4 टिप्पणियाँ

गूंजती है अभी वही आहट-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

गूंजती है अभी वही आहट
तेरे क़दमों की आख़री आहट

कौन मानेगा मैंने पाई है
एक खिलते गुलाब की आहट

कौन आता है रोज़ रातों को
गूंजती है दबी दबी आहट नींद

आँखों से रूठ जाती है
जब भी होती है ख़ाब की आहट

मैंने उसको झिंझोड़ कर पूछा
यार क्या तुमने भी  सुनी आहट?

एक बेनाम सा जज़ीरा मैं
और लहरों सी आपकी आहट

हमने चाहा था साथ तेरा हो
हाथ आई फ़क़त तिरी आहट

हिज्र की इंतहा यही है क्या
अपनी धड़कन लगे तिरी आहट

कोई आसेब है मिरे घर में
हर घड़ी हर तरफ़ नई आहट

रात ख़ामोश हो गया ‘ कान्हा
साथ ग़ुम हो गयी तेरी आहट
09911568839

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4 comments on “गूंजती है अभी वही आहट-प्रखर मालवीय ‘कान्हा’

  1. Bahut achhii gazal hui hai Prakhar

    dher sari daad

    Alok

  2. Bahut achhii gazal hui hai Prakhar..

    dheron daad

    Alok

  3. एक बेनाम सा जज़ीरा मैं
    और लहरों सी आपकी आहट
    वाह ……प्रखर भाई कमाल की ग़ज़ल हुई है।
    तालियों के साथ ढेरों दाद क़ुबूलकरें
    पूजा:)

  4. Bahut hi umda gazal hui kanha sahab
    MAza aa gaya
    Dili daad kubul kijiye

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