28 टिप्पणियाँ

एक तनहा शेर

तुम तखल्लुस में तुम्हारा नाम जड़ना छोड़ दो।
दूसरे की शर्ट को अपनी नहीं कहते ‘नवीन’॥

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About Navin C. Chaturvedi

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28 comments on “एक तनहा शेर

  1. मेरा अनाम साहब से आैर भाई नवीन सी चतुर्वेदी भाई साहब से आग्रह है कि इस मंच को इस बहस से बचाएं ताकि कुछ ग़ज़ल पर कुछ सकारात्‍मक वातावरण बना रह सके। हर शायर के लिए उसकी ग़ज़लें और अश्‍आर ऐसे होते हैं किसी मां के लिए उसके बच्‍चे। ऐसे में अनाम साहब ने जो भी कहा है वह शायर को चुभना ही था। अनाम साहब ! आपसे भी दरख्‍़वास्‍त है कि आप सही कह रहे हैं या ग़लत इसका फ़ैसला हम लोग नहीं कर सकते। हम केवल ग़ज़लों पर बात करें तो अच्‍छा है। ऐसी बहस जब-जब हुई है ग़ज़ल के साथ-साथ संबंधों का ज़ायका भी ख़राब हुआ है।
    सादर
    नवनीत शर्मा

  2. सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद ( ना था )
    मेरी कोशिश थी कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

    और सूरत बदलती लग रही है। मयंक साब आपका शुक्रिया, और धन्यवाद नवीन जी को भी ….तनिक सांस लेने के लिए।
    “कवियों
    कोशिश करो
    कि कविता
    फैक्ट हो
    फैक्टरी नहीं।”

  3. मयंक भैया ख़ारिज़ करने के लिये इन्हें प्रकट होना होगा। मैं शायर की हदें जानता हूँ मगर यहाँ सीन कुछ और है। साधारण मामला होता तो मैं विनीत बन कर स्वीकार कर लेता।

  4. लफ़्ज़ के अनाम संरक्षक कितने हैं !!?? मुझे उमीद नहीं थी कि लफ़्ज़ पर क्या छपना चाहिये और क्या नहीं इसकी चिंता दादा से भी अधिक करने वाले मुम्बई और इन्दौर में भी मौजूद हैं !!! अनाम जी की साहित्यिक प्रतिभा पर तो रश्क हो रहा है !! कितने खूबसूरत अख़्तर नज़्मी साहब के शेर इन्होने क्वोट किये !!! और कितने अधिकार से शेर पर सवाल पूछा !!! ये माद्दा सिर्फ और सिर्फ उस्तादों मे ही हो सकता है !!! इसके बावज़ूद वो अनाम बने रहे !! ये शहादत क्यों ??!! इसके सिवा दो घण्टे के अन्तराल मे उन्होने कमेण्ट मे संशोधन भी कर लिया शब्द “दुरुपयोग” को बदल कर “जिस ढंग से” कर लिया !! इसके अर्थ ये हैं कि वो अपने लिखे के प्रति बेहद सजग और पुनर्निरीक्षण की वृत्ति से भरे हैं !! ये माद्दा भी सिर्फ और सिर्फ समर्थ साहित्यकारों मे होता है !! मैं अनाम जी का मूल्याँकन इनके आरम्भिक कमेण्ट्स के आलोक मे सिर्फ सामईन ग्रुप के एक सामान्य नुमाइन्दे के रूप में कर रहा था –लेकिन इस संवाद की आवाज़ में उनकी प्रच्छन्न छवि एक पुरअसर और पुरोधा किस्म के अदीब जैसी उभर रही है !!!
    वो सामने था फिर भी कहाँ सामना हुआ
    रहता है अपने नूर में सूरज छुपा हुआ –शिकेब
    मुझे ये किरदार “”अनाम”” लम्बे अर्से नहीं भूलेगा !!! क्या मस्लहत आमेज़ आगाज़ किया पोर्टल पर !! किस इख्तियार से इस पोर्ट्ल के ऐसे किरदार के बयान को ख़ारिज कर दिया जिसने ये वेबसाइट खुद बनाई थी और किस धमक के साथ प्रकरण में पूरे जोश ज़िद और जवानी के साथ हावी रहा !!! इतनी बेमिस्ल प्रतिभा के बावज़ूद वो अनाम ही बना रहा !!!! अनाम जी को “नमन” !! अब मैं इनकी बात सिर्फ सुनूँगा और वो भी पूरे पराजयबोध के साथ !! क्योंकि आपकी बात इसलिये भी सच हो सकती है कि आपके बयान के विरोध मे एक भी स्वर नहीं आया !! आखिर क्यों !! शायद ये सही ही कह रहे हो!! एक लम्बा समय चाहिये इनकी बात पर मनन करने के लिये !!!

