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T-23/36 हमने सदा की आग लगाई हुई तो है-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

हमने सदा की आग लगाई हुई तो है
ख़ामोशियों ने चीख़ दबाई हुई तो है

साया हमारा टेक ले शायद, हमारी अब
हम ने फ़सीले-नूर गिराई हुई तो है

ये रुत के जिस के सुर हैं दुखों से भरे हुए
कोरस में ही सहीह प गाई हुई तो है

फुर्क़त की रात में भी चमक है कहीं कहीं
ये रात आंसुओं ने बचाई हुई तो है

देखो तो रतजगा ही प ओढ़े हुए तो हैं
कहने को एक याद बिछाई हुई तो है

ऐसा न था कभी वो के ख़ामोशियाँ सुने
आवाज़ का भी क्या है लगाई हुई तो है

वो फूल खिल चुका है न माने भले कोई
अफ़वाह तितलियों नें उड़ाई हुई तो है

शायद उतार ही दूं उदासी का क़र्ज़ मैं
फुरक़त में तेरी अब के कमाई हुई तो है

तेरा ख़याल दिल से अभी दूर ही सहीह
रफ़्तार दिल ने अपनी बढ़ाई हुई तो है

स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’ 08879464730

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5 comments on “T-23/36 हमने सदा की आग लगाई हुई तो है-स्वप्निल तिवारी ‘आतिश’

  1. फुर्क़त की रात में भी चमक है कहीं कहीं
    ये रात आंसुओं ने बचाई हुई तो है

    ऐसा न था कभी वो के ख़ामोशियाँ सुने
    आवाज़ का भी क्या है लगाई हुई तो है

    भाई वाह स्वप्निल जी
    शानदार ग़ज़ल

    सलाम है आपको

  2. साया हमारा टेक ले शायद,
    हमारी अब
    हम ने फ़सीले-नूर गिराई हुई तो
    है
    ये रुत के जिस के सुर हैं दुखों से भरे
    हुए
    कोरस में ही सहीह प गाई हुई
    तो है वाह
    वाह बहुत सुंदर स्वप्निल जी

  3. ऐसा न था कभी वो के ख़ामोशियाँ सुने
    आवाज़ का भी क्या है लगाई हुई तो है

    वो फूल खिल चुका है न माने भले कोई
    अफ़वाह तितलियों नें उड़ाई हुई तो है

    शायद उतार ही दूं उदासी का क़र्ज़ मैं
    फुरक़त में तेरी अब के कमाई हुई तो है

    तेरा ख़याल दिल से अभी दूर ही सहीह
    रफ़्तार दिल ने अपनी बढ़ाई हुई तो है
    waah kya umdaa ghazal hui hai dada..sadar pranam
    -Kanha

  4. ये रुत के जिस के सुर हैं दुखों से भरे हुए
    कोरस में ही सहीह प गाई हुई तो है

    देखो तो रतजगा ही प ओढ़े हुए तो हैं
    कहने को एक याद बिछाई हुई तो है

    तेरा ख़याल दिल से अभी दूर ही सहीह
    रफ़्तार दिल ने अपनी बढ़ाई हुई तो है

    कब से इंतज़ार था मियां आपकी ग़ज़ल का ,आँखें बेनूर सी हो रही थीं अब ” तुम आ गए हो नूर आ गया है —” भाई इंतज़ार का फल मीठा होता है ये तो पता था लेकिन इतना मीठा होता है इसका पता आज चला , इस मीठे से कहीं कमबख्त डायबिटीज़ की नौबत न आ जाय। कमाल ग़ज़ल कही है , हर शेर पर मुख्तलिफ अंदाज़ से स्वप्निल नाम गुदा है किस शेर की तारीफ करूँ किसे छोड़ूँ की उलझन से बचते हुए पूरी ग़ज़ल के लिए टोकरा भर कर दाद कबूलें। हम तुम्हें हमसे एक बेहतरीन पार्टी लेने का हक़ अता फरमाते हैं। जियो भाई जियो।

  5. ये रुत के जिस के सुर हैं दुखों से भरे हुए
    कोरस में ही सहीह प गाई हुई तो है

    फुर्क़त की रात में भी चमक है कहीं कहीं
    ये रात आंसुओं ने बचाई हुई तो है

    शायद उतार ही दूं उदासी का क़र्ज़ मैं
    फुरक़त में तेरी अब के कमाई हुई तो है

    WAhhh wahhh dada bahut achi gazal hui hai
    DIli daad kubul kijiye

    SAdar
    Imran

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