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T-23/37 कुछ दूर ख़ाक अपनी उड़ाई हुई तो है-मनोज मित्तल कैफ़

कुछ दूर ख़ाक अपनी उड़ाई हुई तो है
यूं आसमां प अपनी रसाई हुई तो है

रोती है हिज्रे-यार में मासूम सी ग़ज़ल
ये डोमनी ‘असद’ की सताई हुई तो है

आईना लाख सच की दुहाई दिया करे
अशराफ़ की नज़र में बुराई हुई तो है

उसकी हंसी गुलाब-सिफ़त दिन को कर गई
उसके बदन से रात हिनाई हुई तो है

वो आयेगा ज़रूर मुक़द्दर है आयेगा
ये भी उमीद हमने लगाई हुई तो है

क्‍या रंगे-शब हो देखिये सब मुंत‍ज़ि‍र हुए
महफ़िल में आज एक बुराई हुई तो है

ये क्‍या कि ख्‍़वाहिशों का शजर सूखता नहीं
दिल की ज़मीन ग़म की तपाई हुई तो है

ये बात और है कि हवा रूक नहीं रही
यूं शाह ने फ़सील उठाई हुई तो है

ज़ौक़े-नज़र हवस की हदों तक न जाइये
ख्‍़वाबों में उसकी जल्‍वानुमाई हुई तो है

बेसूद कब रही है ये आवारगी मिरी
हासिल इसी से आबलापाई हुई तो है

मनोज मित्तल कैफ़ 09887099295

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3 comments on “T-23/37 कुछ दूर ख़ाक अपनी उड़ाई हुई तो है-मनोज मित्तल कैफ़

  1. क्या कहने !!
    बहुत ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल…
    किसी एक शेर की तारीफ़ करना मुमकिन नहीं..पूरी ग़ज़ल ही कमाल की है.

  2. कुछ दूर ख़ाक अपनी उड़ाई हुई तो है
    यूं आसमां प अपनी रसाई हुई तो है

    रोती है हिज्रे-यार में मासूम सी ग़ज़ल
    ये डोमनी ‘असद’ की सताई हुई तो है

    Bahut dilchasp andaaz-e-bayan hai aapka…kamaal ki ghazal hui hai Manoj Bhai…daad kaboolen …

  3. Bahut achi gazal hui manoj sahab
    Dili daad kubul kijiye

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