15 टिप्पणियाँ

T-24/3 गिरी हैं झील में जो चंद पत्तियाँ चिनार की-गौतम राजरिशी

गिरी हैं झील में जो चंद पत्तियाँ चिनार की
सुना रही हैं पानियों को धुन कोई सितार की

नहीं है स्वाद तेरे बिन धुएँ में इसके, आ भी जा
कि ज़िन्दा हो वो ख़ुशबू फिर से बुझ चुके सिगार की

उधर है बेरुख़ी की फ़ौज और तन्हा दिल इधर
छिड़ी है जंग ‘सौ सुनार की’ से ‘इक लुहार की’

लरज़-लरज़ सी धड़कनें, थमक-थमक सी साँस में
कहानी तेरे इश्क़ की या उम्र के उतार की … ?

ये राज़ सबको है पता कि उल्फ़तों की पेशगी
जो तूने दी, हक़ीक़तन है ली हुई उधार की

अजब-सी इक महक से भर उठा था चौक यक-ब-यक
खुली जो लाल बत्ती पर, वो खिड़की नीली कार की

ज़रा हवा ने छेड़खानी की जो भीगी ज़ुल्फ़ से,
उठी मचल के बादलों से सिंफनी फुहार की

ख़िज़ाँ ने नोच ली हैं जितनी भी शजर की टहनियाँ
सुनायेंगी ये जल्द ही कहानियाँ बहार की

बस इक झलक की चौंध से वजूद नूर-नूर है
“ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

गौतम राजरिशी 09759479500

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15 comments on “T-24/3 गिरी हैं झील में जो चंद पत्तियाँ चिनार की-गौतम राजरिशी

  1. अजब-सी इक महक से भर उठा था चौक यक-ब-यक
    खुली जो लाल बत्ती पर, वो खिड़की नीली कार की
    बहुत अच्छा शैर हुआ हे जनाब गौतम जी , मुबारकबाद क़ुबूल फरमाए ।

  2. aap ka apna usloob hai…aap ka apna thinking prism hai…jis se is tarah ki chhataayen nikalti haiN..bahut khoob

  3. वाकई बहुत लिरिकल ग़ज़ल। खास़ गौतम साहब के रंग की।
    भरपूर दाद भाई साहब।
    सादर
    नवनीत

  4. ज़रा हवा ने छेड़खानी की जो भीगी ज़ुल्फ़ से,
    उठी मचल के बादलों से सिंफनी फुहार की
    ख़िज़ाँ ने नोच ली हैं जितनी भी शजर की टहनियाँ
    सुनायेंगी ये जल्द ही कहानियाँ बहार की
    बस इक झलक की चौंध से वजूद नूर-नूर है
    “ये दास्तान है नज़र पे रौशनी के वार की”

    वाह वाह क़माल की गज़ल बधाई हो दिल से दाद

  5. गौतम भैय्या ये लहजा, ये मिठास , ये पहाड़ों की सबंधी सबंधी खुशबू सिर्फ आपकी ग़ज़लो में नज़र आती है, कोई भी देख कर बता सकता है की ये ग़ज़ल आपकी है, वाह वाह 🙂

  6. वाह, अच्छे अशआर कहे हैं गौतम भैया.
    दाद कुबूल कीजिये !

  7. पूरी ग़ज़ल गौतम के अपने रंग में रंगी है – ये फौजी ज़ान ले लेगा किसी दिन – जियो गौतम जियो

  8. गौतम आपकी ग़ज़ल से लिरिक या नवगीत का लहजा झांकता है। वो काम इस बार भी हुआ। भरपूर दाद क़ुबूल फ़रमाइये

  9. अजब-सी इक महक से भर उठा था चौक यक-ब-यक
    खुली जो लाल बत्ती पर, वो खिड़की नीली कार की
    waah.. bahut accha she’r hua hai gautam bhai….

  10. अजब-सी इक महक से भर उठा था चौक यक-ब-यक
    खुली जो लाल बत्ती पर, वो खिड़की नीली कार की

    kya khoob hai …
    tamaam gazal hi achhii hai Gautam ji

    dher sari daad

  11. आदरणीय गौतम जी
    आपका ग़ज़ल संग्रह हाल ही में पढ़ा है
    आपकी ग़ज़लें बहुत अलग होती हैं

    यह ग़ज़ल भी खूब हुई है

    आपको और पढ़ने को दिल करता है. आपकी और ग़ज़लों का इंतज़ार रहेगा

    पढ़ी है आपकी ग़ज़ल, चिनार से सिगार तक

  12. गौतम भाई बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई,
    ख़ास आपके अंदाज़ की।
    बहुत मुबारकबाद।

  13. bahut achhi ghazal hui hai bhaiya..bilkul apke rang ki..daad qubool kar’n..sadar

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