    • १ बिना पासवर्ड कमेण्ट एडिट नहीं हो सकता

      २ अपने पासवर्ड से केवल अपना कमेण्ट एडिट हो सकता है

      ३ एडमिन राइट वाले पासवर्ड से किसी का भी कमेण्ट एडिट हो सकता है

      ४ अनाम धारी कमेण्ट कर्ता वो होते हैं जो बिना username password के कमेण्ट्स करते हैं

      मयंक भैया मुझे इस बात का संतोष है कि लफ़्ज़ के लिये आप ने मुझ से जो करने को कहा, मैं किसी हद तक कर पाया। बहुत बहुत आभार।

  5. भाई ऐबे सरक़ा वालों से घबरा गए क्या?

  6. बड़े / छोटे भाई यहाँ समझना है तो प्रकट हो जाइये। वरना फोन कर लीजिये। या ग़ज़ल को यानि सारे अशआर को बिना किसी पूर्वाग्रह के एक बार ग़ौर से पढ लीजिये।

    हो सकता है आप सही साबित हों और मैं ग़लत। शायर और श्रोता / पाठक की मनस्थितियाँ भिन्न होती हैं।

    • सपनों को पलने दीजे
      लमहों को लमहे दीजे

      अँसुअन के धारे दीजे
      अँखियों को हँसने दीजे

      सुन कर भी सुनते ही नहीं
      आप तो बस रहने दीजे

      दिल पिंजड़े में रह लेगा
      दाना-पानी दे दीजे

      ख़ुशियाँ आप के पास न थीं
      ग़म तो अच्छे से दीजे

      कातिल पर है ख़ून सवार
      दिल को फव्वारे दीजे

      पलकें पसरी जाती हैं
      भवों को सुस्ताने दीजे

      लौट आयेंगे जल्दी ही
      ज़रा सा उड़ लेने दीजे

      नयी कोंपलों की ख़ातिर
      हवाओं को पत्ते दीजे

      गुम हो जायेंगे गिर कर
      तारों को टिकने दीजे

      फ़न को पाँव नहीं दरकार
      हम को हरकारे दीजे

      दीवारें भी महकेंगी
      महकारें ला के दीजे

      बेकल है मन का जोगी
      दरिया को बहने दीजे

      बचपन माँग रहा है ‘नवीन’
      अँगने-गहवारे दीजे

  7. कातिल पर है ख़ून सवार
    दिल को फव्वारे दीजे.

    इस शेर का क्या मतलब है….
    मैं चाहता हूँ कि अगर तुक के अलावा इसका कोई मतलब भी है….
    तो कृपा कर बताएं…..
    और चूँकि सबको पढ़वाया है … तो मतलब भी सबको बताएं

    मुझे पता है आप इसका मतलब नहीं समझा सकते।
    और फिर से वही मेरे प्रकट होने पे आ जायेंगे।

    • अनाम साहब, शायद ये मेरे एक शेर के सहारे से नवीन बात निकलना चाहते हैं। अपनी आचार्य परंपरा के लोगों के किसी भी ख़याल का अपने ढंग से इस्तेमाल सिलसिले के शागिर्दों का हक़ होता भी है।

      वार कीजे कि तरीका है यही जानने का
      खून फ़व्वारे सा उछलेगा अगर दिल हुआ मैं

  8. अलविदा। मेरे फोन नम्बर है यहाँ।

  9. नहीं समझा पायेंगे तो आप से समझ लेंगे। मगर आप के दर्शन तो हों।

  10. आप मेरे अग्रज भी हो सकते हैं और अनुज भी। सम्वाद दो व्यक्तियों के बीच होता है।

  11. अब मैं आपसे कुछ पूछूंगा तो आप समझा नहीं पाएंगे…

  12. कमाल की ग़ज़ल है या नहीं यह तय करने वाले मैं या आप नहीं हैं।

    कागज़ के बनिस्बत मैं इण्टरनेट को प्राथमिकता देता हूँ।

    पब्लिक प्लेटफार्म यानि कि फेसबुक पर लोग हर दिन जाने क्या क्या पोस्ट करते रहते हैं। वैसा कुछ तो नहीं कर रहा मैं।

