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विनम्र निवेदन-तुफ़ैल चतुर्वेदी

दोस्तो, हम लोग बड़ी मुश्किलों से लफ़्ज़ ग्रुप को कई लोगों की नाराज़गी झेल कर, गालियां खा कर, अपना वक़्त सर्फ़ कर किसी तरह बचा कर यहाँ तक लाये हैं। मक़सद सिर्फ अच्छी शायरी को फ़रोग़ देना और परवान चढ़ाना है। इस सिलसिले में अपनी समझ से जितना मुमकिन हो पाता है चुन कर कलाम पोस्ट करते हैं। कई बार कलाम का स्तर किन्हीं साहब की उम्मीदों पर खरा नहीं भी उतरता है। इस काम में मुझे अनेक बार मिसरों को बदलना भी पड़ता है।

पिछले साल एक साहब ने यहाँ ख़ासा ऊधम मचाया था। उनकी तरह में भेजी गयी एक ग़ज़ल मेरे पास आज भी emil की शक्ल में पड़ी है जिसमें केवल 3 मिसरे बह्र में थे बाक़ी पूरी ग़ज़ल बह्र से ख़ारिज थी। हस्बे-मामूल इस ख़ाकसार ने ग़ज़ल को ठीक करके पोस्ट कर दिया। उन साहब का नाम न पहले ज़ाहिर किया न आगे ही करूँगा। इसका कारण ये है कि शायरी में मैच्योरिटी आते-आते ही आती है। मेरे कलाम में भी कई मिसरे बल्कि 4-5 शेर तो पूरे ही नूर साहब के अताकर्दा हैं। इस्लाह के दौरान ये सामान्य बात है। हर उस्ताद शागिर्द के कलाम में तब्दीलियां करता है। कई बार सीनियर लोगों से भी चूक हो जाती है।

मुझे कुछ बरस पहले का अपना ही वाक़या ध्यान है। मेरे शागिर्द विकास शर्मा ‘राज़’ ने मेरे एक मिसरे पर दबे लहजे में कहा ‘उस्ताद इस मिसरे को आप शायद इस तरह कहना चाह रहे होंगे’ । उसका कहना ठीक था और मैंने उसकी बात मानी। मेरे नज़दीक ये बात पहले पिता के बच्चे को चलना सीखने के दौरान सहारा देने और फिर बुढ़ापे में बाप को बेटे के सहारा देने की तरह है।

इस बार पिछले एक महीने से पोर्टल पर ऊधम मच रहा है। किन्हीं अनाम साहब ने तरह से पहले नवीन की ग़ज़लों पर अवांछित धुंआधार कॉमेंट किये। फिर तरही ग़ज़लों पर अनुपयुक्त जुमलेबाज़ी होने लगी। मेरा आपसे हाथ जोड़ कर निवेदन है कृपया यहाँ आलोचनात्मक टिप्पणी मत कीजिये। आलोचना का सर्वमान्य नियम है कि किसी की आलोचना या तो उसी से निजी रूप से कही जाये या उस तक पहुंचाई जाये जो उस व्यक्ति में बदलाव ला सकता हो अन्यथा आलोचना का मक़सद उल्लेखित व्यक्ति को सार्वजानिक रूप से शर्मिंदा करने और चोरों की तरह अपनी भड़ास निकालने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता। लगभग सभी शायरों की ग़ज़लों के साथ उनका मोबाइल नंबर होता है। कृपया अपनी बात शायर को सीधे पहुंचाइये। इसमें आपके ज़ाहिर हो जाने का ख़तरा तो है मगर मक़सद शायरी का स्तर ऊँचा करना है तो खुल कर अपना नाम बता कर बात करने से ही बात बनेगी।

फ़ेस बुक के अन्य सभी पोर्टल इन्हीं करतबों से लगभग ढेर हो चुके हैं। हमारे साथ के कई लोग पहले ही सुस्त पड़ चुके हैं। मुझे डर है कि बचे-खुचे लोग भी न बैठ जाएँ। इसका परिणाम नये लोगों को अपने आप को ज़ाहिर करने, स्थापित होने के एक मंच का डूबना ही होगा। लफ़्ज़ को ज़िंदा रहने दीजिये। मुझे आशा ही नहीं बल्कि विश्वास है कि आप लोग मेरा निवेदन स्वीकार करेंगे। आख़िर में स्वर्गीय इरफ़ान सिद्दीक़ी साहब का एक शेर अर्ज़ करता चलूँ

