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बलवान सिंह आज़र की बारह ग़ज़लें…

1

मेरे सफ़र में ही क्यों ये अज़ाब आते हैं
जिधर भी जाऊं उधर ही सराब आते हैं

तलाश है मुझे अब तो उन्हीं फ़ज़ाओं की
जहां खिज़ां में भी अक्सर गुलाब आते हैं

किसी को मिलता नहीं इक चराग़ मीलों तक
किसी की बस्ती में सौ आफ़ताब आते हैं

न निकला कीजिए रातों को घर से आप कभी
सङक पे रात में ख़ानाख़राब आते हैं

खुला मकान है हर एक ज़िन्दगी आज़र
हवा के साथ दरीचों से ख़्वाब आते हैं

2

गर मुझे मेरी ज़ात मिल जाए
इक नई कायनात मिल जाए

ख़्वाब है उससे बात करने का
कोई ख़्वाबों की रात मिल जाए

ग़मज़दा लोग सोचते हैं यही
ज़िन्दगी से निजात मिल जाए

कोई उसको बदल नहीं सकता
जिसको जैसी हयात मिल जाए

पूछना चांद का पता आज़र
जब अकेले में रात मिल जाए

बलवान सिंह “आज़र”

3

वक़्त जब हाथ से निकलता है
हर कोई अपने हाथ मलता है

शाम को बाम पर वो आए तो
जैसे कोई चराग़ जलता है

शह पे तूफ़ान के हमेशा ही
इक समंदर बहुत उछलता है

मार देती है ज़िन्दगी ठोकर
ज़हन जब उल्टे पांव चलता है

है तमाशे की मुंतज़िर आज़र
भीङ का शौक़ कब बदलता है

बलवान सिंह “आज़र”

4
रात दिन इक बेबसी ज़िंदा रही
मेरी आंखों में नमी ज़िंदा रही

हार जाएगी यक़ीनन तीरगी
गर मुसलसल रौशनी ज़िंदा रही

पहले सन्नाटों में वो मौजूद थी
शोर में भी ख़ामुशी ज़िंदा रही

ज़िक्र होगा इसका भी सदियों तलक
कैसे कैसे ये सदी ज़िंदा रही

दर्द को आज़र दुआ मैं क्यों न दूं
दर्द ही से शायरी ज़िंदा रही

बलवान सिंह “आज़र”

5
बेखुदी साथ है,मज़े में हूं
अपनी ही ज़ात के नशे में हूं

अक्स जैसे हो कोई दरिया में
ऐसे पानी के बुलबुले में हूं

तू भले मेरा एतबार न कर
ज़िन्दगी मैं तेरे कहे में हूं

कोई मंज़िल कभी नहीं आई
रास्ते में था,रास्ते में हूं

मेरी वुसअत अजीब है आज़र
फैलकर भी मैं दायरे में हूं

बलवान सिंह “आज़र”

6

हवा के सामने झुकता नहीं है
के अब तक वो शजर टूटा नहीं है

वफ़ा वाले कहां गोते लगाएं
तअल्लुक़ कोई भी गहरा नहीं है

मैं फिर क्यों देखता हूं आइने को
मेरा चेहरा अगर अपना नहीं है

कभी फ़ुरसत नहीं थी एक पल की
मगर अब वक़्त ये कटता नहीं है

करेगा और भी साज़िश वो आज़र
मेरा दिल ठीक से उजड़ा नहीं है

बलवान सिंह “आज़र”

7

भले ही ज़िन्दगी तीखी नहीं है
मगर गुड़ की तरह मीठी नहीं है

फ़क़त आगाज़ ही होता है अपना
सफ़र की इन्तिहा होती नहीं है

मुकम्मल कुछ नहीं दुनिया में यारो
कहीं दरिया कहीं कश्ती नहीं है

कभी दिल के सिवा भी मांग लो तुम
हमेशा एक ज़िद अच्छी नहीं है

हवा आए तो कैसे आए आज़र
मेरे अंदर कोई खिड़की नहीं है

बलवान सिंह “आज़र”

8

खुद को किस सांचे में ढालूं मैं भी
इक नई शक्ल बना लूं मैं भी
मेरी बस्ती में पङा है सूखा
अब्र बरसे तो नहा लूं मैं भी
गर परिन्दों को पसंद आए तो
इक शजर खुद में उगा लूं मैं भी
मुझको तो होश नहीं है वरना
बाल की खाल निकालूं मैं भी
पांव से कांटा निकल जाए अगर
अपनी रफ़्तार बढा लूं मैं भी

बलवान सिंह “आज़र”

9

हादसा होता रहा है मुझमें
बारहा कोई मरा है मुझमें

मेरी मिट्टी को पता है सबकुछ
कौन,कब,कितना चला है मुझमें

ख़त्म होता ही नहीं मेरा सफ़र
कोई थक हार गया है मुझमें

अपने अंदर मैं समेटूं क्या क्या
सारा घर बिखरा पङा है मुझमें

कश्तियां डूब रही हैं आज़र
एक तूफ़ान उठा है मुझमें

बलवान सिंह “आज़र”

10

दो क़दम साथ क्या चला रस्ता
बन गया मेरा हमनवा रस्ता

बिछड़ा अपने मुसाफ़िरों से जब
कितना मायूस हो गया रस्ता

सब हैं मंज़िल की जुस्तजू में यहां
कौन देखे बुरा भला रस्ता

ऐसी होने लगी थकन उसको
दिन के ढलते ही सो गया रस्ता

फिर नई कायनात देखूंगा
मेरे अंदर अगर मिला रस्ता

तू बड़ा खुशनसीब है आज़र
तुझपे आसान हो गया रस्ता

बलवान सिंह “आज़र”

11

ज़िन्दगी कुछ थका थका हूँ मैं
देख ले लड़खड़ा रहा हूँ मैं
रेत में ढूँढता रहा मोती
क्या कहूं कितना बावला हूँ मैं
जा चुका मेरा क़ाफ़िला आगे
था जहां पर वहीं खड़ा हूँ मैं
खूबियां पूछता है क्यों मेरी
कुछ बुरा और कुछ भला हूँ मैं
अपनी सूरतकभी नहीं देखी
लोग कहते हैं आइना हूँ मैं

बलवान सिंह “आज़र”

12

कुछ तुमको नहीं होश के क्या ढूंढ रहे हो
जो साथ है उसका ही पता ढूंढ रहे हो

जिस दश्त की ज़ानिब कभी कोई नहीं आया
उस दश्त में तुम किसकी सदा ढूंढ रहे हो

मालूम नहीं जिनको अना लफ़्ज़ का मतलब
उस शहर के लोगों में अना ढूंढ रहे हो

औरों के लिए रोज़ दुआ करते हो आज़र
अपने लिए तुम रोज़ क़ज़ा ढूंढ रहे हो

बलवान सिंह “आज़र”

8059814123

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8 comments on “बलवान सिंह आज़र की बारह ग़ज़लें…

  1. शुक्रिया कान्हा भाई

  2. वाह ..बधाई हो भाई ..बहुत अच्छी ग़ज़लें हैं
    -कान्हा

  3. बहुत बहुत शुक्रिया इमरान हुसैन ‘आज़ाद’ साहब

  4. Bahut achi gazlen aazar sahab
    DIli daad kubul kijiye

  5. शुक्रिया सीमा शर्मा जी

  6. lazwaab ghazals hein aazar saheb god bless u

  7. स्वप्निल भाई आपका दिल से शुक्रिया

  8. aazar sahab…acchi ghazalen hain…kai she’r yaaad rah jaane waale hain… bahut bahut mubarak aapko

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