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T-24/4 परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की-चंद्रभान भारद्वाज

परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की
पड़ी है मार झेलनी कटार या अँगार की

खुली है आँख जब किया है सूर्य का मुक़ाबला
‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

झरे थे फूल कल तलक तो उनके शब्द शब्द से
उन्हीं के होंठ आज बात कर रहे हैं ख़ार की

ये दोष वक़्त का रहा कि दोष है हकीम का
मरीज़ सन्निपात का दवाई दी बुखार की

बँधी रहीं थी जब तलक तो ख़ुद ही शक्ति बन गईं
खुलीं तो ख़ाक की हुईं वो मुट्ठियाँ हज़ार की

चमन को जो उजाड़ने में खुद सदा शरीक थे
बता रहे हैं आजकल वो सब कमी बहार की

समझ सकेंगे वो कहाँ है ज़िंदगी का अर्थ क्या
जिए हैं उम्र भर स्वयं जो ज़िंदगी उधार की

बताएँ ‘भारद्वाज’ क्या है हाल अब वियोग में
सदी सी लग रही है इक घड़ी भी इंतज़ार की

चंद्रभान भारद्वाज                               09826025016

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8 comments on “T-24/4 परीक्षा दी यहाँ किसी ने जब भी अपने प्यार की-चंद्रभान भारद्वाज

  1. झरे थे फूल कल तलक तो उनके शब्द शब्द से
    उन्हीं के होंठ आज बात कर रहे हैं ख़ार की
    बहुत अच्छा शैर हुआ है , जनाब चंद्रभान जी मुबारकबाद क़ुबूल फरमाए ।

  2. ghazal meN beshtar hindi shabdoN ke prayog se aap ghazal ka saundarya badha dete haiN…wahhh

  3. भारद्वाज साहब,
    आपकी ग़ज़लों से गुज़रना एक नया अनुभव लेना है।
    इस ग़ज़ल के कई अश्‍आर पर भरपूर दाद।
    सादर
    नवनीत

  4. ये दोष वक़्त का रहा कि दोष है हकीम का
    मरीज़ सन्निपात का दवाई दी बुखार की
    बँधी रहीं थी जब तलक तो ख़ुद ही शक्ति बन गईं
    खुलीं तो ख़ाक की हुईं वो मुट्ठियाँ हज़ार की
    चमन को जो उजाड़ने में खुद सदा शरीक थे
    बता रहे हैं आजकल वो सब कमी बहार की
    समझ सकेंगे वो कहाँ है ज़िंदगी का अर्थ क्या
    जिए हैं उम्र भर स्वयं जो ज़िंदगी उधार की

    वाह वाह क़माल की ग़जल भारद्वाज जी

  5. चमन को जो उजाड़ने में खुद सदा शरीक थे
    बता रहे हैं आजकल वो सब कमी बहार की

    वाह वाह वाह क्या बात है साहब क्या बात है

  6. खुली है आँख जब किया है सूर्य का मुक़ाबला
    ‘ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की’

    झरे थे फूल कल तलक तो उनके शब्द शब्द से
    उन्हीं के होंठ आज बात कर रहे हैं ख़ार की

    निहायत खूबसूरत ग़ज़ल भरद्वाज साहब , दाद कबूलें

  7. हिंदी का धीमा मद्धम लहजा भरद्वाज साहब की शिनाख़्त है और वो हर बार उनका साथ देता है। अच्छी ग़ज़ल के लिए दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  8. मन को जो उजाड़ने में खुद सदा शरीक थे
    बता रहे हैं आजकल वो सब कमी बहार की

    kya kahne chandrbhan bhardwaz ji .
    bahut achhii gazal hai

    dher sari daad

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