सबको निशाना करते करते
ख़ुद को मार गिराया हमने

सादर

तुफ़ैल चतुर्वेदी 09711296239-09810387857

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8 comments on “विनम्र निवेदन-तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. सही बात है । उन ज़नाब को चाहिए कि वे अपनी सारी बातें स्पष्ट रूप से खुले खुले में सम्बंधित व्यक्तियों तक पहुँचाएँ । इस तरह की छापेमारी से फ़न में इजाफ़ा तो नहीं हो पाएगा हाँ बीमारी और गहरी जरूर होगी ।

  2. नवाये सुबह्गाही ने जिगर खूँ कर दिया मेरा
    इलाही जिस ख़ता की ये सज़ा है वो ख़ता क्या है –इकबाल

    ये शफ़करंग सहर तुमको मुबारक लेकिन
    इसमे गुमनाम सितारों का लहू शामिल है -मयंक

    अनाम साहब !!
    आप अभी भी अपनी बात पर काइम हैं !! अगर आप हमारे परिचय क्षेत्र से बाहर के व्यक्ति हैं तो कोई गिला नहीं –लेकिन आपका मकसद पोर्टल पर अरूज़े फ़िक्रो फन की पैरवी करना कम और नवीन को निजी निशाने पर रखना अधिक दिखाई दिया !! ऐसा वही करेगा जो नवीन से परिचित हो और छिप कर वार करने के रास्ते ढूँढ रहा हो !! परिचय की दरकार इसीलिये हुई !!! वगर्ना कोई बात नहीं !! आज से 3 बरस पहले जब दादा ने एक वेव्साइट बनाने की इच्छा ज़ाहिर की थी तब मैने ही नवीन से इस काम का जिम्मा लेने का अनुरोध किया था जिसे उन्होने पूरी शिद्दत के साथ निभाया भी और अपने ब्लाग ठाले –वैठे की शहादत की कीमत पर ये कार्य किया !! इस पोर्टल पर उनका योगदान सबसे अधिक है इसलिये अगर उनको निजी निशाने पर रखा जायेगा तो मुझे कष्ट लगना स्वाभाविक भी है !! बाकी दादा की बात पर ध्यान दीजिये !! आप ये बातें उनको फोन पर भी कह सकते थे और मेल पर भी भेज सकते थे !! पब्लिक प्लेटफार्म पर खडे व्यक्ति पर छिप कर वार क्यों ??!! आप भी खुल कर सामने आ ही जाइये !! आपकी भाषा की सामर्थ्य और वैचारिक परिपक्वता से स्पष्ट है कि आप साधारण साहित्यकार नहीं हैं और आपकी संस्कारगत चेतना भी प्रबल है वगर्ना इतनी बहस के बाद कोई भी भाषा के धरातल पर इतना परिश्कृत और परिमार्जित नहीं रह सकता !! आपके साहित्यकार को नमन !! मैं आपके तआर्रुफ को लेकर बेहद मुश्ताक हूँ !! चुपके से मुझे फोन कीजिये !! किसी को कानो कान ख़बर नहीं होगी !! वादा रहा !!!

    दो सदा तो दर खुले ऐसा मकाँ कोई नहीं
    इस मज़ारों के नगर में हमज़ुबाँ कोई नहीं

    उम्र भर जिस दर पे मैं दस्तक दिया करता रहा
    आज ये पर्दा खुला , रहता वहाँ कोई नहीं

    दोस्तो के शहर की इस मस्लहत को क्या कहूँ
    तीर चलते हैं नज़र आती कमाँ कोई नहीं –मयंक

  3. आदरणीय दादा तुफ़ैल चतुर्वेदी साहब की इस पोस्‍ट से किसे असहमति हो सकती है…खा़सतौर पर जब यह भी कहा हो……

    ” मक़सद सिर्फ अच्छी शायरी को फ़रोग़ देना और परवान चढ़ाना है। मेरा आपसे हाथ जोड़ कर निवेदन है कृपया यहाँ आलोचनात्मक टिप्पणी मत कीजिये। आलोचना का सर्वमान्य नियम है कि किसी की आलोचना या तो उसी से निजी रूप से कही जाये या उस तक पहुंचाई जाये जो उस व्यक्ति में बदलाव ला सकता हो अन्यथा आलोचना का मक़सद उल्लेखित व्यक्ति को सार्वजानिक रूप से शर्मिंदा करने और चोरों की तरह अपनी भड़ास निकालने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता। लगभग सभी शायरों की ग़ज़लों के साथ उनका मोबाइल नंबर होता है। कृपया अपनी बात शायर को सीधे पहुंचाइये। इसमें आपके ज़ाहिर हो जाने का ख़तरा तो है मगर मक़सद शायरी का स्तर ऊँचा करना है तो खुल कर अपना नाम बता कर बात करने से ही बात बनेगी”

