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इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे-आलोक मिश्रा

अपने परदादा उस्ताद हज़रते-कृष्ण बिहारी ‘नूर’ साहब की ज़मीं में गुलाम इब्ने-ग़ुलाम की नज़्र

इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे
याद आता भी नहीं ख़ाब वो बिखरा कैसे

कितने सायों से भरी है ये हवेली दिल की
ऐसी भगदड़ में कोई शख़्स ठहरता कैसे

फूल ज़ख़्मों के यहाँ और भी चुन लूँ लेकिन
अपना दामन मैं करूँ और कुशादा कैसे

दुःख के सैलाब में डूबा था वो ख़ुद ही इतना
मेरी आँखों, तुम्हें देता वो दिलासा कैसे

काँच के ज़ार से बस देखता रहता था तुम्हें
बंद शीशों से मैं आवाज़ लगाता कैसे

इसका फन मैंने बहुत देर तलक कुचला था
रह गया सांप तिरे दर्द का ज़िंदा कैसे

अब तो आँखों में सियाही सी भरी रहती है
ऐसे आलम में कोई ख़ाब हो उजला कैसे

दाग़ ही दाग़ उभर आये मिरे चेहरे पर
रंग मेरा ऐ मुसव्विर हुआ भद्दा कैसे

ख़ुश्क मिट्टी में पड़ा था मिरे दिल का पौधा
इसकी शाख़ों पे कोई फूल भी आता कैसे

आलोक मिश्रा 09876789610

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5 comments on “इक अधूरी सी कहानी मैं सुनाता कैसे-आलोक मिश्रा

  1. aalok poori ghazal shndaar hai pyaare… aur
    कितने सायों से भरी है ये हवेली दिल की
    ऐसी भगदड़ में कोई शख़्स ठहरता कैसे
    ye she’r to jaanleva waah waah…. aisi bhagdad ka jawaab nahi…. bahut umda…

  2. क्या कहने आलोक भाई !
    वाह वाह !!

  3. काँच के ज़ार से बस देखता रहता था तुम्हें
    बंद शीशों से मैं आवाज़ लगाता कैसे

    Zindabaad bhai zindsbaad

  4. Kya hi gazal hui alok bhaia
    Maza aa gaya
    DIli daad qubul kijiye

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