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एक तस्वीर बनती बिगड़ती हुई, सर्द कोहरे में लिपटा हुआ आसमाँ-दिनेश नायडू

एक तस्वीर बनती बिगड़ती हुई, सर्द कोहरे में लिपटा हुआ आसमाँ
फिर भी शब फूल बन कर महकती हुई वज्ह यादों की नन्ही सीं कुछ तितलियाँ

बर्फ़बारी के झक्कड़ गरजते हुए सब्ज़ मौसम की यादें कुचलते हुए
गुज़रे मौसम का पैग़ाम लाता रहा जलती-बुझती हुईं सिगरटों का धुआँ

मेरे घर के दरीचे पे जलता हुआ एक तनहा अकेला दिया आस का
उसके आने की उम्मीद करती हुईं मेरे कमरे की कुछ अधखुली खिड़कियाँ

दश्त की सरहदों पे उभरने लगा एक चेहरा किसी जानने वाले का
कोई आवाज़ मुझको बुलाने लगी फिर सदा से महकने लगीं वादियाँ

वो जो आवाज़ के दश्त में खो गया वो हमारी ख़मोशी का इक देस था
अब मैं अपनी कहानी सुनाता नहीं, कोई मेरी कहानी भी सुनता कहाँ ?

शहर भर की उदासी समेटे हुए पार्क के कोने में एक ही बेंच है
जिसकी आग़ोश में मेरी सिगरट का कश रोज़ लेती है बेहाल तन्हाइयाँ

मैं तो सहरा की उड़ती हुई गर्द को अपनी आँखों में भरने लगा हार कर
अब मुझे राह कोई नहीं ढूंढ़नी अब नहीं जानना तेरा घर है कहाँ

दिनेश नायडू 09303985412

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6 comments on “एक तस्वीर बनती बिगड़ती हुई, सर्द कोहरे में लिपटा हुआ आसमाँ-दिनेश नायडू

  1. Kamaal ki ghazal ..kya kehne bhaiya..waahh waahh

  2. क्या कहूँ ..और कहने को क्या रह गया.,

    ज़िंदाबाद दिनेश भाई

    आलोक

  3. Sach kahun aesi pukhta ghazal bahut arse baad nazron se guzri hai…zindabaad Dinesh kya kamaal kiya hai aapne…Aha ha…tareef ke liye alfaaz khojne nikla to khali hath lotunga…dili daad kabool karo bhai – Jiyo

  4. बेहद खूबसूरत ग़ज़ल……
    दिली दाद

  5. मेरे घर के दरीचे पे जलता हुआ एक तनहा अकेला दिया आस का
    उसके आने की उम्मीद करती हुईं मेरे कमरे की कुछ अधखुली खिड़कियाँ

    शहर भर की उदासी समेटे हुए पार्क के कोने में एक ही बेंच है
    जिसकी आग़ोश में मेरी सिगरट का कश रोज़ लेती है बेहाल तन्हाइयाँ

    मैं तो सहरा की उड़ती हुई गर्द को अपनी आँखों में भरने लगा हार कर
    अब मुझे राह कोई नहीं ढूंढ़नी अब नहीं जानना तेरा घर है कहाँ

    KYa hi gazal hai bhaia
    MAza aa gaya
    Dili daad kubul kijiye

    SAdar
    IMran

  6. दिनेश, ये ग़ज़ल ख़याल के ऐतबार से आपके बालिग़ होने, कुलांचें भरने से आगे सरपट दौड़ने यानी फ़ारिग़ुल-इस्लाह होने का ऐलान है। ज़िंदाबाद ज़िन्दाबाद। जियो मेरी जान

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