15 टिप्पणियाँ

T-24/1 रहे वो मुद्दतों तलक तलाश में बहार की-“शाज़” जहानी

रहे वो मुद्दतों तलक तलाश में बहार की
जो ख़ूबसूरती समझ न पाए ख़ारज़ार की

तुलूअ आफ़ताब शिर्क़ में हुआ तो है मगर
अभी कहाँ हुई है ख़त्म रात इंतज़ार की

रही न बात शर्म की कि क़र्ज़ माँगना पड़े
बफ़ख़्र लोग जी रहे हैं ज़िंदगी उधार की

बशर का वज़्न हो रहा ज़मीनो-मालो-ज़र से है
मिरी नज़र में इनसे बढ़ के क़द्र है वक़ार की

सिफ़त को फ़ौक़ियत शुमार पर है, कोई शक नहीं
सुनार की न सौ करे जो इक करे लुहार की

बयाने-दीदे-यार में कलीम कर मदद ज़रा
ये दास्तान है नज़र पे रोशनी के वार की

सिंगार आपका ख़ुदा ने अपने हाथ है किया
बताइए, बची है क्या जगह किसी निखार की ?

कशिश हो बेहिसाब इश्तिहार में तो जानिए
कहीं पे इक नहंग है तलाश में शिकार की

रहे ख़याल बोलने से क़ब्ल यह कि बारहा
जहाँ है गुफ़्त सौ ,वहीं है ख़ामुशी हज़ार की

दुआ तो हो भी जाए एक बार बेअसर, मगर
कभी न रायगां गयी है आह दिलफ़िगार की

नज़र से दूर जो हुआ , हुआ वो दूर ज़िह्न से
जली है शम्अ मुत्तसिल कभी किसी मज़ार की ?

महज़ निकोहिशें मिलीं उसे वो जब तलक जिया
क़सीदःगोइ, जब मरा, तो सबने शानदार की

ज़रा से नक़्द के इवज़ जो कैफ़ बाँटता फिरे
दराज़ उम्र हो ख़ुदा हरेक आबकार की

ये ज़िंदगी भी क्या है , मैकशी का एक दौर है
सुरूर की गुज़र चुकी, बची है अब ख़ुमार की

तवील इस ग़ज़ल में सिर्फ़ एक शेर काम का
लगा कि चोंच में है ज़ाग़ के कली अनार की

हुज़ूर ख़ंदःज़न हैं पढ़ के “शाज़” जिस किताब को
ख़ता मुआफ़, है वो ख़ुदनविश्त ख़ाकसार की

आलोक कुमार श्रीवास्तव “शाज़” जहानी 09350027775

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15 comments on “T-24/1 रहे वो मुद्दतों तलक तलाश में बहार की-“शाज़” जहानी

  1. Ba fakhr log ji rahe hain zindgi udhaar ki, waaaaaaaaah, haqeeqat par mubni sher keh diya aapne, bahot khoob

  2. सिंगार आपका ख़ुदा ने अपने हाथ है किया
    बताइए, बची है क्या जगह किसी निखार की ?
    बहुत ख़ूबसूरत शैर है , जनाब ‘शाज़’ साहिब मुबारकबाद क़ुबूल फरमाए।

  3. khoobsoorat ghazal par dheroN mubarakbaad
    kya kya sher nikaale haiN wahhh

  4. शाज़ जहानी साहब।
    देर से आने के लिए मुआफ कीजिएगा।
    बहुत उम्‍दा ग़ज़ल।
    भरपूर दाद।
    सादर
    नवनीत

  5. नज़र से दूर जो हुआ , हुआ वो दूर ज़िह्न से
    जली है शम्अ मुत्तसिल कभी किसी मज़ार की ?

    वाह वाह

  6. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है साहब, बहुत बहुत बधाई

  7. सिफ़त को फ़ौक़ियत शुमार पर है, कोई शक नहीं
    सुनार की न सौ करे जो इक करे लुहार की

    बयाने-दीदे-यार में कलीम कर मदद ज़रा
    ये दास्तान है नज़र पे रोशनी के वार की

    ये ज़िंदगी भी क्या है , मैकशी का एक दौर है
    सुरूर की गुज़र चुकी, बची है अब ख़ुमार की

    Subhan Allah…

  8. तरही-24 का पहला फल भरपूर मीठा, रसीला। पूरी ग़ज़ल शानदार, मरहबा, आफ़रीन

  9. Achhii gazal hui hai shaz jahani sahab..
    dili daad qubul kare.n..

  10. Saaz sahab
    Kamaal gazal hui hae
    Dheron dher daad qubool farmayein.
    Sadar
    Pooja

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