मगर
तग़ज़्ज़ुले-हयात तो है शायरी खुमार की

हमारी ज़िंदगी इस एक जुस्तुजू में कट गयी
कि देखें क्या बनाएंगी अब उंगलियां कुम्हार की

ख़िज़ाँ ने शोख़-सब्ज़ रंग जिस्मो-जां पे टांक कर
तिरी ख़ुशामदीद में किसी तरह बहार की

नाज़िम ‘नक़वी’ 09811400468

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21 comments on “T-24/8 कोई कलीम हो गया किसी ने जां निसार की-नाज़िम ‘नक़वी’

  1. kya zabaan ka istemaal hai mohtaram.. kya kehne.. dili daad kubool farmaiye!!

  2. कोई कलीम हो गया किसी ने जां निसार की
    ”ये दस्तान है नज़र पे रोशनी के वार की”
    सच है !! तूर पर कोई कलीम हुआ !! लेकिन बाकी के लिये वो वर्जित दिशा है !! उस बर्क़ के लायक सभी का ज़र्फ नहीं –क्या खूब शेर कहा है वाह वाह !!!
    ये लिजिये ख़ुदी बुलन्द हो चुकी है और हम
    बना रहे हैं ख़ुद ही हद भी अपने इख़्तियार की
    हर तकदीर के पहले जब खुदा बन्दे से पूछ रहा है तो इख़्तियार की हदों को बाँधने की क्या ज़रूरत है !!! ??!! शिकवा उअर जवाबी शिकवे को कुछ और दिया है इस शेर ने !!!
    ये नज़्म है वो अज़्म है वो रज्म है वो बज़्म है
    बयानियां ही की हैं सबने अपने अपने प्यार की
    अपना पना अन्दाज़ है !! कोई कलम से कहता है और कोई तलवार से लेकिन सब इज़हारे मुहब्बत ही है – and all is fair in love and war !!
    हज़ार रंग में फिराक़ फिर फिराक़ है मगर
    तग़ज़्ज़ुले-हयात तो है शायरी खुमार की
    वो मुदावा भी है और आखिरी रास्ता भी !!! शायरी खुमार की !!
    हमारी ज़िंदगी इस एक जुस्तुजू में कट गयी
    कि देखें क्या बनाएंगी अब उंगलियां कुम्हार की
    तख़्लीक मे आगे क्या !!! इसी हसरत मे इन्ही मुश्ताकियों मे ज़िन्दगी काट देते हैं हम !!!
    ख़िज़ाँ ने शोख़-सब्ज़ रंग जिस्मो-जां पे टांक कर
    तिरी ख़ुशामदीद में किसी तरह बहार की
    जैसे कागज़ के फूलों से !!!! जैसे मुस्कान चिपका कर हम किसी का इस्तकबाल करते है !!
    क्या खूब शेर कहा है !!
    नाज़िम ‘नक़वी’ साहब बेहतरीन बयान है —दाद कुबूल कीजिये –मयंक

    • जें जनाब मयंक साहेब आपने तो पूरी गज़ल की तश्रीह कर डाली… इतनी मुहब्बत से अशआर को देखा आपने इसके लिये मेरी तरफ़ से दादो-तहसीन कबूल किजिये…

  3. umda ghazal…har sher..har misra…har lafz…apni maujoodgi ka ehsaas dilata huwa…umda ghazal par mubarakbaad

  4. जनाब नाजि़म नक़वी साहब।
    बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए भरपूर वाह..वाह।
    दिली दाद स्‍वीकार कीजिए।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    सादर
    नवनीत

  5. हमारी ज़िंदगी इस एक जुस्तुजू में कट गयी
    कि देखें क्या बनाएंगी अब उंगलियां कुम्हार की

    waah wah..kya kehne

    • जनाब कान्हा साहेब बहुत बहुत शुक्रिया आपकी दादो-ताह्सीन का…

  6. नक़वी साहब
    क्या ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने। ढेरों ढेर दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

  7. हमारी ज़िंदगी इस एक जुस्तुजू में कट गयी
    कि देखें क्या बनाएंगी अब उंगलियां कुम्हार की

    वाह वाह, कैसे अच्छे अच्छे शेर निकाले है साहब आपने, बेहतरीन ग़ज़ल हुई है

    दिनेश

  8. अहा ! हा ! हा ! क्या खूब ग़ज़ल हुई है नाज़िम साहब , कमाल। ज़िंदाबाद। हर शेर हीरे की तराशा हुआ और हर हीरा अपनी जगमाहट से आँखें चुंधियाने को मज़बूर करता हुआ। इस खूबसूरत ग़ज़ल के किसी एक आध शेर को कोट करना बाकि के शेरों के साथ ना-इंसाफी होगी। ढेरों दाद कबूल करें।

    नीरज

    • बहुत बहुत शुक्रिया नीरज साहेब… आपकी ज़र्रनवाज़ी… दिल खुश हो गया क्योंकि तारीफ़ में इन्तेहाइ बरजस्तगी शामिल है… ऐसी तारीफ़ ज़िम्मेदार बनाती है…

  9. Bahut achi gazal hui nazim sahab
    dili daad qubul kijiye

  10. नाज़िम भाई, सारे शिया क्या लखनऊ स्कूल की तरबियत पाते-रखते हैं ? ये तो हमारा लहजा है। वही गुनगुनाते मिसरे, मख़मली फ़ालूदा से कानों में फिसलते हुए लफ़्ज़, चाशनी में पगे शेर वाह-वाह। दाद क़ुबूल फ़रमाइये।

    • तुफैल भाइ आपका भी जवाब नही… शिया अगर एक ताहज़ीब का नाम है तो आपकी बात दुरुस्त… इस कैफियत में सबको शिया होने का हक़ है… ताहज़ीब का मज़हब से क्या लेना-देना… वैसे एक credit आपको जता है की आप गज़ल काहल्वा लेते हैं…

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