    आदरणीय अनाम साहब ने जब आदरणीय नवीन जी की ग़ज़लों के बारे में लिखा था, तो मैंने एक कमेंट दिया था। सच यह है कि विद्वता कूद-कूद कर दिखाने की चीज़ नहीं है..।
    आदरणीय मयंक भाई सदस्‍यों की निष्क्रियता से व्‍यथित दिखे इसलिए वादा करता हूं कि टिप्‍पणी नियमित रूप से करूंगा।

  4. दादा !! प्रणाम !!!
    इस पोस्ट की आवश्यकता अर्से से थी !! ये सभी बातें पाबन्दी से सभी को माननी ही चाहिये !! मैं जबसे ये पोर्टल बना है तभी से सकारात्मक पहलुओं को ध्यान मे रखते हुये गज़लों पर कमेण्ट भी पोस्ट कर रहा हूँ और जिस मकसद से ये पोर्टल आरम्भ किया गया उसकी भी पूरी अहतियात बर्त रहा हूँ !! पिछले 3 माह से निजी समस्याओं मे मस्रूफ हूँ इसलिये कुछ समय से कमेण्ट नहीं लिख पाया इसके पीछे मेरी निजी बन्दिशें भी हैं –सच यही है कि मेरे पास गत 2-3 बरस से जो भी समय रहा है वो सारा का सारा लफ्ज़ग्रुप को ही दिया गया और बेहद कामयाब अपने फेसबुक प्रोफाइल को भी मैने समय नहीं दिया –कारण बहुत स्पष्ट है कि मैं भी चाहता था कि सकारात्मक माहौल बने और किसी भी गज़ल के अच्छे पहलुओं को हाइलाइट किया जाये ताकि अच्छी शाइरी की स्वस्थ परम्परा चलती रहे और कज़बहसी और कम्ज़र्फी से इस पोर्टल को दूर रखा जाय !!! –लेकिन एक बात जो कष्टप्रद है वो यही है कि इस पोर्टल के नियमित सदस्यों –की सक्रिय भागीदारी का मुझे अक्सर अभाव दिखा है—बहुत बार आदमी व्यस्तता के चलते सहयोग नहीं कर पाता –लेकिन जब ये प्रव्रत्ति निरंतरता की ओर बढती है तब तकलीफ होती है –बहुत बार कुछ जीवंत इश्यूज भी आते हैं तब दरकार रहती है कि सभी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी ऐसे समय ज़रूरी है –लेकिन निराशा ही हाथ लगती है !! सिर्फ कुछ लोगों के प्रयासों से ही कोई परम्परा बहुत आगे नहीं जा सकती !! गलत का विरोध करने के लिये और सही का समर्थन करने के लिये आगे आना ही चाहिये !!! कोई भी सदस्य किसी ग़ज़ल के एक आध अच्छे शेर की विशेषता रेखांकित कर सकता है- सभी थोडी थोडी जिम्मेदारी वहन करें तो किसी भी गज़ल को उसकी साँगोपांग समीक्षा भी हासिल हो सकती है और ग़ज़ल को एक समेकित समीक्षा भी मिल सकती है –लेकिन ये जिम्मा सिर्फ एक आध लोगों के वहन करने के लिये नहीं है !! दूसरी बात जो आपने कहा कि –
    ” मक़सद सिर्फ अच्छी शायरी को फ़रोग़ देना और परवान चढ़ाना है। मेरा आपसे हाथ जोड़ कर निवेदन है कृपया यहाँ आलोचनात्मक टिप्पणी मत कीजिये। आलोचना का सर्वमान्य नियम है कि किसी की आलोचना या तो उसी से निजी रूप से कही जाये या उस तक पहुंचाई जाये जो उस व्यक्ति में बदलाव ला सकता हो अन्यथा आलोचना का मक़सद उल्लेखित व्यक्ति को सार्वजानिक रूप से शर्मिंदा करने और चोरों की तरह अपनी भड़ास निकालने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं रह जाता। लगभग सभी शायरों की ग़ज़लों के साथ उनका मोबाइल नंबर होता है। कृपया अपनी बात शायर को सीधे पहुंचाइये। इसमें आपके ज़ाहिर हो जाने का ख़तरा तो है मगर मक़सद शायरी का स्तर ऊँचा करना है तो खुल कर अपना नाम बता कर बात करने से ही बात बनेगी”
    ये अपील सभी सदस्य आइन्दा पाबन्दी से माने ताकि पोर्टल स्वस्थ गति से आगे बढता रहे !! नवीन के बारे मे “अनाम” सज्जन ने जो भी लिखा उसके विरोध मे नियमित सदस्यो ने आवाज़ नहीं उठाई जो कि तकलीफदेह है और अपने नाम से पोस्ट करनी चाहिये ये ज़रूरी है !!
    यहाँ ये बता दूँ कि –मुहत्तरम समर कबीर और जनाब देवेन्द्र गौतम की गज़लो पर जो “अनाम” नाम से पिछले दो कमेण्ट पोस्ट किये गये और डिलीट किये गये वो मैने लिखे थे –मेरा मकसद सिर्फ इस बात को हाइलाइट करना था कि कोई भी चाहे तो कमीगाह मे छिप कर नुकसान तो कर सकता है लेकिन एक पोर्टल को बनाने और उसको परवान चढाने मे जिनकी शक्ति और मेहनत लगी है उनके योगदान को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये !! अपनी इन दोनो समीक्षाओं को मैं खुद भी खरिज करता हूँ क्योंकि समर कबीर साहब से मेरे बेहद मीठे सम्बन्ध हैं और उनके कलम का मैं बहुत बडा प्रशंसक हूँ और देवेन्द्र गौतम साहब के बयान का भी काइल हूँ !! इन कमेण्ट्स से इन दोनो को जो कष्ट पहुंचा उसके लिये मुझे खेद है लेकिन मकसद ग़ज़ल को ख़ारिज करना कतई नहीं था न ही शाइर को किसी किस्म की तकलीफ पहुंचाना !! मैं इस बात का संकेत देना चाहता था कि कमीगाहों मे छिप कर कोई भी पोर्टल को नुकसान पहुंचा सकता है !! अनाम नाम से जिस व्यक्ति ने भी नवीन के खिलाफ लिखा उसको एक बार फिर चुनौती है कि अगर उसके पास ज़मीर है और कोई ईमान है तो मेरी तरह खुल कर अपना नाम ज़ाहिर करे। मेरा मकसद भी इस पोर्टल पर उन परम्पराओं को आगे लाना था जिसके लिये आपने ये अपील जारी की है !!
    उमीद है कि आगे इस पोर्टल पर कज़बहसी नहीं होगी और अनाम नाम के सभी गैर्ज़रूरी य उपद्रवी कमेण्ट डिलीट ही कर दिये जायेंगे –इससे पहले कि वो किसी किस्म का नुकसान पोर्टल को पहुंचा सकें !!—मयंक

