7 टिप्पणियाँ

T-23/18 कुछ उन तलक हमारी रसाई हुई तो है-आलोक मिश्रा

कुछ उन तलक हमारी रसाई हुई तो है
खुशबू सी इक जवाब में आई हुई तो है

क्यों दिल डरा हुआ है यूँ इक शब के ख़ौफ़ से
पहले भी मैंने शब ये बिताई हुई तो है

आँखों में एक धुंध सी रहती है क्यों सदा
आँधी वो अब भी दिल में समाई हुई तो है

देखो हमारे ज़ख़्म ये अब फूल हों न हों
लेकिन बहार रंगों पे आई हुई तो है

तू काश देख पाये ख़यालों के दश्त को
तुझ बिन भी एक दुनिया बसाई हुई तो है

तो क्या हुआ जो लफ़्ज़ो-म’आनी से है परे
महफ़िल में उसने धाक ज़माई हुई तो है

अपने ख़ुदा को अब के तू ख़ुद में ही कर तलाश
सजदों में एक उम्र गंवाई हुई तो है

पहले से ख़ुश कहाँ रहे ग़ज़लों में अपने पर
जीने की एक वज्ह बचाई हुई तो है

इमकां ही कुछ नहीं है अब इसके इलाज का
“ये ज़ख़्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है

आलोक मिश्रा 09876789610

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7 comments on “T-23/18 कुछ उन तलक हमारी रसाई हुई तो है-आलोक मिश्रा

  1. आलोक ,
    कुछ उन तलक हमारी रसाई हुई तो है
    खुशबू सी इक जवाब में आई हुई तो है

    क्यों दिल डरा हुआ है यूँ इक शब के ख़ौफ़ से
    पहले भी मैंने शब ये बिताई हुई तो है

    देखो हमारे ज़ख़्म ये अब फूल हों न हों
    लेकिन बहार रंगों पे आई हुई तो है

    तू काश देख पाये ख़यालों के दश्त को
    तुझ बिन भी एक दुनिया बसाई हुई तो है

    तो क्या हुआ जो लफ़्ज़ो-म’आनी से है परे
    महफ़िल में उसने धाक ज़माई हुई तो है

    अपने ख़ुदा को अब के तू ख़ुद में ही कर तलाश
    सजदों में एक उम्र गंवाई हुई तो है

    पहले से ख़ुश कहाँ रहे ग़ज़लों में अपने पर
    जीने की एक वज्ह बचाई हुई तो है

    भाई, अशआर अच्‍छे लगे। दाद कुबूल करें।

  2. तू काश देख पाये ख़यालों के दश्त को
    तुझ बिन भी एक दुनिया बसाई हुई तो है

    Is Mukammal ghazal ke liye jitni tareef karun kam hogi…Jiyo

  3. Hamesha ki tarah behad umdaa ghazal Alok bhai..sare she’r bahut khubsoorat hain..dili daad
    -Kanha

  4. सच कहूं तो आपकी ग़ज़ल का इंतज़ार था आलोक भाई।

    कुछ उन तलक हमारी रसाई हुई तो है
    खुशबू सी इक जवाब में आई हुई तो है

    क्यों दिल डरा हुआ है यूँ इक शब के ख़ौफ़ से
    पहले भी मैंने शब ये बिताई हुई तो है

    आँखों में एक धुंध सी रहती है क्यों सदा
    आँधी वो अब भी दिल में समाई हुई तो है

    देखो हमारे ज़ख़्म ये अब फूल हों न हों
    लेकिन बहार रंगों पे आई हुई तो है

    तू काश देख पाये ख़यालों के दश्त को
    तुझ बिन भी एक दुनिया बसाई हुई तो है

    तो क्या हुआ जो लफ़्ज़ो-म’आनी से है परे
    महफ़िल में उसने धाक ज़माई हुई तो है

    अपने ख़ुदा को अब के तू ख़ुद में ही कर तलाश
    सजदों में एक उम्र गंवाई हुई तो है

    पहले से ख़ुश कहाँ रहे ग़ज़लों में अपने पर
    जीने की एक वज्ह बचाई हुई तो है

    इमकां ही कुछ नहीं है अब इसके इलाज का
    “ये ज़ख़्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है

    दर्द, ग़म, आह, वाह और तंज़…. सभ्‍ाी रंग खूब जमे।
    खुश रहिए भाई।
    सादर
    नवनीत

  5. ख़ूबसूरत अश’आर हुए हैं आलोक साहब। दाद कुबूल कीजिए

  6. Dil kyon dara hua hae…
    Apne khuda ko…waah…..kya hi achhe sher hue hein Alok ji. Girah bhi khoob aapne lagayi hui to hae.
    Umda ghazal… dheron daad qubool farmayein
    Sadar
    Pooja

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