20 टिप्पणियाँ

T-23/15 बदली ग़मों की ज़ेह्न पे छाई हुई तो है-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

बदली ग़मों की ज़ेह्न पे छाई हुई तो है
फिर भी ये बात हमने छुपाई हुई तो है

सच के लिए लड़े थे हमीं, क्या मिला हमें
चुप रह के उसने जान बचाई हुई तो है

क्यों चुभ रही है जिस्म को तन्हाइयों की रात
बिस्तर पे तेरी याद बिछाई हुई तो है

मुमकिन है मेरे पाँव भी ज़िद छोड़ देंगे अब
आवाज़ उसकी ओर से आई हुई तो है

क्यूँ नातवाँ समझते हैं हमको जहाँ के लोग
कांधों पे हमने ज़ीस्त उठाई हुई तो है

अब देखते हैं कौन दिखाता है पहले पीठ
नाकामियों से मेरी लड़ाई हुई तो है

जब दर्द जूं का तूं है तो फिर कैसे बोलूं मैं
‘ये ज़ख्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है’

‘आज़ाद’ ख़ामख़ाह सभी हो गये उदास
पहले भी दास्ताँ ये सुनाई हुई तो है

इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ 09536816624

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20 comments on “T-23/15 बदली ग़मों की ज़ेह्न पे छाई हुई तो है-इमरान हुसैन ‘आज़ाद’

  1. वाह वाह वाह
    उम्दा ग़ज़ल आपकी जानिब से इमरान हुसैन आज़ाद साहिब
    गिरह भीख़ूब है
    जूँ का तूँ का इस्तिमाल अच्छा लगा

  2. क्यों चुभ रही है जिस्म को तन्हाइयों की रात
    बिस्तर पे तेरी याद बिछाई हुई तो है

    Waah.kya kahne.
    Bahut achchi ghazal azaad bhai.
    Mubaarak.

  3. क्यों चुभ रही है जिस्म को तन्हाइयों की रात
    बिस्तर पे तेरी याद बिछाई हुई तो है

    मुमकिन है मेरे पाँव भी ज़िद छोड़ देंगे अब
    आवाज़ उसकी ओर से आई हुई तो है

    जब दर्द जूं का तूं है तो फिर कैसे बोलूं मैं
    ‘ये ज़ख्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है’

    Khoobsurat Ghazal aur Lajawab Girah ke liye dheron daad kaboolen.

  4. आज़ाद साहब,

    सच के लिए लड़े थे हमीं, क्या मिला हमें
    चुप रह के उसने जान बचाई हुई तो है

    क्यों चुभ रही है जिस्म को तन्हाइयों की रात
    बिस्तर पे तेरी याद बिछाई हुई तो है
    वाह वाह।

  5. मुमकिन है मेरे पाँव भी ज़िद छोड़ देंगे अब
    आवाज़ उसकी ओर से आई हुई तो है
    kya kehne..waahh
    -Kanha

  6. इमरान भाई साहब।
    ग़ज़ल बहुत खूबसूरत है लेकिन ये अश्‍आर मुझे बतौरे-खा़स पसंद आए…

    सच के लिए लड़े थे हमीं, क्या मिला हमें
    चुप रह के उसने जान बचाई हुई तो है

    वाह…वाह..।

    मुमकिन है मेरे पाँव भी ज़िद छोड़ देंगे अब
    आवाज़ उसकी ओर से आई हुई तो है
    आह…आह….

    क्यूँ नातवाँ समझते हैं हमको जहाँ के लोग
    कांधों पे हमने ज़ीस्त उठाई हुई तो है
    बहुत बढि़या।

    अब देखते हैं कौन दिखाता है पहले पीठ
    नाकामियों से मेरी लड़ाई हुई तो है
    वाह…वाह…।

  7. जब दर्द जूं का तूं है तो फिर कैसे बोलूं मैं
    ‘ये ज़ख्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है’

    BEHTAREEN GIRAH KE LIYE MUBAARAKBAAD

  8. क्या बात है साहब
    बेहतरीन ग़ज़ल हुई है.

    सच के लिए लड़े थे हमीं, क्या मिला हमें
    चुप रह के उसने जान बचाई हुई तो है

    भई वाह
    और गिरह भी बेहतरीन अंदाज़ के साथ है

    जब दर्द जूं का तूं है तो फिर कैसे बोलूं मैं
    ‘ये ज़ख्मे-दिल है इसकी दवाई हुई तो है’

    बधाई

  9. अच्छी गिरह लगाई है इमरान साहब। दाद कुबूल करें।

  10. क्या ही ख़ूब गिरह लगायी है इमरान साहब….वाह
    एक भरपूर ग़ज़ल कहने के लिए ढेरों बधाइयाँ क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

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