  5. दादा पालागन।

    अनाम साहब की मंशा से तो कब का पर्दा उठ चुका। लफ़्ज़ के विरोधियों के साथ लफ़्ज़ का कोई भी सनेही न तो कल ही था न कभी हो सकेगा।

    आदरणीय नीरज भाई प्रणाम।

  6. हुज़ूर “लफ्ज़” न रुका है न रुकेगा। हालाँकि मुझे ऐसी भाषा यहाँ इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए लेकिन कुछ लोग शायद यही भाषा समझते हैं इसलिए कह रहा हूँ कि ” कुत्तों के भौंकने से हाथी नहीं रुका करते “.या यूँ कहूंकि ” कोई क़ातिल अगर किसी शहर में छुपा है तो उसे न पकड़ पाने की स्तिथि में पूरा शहर बम से नहीं उड़ाया जाता ” अब जनाब जब आपने गुलाब उगाया है तो फिर फूलों के साथ काँटों के लिए भी तैयार रहिये। वैसे भी गलत ढंग से की गयी आलोचना से न तो शायर को कोई फर्क पड़ता है न उसके चाहने वालों को।
    हुज़ूर आपने अपने गुस्से का विनम्र निवेदन करने में थोड़ी देर करदी , जब नवीन भाई के साथ बदतमीजी हो रही थी तभी आपको तलवार म्यान से निकाल लेनी चाहिए थी खैर “देर आये दुरुस्त आये “।

  7. Sir, Ek choti si request bhi hai, Maine bhi ek ghazal email ki thi aapko, shayad wo pasand nahi ki gayi. Agar ho sake to aap kripaya karke mujhe meri galtiyon se wakif kara saken to badi meharbaani hogi. Maine abhi abhi likhna shuru kiya hai. Ustad ka haath sir per rahega to shayad ye nacheez bhi kuch ban jaaye.
    Agrim mein dhanyad

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