13 टिप्पणियाँ

T-23/31ये रात रफ़्ता-रफ़्ता हिनाई हुई तो है-बकुल देव

ये रात रफ़्ता-रफ़्ता हिनाई हुई तो है
यानी सहर की रस्म-अदाई हुई तो है

इक अक्स था यहीं जहां दिखता है आर-पार
यूं आइने में अपनी रसाई हुई तो है

मुमकिन है नाव ख़ुद ही किनारे से जा लगे
नद्दी अभी उफान पे आई हुई तो है

फिर इक नयी उमीद के झांसे में आ गए
यूं चोट हमने पहले भी खाई हुई तो है

अब देखिए हवाओं का किस सम्त हो सफ़र
हमने भी ख़ाक अपनी उड़ाई हुई तो है

पिछली सफ़ों के ज़ोर प है फ़त्ह मुनहसिर
गो अगली सफ़ महाज़ पे आई हुई तो है

दरपेश है सुरों का हमें इक नया निज़ाम
यूं ज़िन्दगी की भैरवी गाई हुई तो है

बैठेगा एक दिन ये गुबारे-हयात भी
बदली कोई निगाह में छाई हुई तो है

बकुल देव 09672992110

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13 comments on “T-23/31ये रात रफ़्ता-रफ़्ता हिनाई हुई तो है-बकुल देव

  1. मुमकिन है नाव ख़ुद ही किनारे से जा लगे
    नद्दी अभी उफान पे आई हुई तो है
    kya kehne..Bakul dev sahab..bahut umdaa ghazal hui hai..waah
    _kanha

  2. इक अक्स था यहीं जहां दिखता है आर-पार
    यूं आइने में अपनी रसाई हुई तो है

    क्या बात है साहब ! बहुत खूब
    कमाल की ग़ज़ल हुई है
    बेमिसाल शायरी!
    बधाई

  3. वाह वाह
    बकुल देव साहिब
    उम्दा ग़ज़ल,मतला भी ख़ूब है

  4. ये रात रफ़्ता-रफ़्ता हिनाई हुई तो है
    यानी सहर की रस्म-अदाई हुई तो है

    दरपेश है सुरों का हमें इक नया निज़ाम
    यूं ज़िन्दगी की भैरवी गाई हुई तो है

    बैठेगा एक दिन ये गुबारे-हयात भी
    बदली कोई निगाह में छाई हुई तो है

    Bakul Bhai behad kamaal ki ghazal hui hai …bahut khoobsurat sher kahen hain…dheron daad kaboolen

  5. वाह बकुल साहब
    खूब ग़ज़ल कही है आपने।
    दिली दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

  6. बकुल भाई बहुत खूब ग़ज़ल हुई।
    मुश्किल ज़मीन में अच्छा काम
    मुबारकबाद क़ुबूल कीजिये

  7. मुमकिन है नाव ख़ुद ही किनारे से जा लगे
    नद्दी अभी उफान पे आई हुई तो है

    WAhhh wahhhh
    BAhut khub
    DIli daad kubul kijiye

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