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एक लट्टू की तरह पहले ज़मीं पर घूम के-स्वप्निल तिवारी

एक लट्टू की तरह पहले ज़मीं पर घूम के
लफ़्ज़ नाचा सर पे चढ़ कर फिर हर इक मफ़हूम के

घिर गया हूँ छोटे क़द के लोगों से मैं इस क़दर
दूर तक फैले हुए हैं सिलसिले मशरूम के

ख़ुदकशी की आरज़ू नौज़ायदा थी, मर गयी
दांत भी निकले नहीं थे अब तलक मासूम के

अब के वो फ़व्वारा भी सूखा मिला, जिसमें कभी
ख़्वाहिशन हमने भी था सिक्का उछाला चूम के

ख़ाक उड़ाने का मज़ा मुझ से ही है ये जान कर
लौट आई है उदासी दश्त सारा घूम के

रक़्स में तो हैं, मगर ये फ़िक्र भी है साथ ही
क्या करेंगे गर कभी थकने लगे हम झूम के

कोई दिल के भीतरी कमरों में आया ही नहीं
ग़म भी तो सारे रहे मेहमान ड्राइंगरूम के

ज़रा छू जाइए उनसे तो गिर जाते हैं सर
फिर भी कैसी दौड़ में हैं लोग ये मशरूम के

आ गयी थी दिल की जानिब याद तेरी कल मगर
थक गयी थी सुब्ह तक सारा इलाक़ा घूम के

इश्क़ की मट्टी उठाता दश्त में…. हम और कौन ?
एक हम ही तो क़रीबी हैं यहाँ मरहूम के

स्वप्निल तिवारी 08879464730
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10 comments on “एक लट्टू की तरह पहले ज़मीं पर घूम के-स्वप्निल तिवारी

  1. Schön, dass Du wieder dabei bist. Nicht mehr lange und es ist wieder Frühling. Dann schnell raus, die ersten Sohnnestranlen genießen. Hach das wird schön.Ist das eine Apfelblüte? Egal. Sehr schönes Bild und ich stehe voll hinter Dir – in Sachen Frühling. Nebenbei: Vielen Dank für Deine Verlinkung.LG Timm

  2. ख़ुदकशी की आरज़ू नौज़ायदा थी, मर गयी
    दांत भी निकले नहीं थे अब तलक मासूम के

    kya hi umda gazal hui hai bhaiya
    maza aa gya

    dheron daad

    regards
    Alok

  3. पूरी ग़ज़ल स्वप्निलाहिन स्वप्निलाहिन महक रही है।ज़िंदाबाद .मुबारकबाद..

  4. Lajawab ..lajawab…lajwab…waahhh dada..kya ghazal hai

  5. भई वाह स्वप्निल जी

    कमाल के शेर
    शानदार ग़ज़ल

    क्या बात है

  6. शे’र एक से बढकर एक काढे हैं आतिश भाई

  7. Ahaa..Ahaa..din ban gaya bhaiya
    waahh waahh waahh

    Superb

    regards
    Alok

  8. Bahut hi pyari gazal hai dada
    DIli daad qubul kijiye

    SAdar
    IMran

  9. ऐसी ग़ज़ल पर कुछ बोलने की रखे हैं क्या? ?

  10. घिर गया हूँ छोटे क़द के लोगों से मैं इस क़दर
    दूर तक फैले हुए हैं सिलसिले मशरूम के

    रक़्स में तो हैं, मगर ये फ़िक्र भी है साथ ही
    क्या करेंगे गर कभी थकने लगे हम झूम के

    कोई दिल के भीतरी कमरों में आया ही नहीं
    ग़म भी तो सारे रहे मेहमान ड्राइंगरूम के

    स्वप्निल कहाँ हो भाई ? सामने खड़े हो कर सैल्यूट करने को जी कर रहा है। भाई दिन बना दिया आपने क्या खूबसूरत ग़ज़ल कही है।–अहा हा हा जियो यार जियो

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