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खाक़ होकर भी कब मिटूँगा मैं-आलोक मिश्रा

खाक़ होकर भी कब मिटूँगा मैं
फूल बनकर यहीं खिलूँगा मैं

तुझको आवाज़ भी मैं क्यों दूंगा
तेरा रस्ता भी क्यों तकूँगा मैं

इक पुराने से ज़ख़्म पर अबके
कोई मरहम नया रखूँगा मैं

घेर लेंगी ये तितलियाँ मुझको
खुशबुएँ ज्यों रिहा करूँगा मैं

ख़ुद से बाहर तो कम निकलता हूँ
जी में आया तो फिर मिलूँगा मैं

वरना जीना मुहाल कर देगा
दर्द को अब ग़ज़ल करूँगा मैं

धुकधुकी सी लगी है क्यों जी को
इतनी जल्दी कहाँ मरूँगा मैं

साँसें देती रहीं जो चिंगारी
एक जंगल सा जल उठूँगा मैं

थक गया हूँ मैं इस जज़ीरे पर
फिर समुन्दर का रूख़ करूँगा मैं

रूह का ये लिबास बदलूँगा
भेष दूजा कोई धरूँगा मैं

आलोक मिश्रा 07042486192

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3 comments on “खाक़ होकर भी कब मिटूँगा मैं-आलोक मिश्रा

  1. Kya hi umda ash’aar nikale haiN bhai.. waaaah!! mubarakbaad!!

  2. घेर लेंगी ये तितलियाँ मुझको
    खुशबुएँ ज्यों रिहा करूँगा मैं

    ख़ुद से बाहर तो कम निकलता हूँ
    जी में आया तो फिर मिलूँगा मैं

    zindabaad aalok kya hi acche sher hue hain…. waah waah

  3. साँसें देती रहीं जो चिंगारी
    एक जंगल सा जल उठूँगा मैं
    थक गया हूँ मैं इस जज़ीरे पर
    फिर समुन्दर का रूख़ करूँगा मैं__

    वाह आलोक भाई क्या ख़ूब ग़ज़ल कही है दाद ही दाद

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