  13. मुझे आप की डिटेल्स मिल चुकी है। आप चाहें तो फोन पर बात कर लें। वादा करता हूँ बात हम दौनों के बीच रहेगी। आप की हर अच्छी सलाह मानी जायेगी, लेकिन यह लुकाछिपी मंजूर नहीं। साहित्यम् पर भी बहुत कुछ झेल चुका हूँ। उम्मीद करता हूँ वह आप न हों।

    दुहराता हूँ।

    आप की हर अच्छी सलाह मानी जायेगी, लेकिन यह लुकाछिपी मंजूर नहीं।

  14. आप की हर बात पर विचार किया जा सकता बशर्ते आप Pp mode से बाहर आएँ।

  15. नवीन जी,
    बस थोड़ा गेप भर मेंटेन कर लीजियेगा।
    और जब लगे कि सचमुच कोई ग़ज़ल कमाल की बन पड़ी है तो अवश्य पेश कीजिये।
    बाकी सब खैरियत है।

    किसी ने कहा है ना,
    मिले हो आज तो दो-चार दिन के बाद मिलो
    ताल्लुकात में वक्फा बहुत ज़रूरी है।

  16. क़रीबन पिछले १८० हफ़्तों में मैं ने तक़रीबन ८० पोस्ट की होंगी। इन ८० में से लगभग आधी दूसरे शायरों की या कुछ पोर्टल सम्बन्धित अन्य पोस्ट्स होनी चाहिये। बची ४० में से भी अधिकांश रिसेन्ट्ली पोस्ट की हैं।

    १८० हफ़्तों में ४० पोस्ट इरिटेट कर रही हैं? बाक़ी आँकड़े भी गिन लिये होते।

    बहुत कुछ लिखने को दिल हो रहा है पर अनावश्यक सिद्ध होगा।

  17. प्रिय नवीन जी,
    दिल से रिक्वेस्ट करता हूँ कि आप बने रहें…

    • २०००+ फोलोअर्स के इस पोर्टल, जिस पे कि तरही के दिनों के अतिरिक्त गिने चुने (एडमिन मण्डल सहित) लोग ही आते हैं, वहाँ आप जैसे अनामधारियों की अनुपस्थिति खलेगी। आप आते रहिये।

  18. आप की जानकारी सार्वजनिक करने से बेहतर है मैं ही इस पोर्टल को छोड़ देता हूँ।

  19. मेरा सिर्फ ये कहना था, कि ये महाशय इस प्लेटफार्म का जिस ढंग से उपयोग कर रहे हैं…. वो इरिटेट करता है,
    क्या संपादक मंडल या विज़िटर्स में से ऐसा कोई भी नहीं जो मेरी इस फीलिंग से एग्री करता हो!??
    इस सिलसिले में एक शेर-
    क्या मिरा हमख़याल कोई नहीं,
    तू अगर है तो हाथ ऊंचा कर।

    रही बात कॉमेंट की ? …. तो सभी प्रकाशन संस्थानों में एक स्पेस होता है जहाँ पाठक अपनी बात रखते हैं.. आप परेशान से क्यों हैं. और अपने किसी पाठक को बगैर किसी सबूत के प्रायोजित-पप्पू कहना कौन सा ढंग है संवाद का ?
    … अगर मेरी बात में कोई दम नहीं तो मुझे नज़रअंदाज़ कीजिये …और लगता है कि मैं ठीक कह रहा तो कुछ विचार कीजिये ….

    एक बार फिर मेरा सविनय निवेदन बस इतना सा है कि आप अपनी फ्रीक्वेंसी थोड़ी कम कर सकते हैं…. और या फिर मुझे आदेश दीजिये कि मैं इस फोरम को अन-सब्सक्राइब कर दूँ।

    ताकि मेरे पर्सनल ईमेल अकाउंट को रिलीफ मिले।

    धन्यवाद।

  20. मान्यवर आप की दौनों IP Address की जानकारी मिल चुकी है। बाकी आप स्वयं समझदार हैं।

  21. ना मुनासिब है खून खौलाना,
    हफ्ते दो हफ्ते बख्श मौलाना

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