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T-23/30 माना ये रात उसने बनाई हुई तो है-नवनीत शर्मा

माना ये रात उसने बनाई हुई तो है
पर सुब्ह भी उसी की सजाई हुई तो है

सीवन उधड़ न जाए यही ख़ौफ़ है मुझे
कुछ ख़ाहिशों की ख़ूब सिलाई हुई तो है

जो मुझ में रह रहा है उसे उससे मांगना ?
गंगा उलट ये मैंने बहाई हुई तो है

कट-कट के आंसुओं में बहीं दिल की किरचियां
क़िस्‍तों में मेरी ख़ुद से रिहाई हुई तो है

सिक्‍के ग़मों के, दर्द के, आहों के हम से लो
टकसाल तजरुबों की चलाई हुई तो है

मेरे और उसके वस्‍ल में बस मैं हूं दरम्‍यां
हड्डी कबाब में यही आई हुई तो है

उठता है अब कहां से धुआंं क्‍या बताएं हम
सब आग-वाग दिल की दबाई हुई तो है

मुमकिन है सुब्ह आपको ज़िंदा न मिल सकूँ
अब सर पे शाम क़ह्र की आई हुई तो है

मैं हो सका तुम्‍हारा न तुम हो सके मिरे
अच्‍छा है साफ़ दिल से ये काई हुई तो है

देखें मुआवज़े में भी होता है क्‍या नसीब
रक्‍़बे की फिर से नाप-नपाई हुई तो है

नवनीत शर्मा 094418040160

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15 comments on “T-23/30 माना ये रात उसने बनाई हुई तो है-नवनीत शर्मा

  1. Reblogged this on कविता प्रदेश and commented:
    Thank you Lafz….

  2. सीवन उधड़ न जाए यही ख़ौफ़ है मुझे
    कुछ ख़ाहिशों की ख़ूब सिलाई हुई तो है

    जो मुझ में रह रहा है उसे उससे मांगना ?
    गंगा उलट ये मैंने बहाई हुई तो है

    कट-कट के आंसुओं में बहीं दिल की किरचियां
    क़िस्‍तों में मेरी ख़ुद से रिहाई हुई तो है

    सिक्‍के ग़मों के, दर्द के, आहों के हम से लो
    टकसाल तजरुबों की चलाई हुई तो है

    मेरे और उसके वस्‍ल में बस मैं हूं दरम्‍यां
    हड्डी कबाब में यही आई हुई तो है

    उठता है अब कहां से धुआंं क्‍या बताएं हम
    सब आग-वाग दिल की दबाई हुई तो है

    मुमकिन है सुब्ह आपको ज़िंदा न मिल सकूँ
    अब सर पे शाम क़ह्र की आई हुई तो है

    मैं हो सका तुम्‍हारा न तुम हो सके मिरे
    अच्‍छा है साफ़ दिल से ये काई हुई तो है

    waah …alag aur naye kafiyo’n ko kya behtreen nibhaya hai aapne..daad
    -Kanha

    • प्रिय कान्‍हा जी,
      आपकी महब्‍बत के लिए दिली शुक्रिया।
      आपसे चमक मिलती है प्‍यारे भाई।
      जीओ
      नवनीत

  3. क्या बात है Sir
    हर शे’र कमाल हुआ है

    माना ये रात उसने बनाई हुई तो है
    पर सुब्ह भी उसी की सजाई हुई तो है। . वाह !

    कल दफ्तर से लौटते हुए फ़ोन पर ग़ज़ल पढ़ी.
    घर पहुँच कर कंप्यूटर पर… और सुबह से २ ३ बार फिर से।
    आनंद आ गय|

    सीवन उधड़ न जाए यही ख़ौफ़ है मुझे
    कुछ ख़ाहिशों की ख़ूब सिलाई हुई तो है

    इस शेर में मुझे अपना बचपन और पिता जी नज़र आ रहे हैं. न जाने कितनी यादें इन दो पंक्तियों मे.
    बहुत खूब!

    सभी शेर बेमिसाल हैं Sir,
    आंसुओं के साथ रिहाई की बात हो, या तजरुबों की टकसाल, सब एक से बढ़ कर एक ख़याल हुए!

    मुमकिन है सुब्ह आपको ज़िंदा न मिल सकूँ
    अब सर पे शाम क़ह्र की आई हुई तो है

    देखें मुआवज़े में भी होता है क्‍या नसीब
    रक्‍़बे की फिर से नाप-नपाई हुई तो है

    क्या बात है
    बहुत बहुत बधाई

    • नकुल भाई,
      क्‍या बात…क्‍या बात….।
      आप के होने से माहौल और बेहतर हो जाता है।
      आपने जो कहा, उसे आपकी महब्‍बत मान कर सिरमाथे लगाता हूं।
      शुक्रिया
      नवनीत

  4. बहुत ख़ूब नवनीत भाई,

    कट-कट के आंसुओं में बहीं दिल की किरचियां
    क़िस्तोंे में मेरी ख़ुद से रिहाई हुई तो है
    शीशा ए दिल टूटने का बयान औरों ने भी किया है लेकिन ऐसे किसी ने नहीं. वाह.
    आलोक कुमार श्रीवास्तव ” शाज़” जहानी

    • शाज़ साहब।
      बड़ा करम।
      आपकी महब्‍बत के लिए शुक्रिया।
      आप जैसे उम्‍दा शायर और संवेदनशील पाठक के उद्गार मेरी पूंजी हैं।
      सादर
      नवनीत

  5. मेरे और उसके वस्‍ल में बस मैं हूं दरम्‍यां
    हड्डी कबाब में यही आई हुई तो है

    Kis sher ko chhodun Kis ki charcha karun ? Asmanjas men hoon…Navneet Bhai kya ghazab ki ghazal hui hai…baar baar padh kar bhi tasalli nahin ho rahi hai…waah waah waah …Jiyo…Dheron daad kaboolo…Aha ha…

    • आदरणीय नीरज भाई साहब,
      प्रणाम।
      शाबाशी पाकर नि‍हाल हो गया।
      सादर
      नवनीत

  6. नवनीत भाई
    बेहतरीन ग़ज़ल
    बहुत बहुत बधाई।जिस सलीक़े से आपने क़ाफ़ियों को
    निभाया उसके लिए विशेष बधाई।

    • इरशाद भाई,
      आपको ग़ज़ल पसंद आई तो मेरी मेहनत सफल हुई।
      शुक्रिया।
      नवनीत

  7. अच्छी ग़ज़ल हुई है नवनीत जी।
    मुबारकबाद
    सादर
    पूजा

  8. सिक्‍के ग़मों के, दर्द के, आहों के हम से लो
    टकसाल तजरुबों की चलाई हुई तो है

    कट-कट के आंसुओं में बहीं दिल की किरचियां
    क़िस्‍तों में मेरी ख़ुद से रिहाई हुई तो है

    Wahh wahhhh dada bahut khub
    Dili daad kubul kijiye

    Sadar
    Imran

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