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ख़ला की मांग सितारों से, शब को भरते हुए-पूजा भाटिया

ख़ला की मांग सितारों से, शब को भरते हुए
मैं दिन को देखती हूँ रोज़ यूं ही ढ़लते हुए

बड़ी ख़राब है आदत तुम्हारे अब्रों की
ये बात बात पे रोते हैं क्यूँ गरजते हुए

सुना जो सच तो किसी को यक़ीं नहीं आया
बदल गया वो ज़माने को, ख़ुद बदलते हुए

ये टहनियाँ जो मुड़ी हैं बता रही हैं हमें
हरेक मोड़ पे झुकना पड़ेगा बढ़ते हुए

ख़ला मिला भी तो बस हाथ भर के जीने को
सफ़र तमाम हुआ यूं ही जीते मरते हुए

किये थे हमने कभी याद के ख़ज़ाने जो जम्म
किसी भी काम न आये वो ख़र्च करते हुए

तमाम बातें वो जो ज़ह्न मानता ही नहीं
उन्हीं पे देखा है इस दिल को हामी भरते हुए

ख़ुदा करे मिले तुझको भी कोई तुझ जैसा
मैं देखूं तुझको भी फिर टूट कर बिख़रते हुए

जो सलवटें थी पड़ीं करवटें बदलने में
उन्हीं को गिनते रहे नींद से झगड़ते हुए

पूजा भाटिया

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9 comments on “ख़ला की मांग सितारों से, शब को भरते हुए-पूजा भाटिया

  1. बड़ी ख़राब है आदत तुम्हारे अब्रों की
    ये बात बात पे रोते हैं क्यूँ गरजते हुए
    kya kehne
    -Kanha

  2. ghazal padh kar waqaii maza aa gaya . Pooja ji, dheron mubarakbaad.

  3. Bahut achi gazal hui pooja ji
    Dili daad kubul kijiye

  4. बड़ी ख़राब है आदत तुम्हारे अब्रों की
    ये बात बात पे रोते हैं क्यूँ गरजते हुए

    Kya baat hai…waah…lajawab ghazal…daad kaboolen

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