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काम का काम कुछ करोगे क्या -तुफ़ैल चतुर्वेदी

काम का काम कुछ करोगे क्या
आंसुओ ! उस पे भी खुलोगे क्या

मानता हूँ फ़िज़ूल की शय है
पर धड़कता है दिल रखोगे क्या

साथ चलने का एक मौक़ा दो
आ रहा हूँ ज़रा रुकोगे क्या

इक सहारा बहुत ज़रूरी है
ढह चुका हूँ कहो उठोगे क्या

मैं ख़ज़ां हो गया तुम्हारे लिये
मुझमें कुछ रंग भी भरोगे क्या

आंसुओं का ये राग मीठा है
मेरी आवाज़ में सुनोगे क्या

सिर्फ सैलाब है नमक वाला
मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या

तुम बहुत चुप थे जब हुए थे विदाअ
अब मिलोगे तो कुछ कहोगे क्या

तुफ़ैल चतुर्वेदी 09711296239

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11 comments on “काम का काम कुछ करोगे क्या -तुफ़ैल चतुर्वेदी

  1. क्या कहूं और क्या न कहूं ? ख़ाकसार की मामूली काविश को आप सबने हद से ज़ियादा नवाज़ा। इस करम के लिए शुक्रिया बहुत छोटा लफ्ज़ है। हदिया-ए-ख़ुलूस क़ुबूल फ़रमाइये

  2. waah kmaal ke ashaar lazwaab sir

  3. सिर्फ सैलाब है नमक वाला
    मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या

    तुम बहुत चुप थे जब हुए थे विदाअ
    अब मिलोगे तो कुछ कहोगे क्या

    bahut umdaa…. chhu gyaa man ko

  4. अहा क्या ग़ज़ल है बड़े दादा..एक एक शेर नायाब और मोती सा है ..वाह वाह..सादर प्रणाम
    -कान्हा

  5. काम का काम कुछ करोगे क्या
    आंसुओ ! उस पे भी खुलोगे क्या
    तनहाई मे मोती रायगाँ लुट जायेंगें इसलिये आँसुओं पर फर्ज़ बनता है कि उसके सामने अपनी रवानी का ठहराव का इज़हार करें –खुलें !!! मतला वाह !!!
    मानता हूँ फ़िज़ूल की शय है
    पर धड़कता है दिल रखोगे क्या
    तडप भी खूब हुई दिल के टूटने से मगर
    सुकून ये है चलो शोर से नजात मिली –मयंक
    साथ चलने का एक मौक़ा दो
    आ रहा हूँ ज़रा रुकोगे क्या
    मुहब्बत मे जो इसरार का रंग है वो शेर मे बहुत खूब नुमाया है !!!
    इक सहारा बहुत ज़रूरी है
    ढह चुका हूँ कहो उठोगे क्या
    ज़िन्दगी किसी भावनात्मक सम्बल की हमेशा ही मुंतज़िर रहती है !!!!
    मैं ख़ज़ां हो गया तुम्हारे लिये
    मुझमें कुछ रंग भी भरोगे क्या
    आंसुओं का ये राग मीठा है
    मेरी आवाज़ में सुनोगे क्या
    दोनो शेर तहदार हैं और फिक्रो –फन का अरूज़ स्पष्ट है !!
    सिर्फ सैलाब है नमक वाला
    मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या
    हासिले गज़ल शेर है !!! वाह वाह वाह वाह !!! इस शेर के असर को अल्फाज़ मे नहीं बाँधा जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है !!!
    तुम बहुत चुप थे जब हुए थे विदाअ
    अब मिलोगे तो कुछ कहोगे क्या
    वो अलविदाह क मंज़र वो भीगती पलकें
    पसे ग़ुबार भी क्या क्या दिखाई देता है –शिकेब
    दादा !! आपकी ये ग़ज़ल पहले नहीं पढी !! कुछ अंतराल के साथ आपकी ग़ज़ल की पोस्ट भी पोर्टल की ज़रूरत है –सादर –मयंक

  6. बहुत खूब ग़ज़ल कही तुफैल साहब हर इक शेर अनूठा है
    ढेरों बधाई । प्रेम प्रणाम ।

  7. वाहहहहहहह तुफ़ेल भाई
    सिर्फ सैलाब है नमक वाला
    मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या

    तुम बहुत चुप थे जब हुए थे विदाअ
    अब मिलोगे तो कुछ कहोगे क्या

    बहुत उम्दा है

  8. la jawaab ghazal k liye dhero’n badhaii

  9. मैं ख़ज़ां हो गया तुम्हारे लिये
    मुझमें कुछ रंग भी भरोगे क्या
    आंसुओं का ये राग मीठा है
    मेरी आवाज़ में सुनोगे क्या
    सिर्फ सैलाब है नमक वाला
    मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या___

    वाह दादा क्या कहने हैं बहुत अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आपने दाद ही दाद

  10. प्रणाम दादा
    क्या ही खूब ग़ज़ल हुई है। एक एक शेर मानो नए नए मंज़र उकेर रहा है। ढेर सारी दाद के साथ शुक्रिया इस खूबसूरत ग़ज़ल के लिए।
    सादर
    पूजा

  11. Dada pranam ..
    kaise hain?
    dada kya hi khoobsoorat gazal huii hai …arse baad itni khoobsoorat gazal padhne ko mili….
    tamaam gazal hi umda hai dada
    aur ye sher to khoob pasand aaye ..

    मैं ख़ज़ां हो गया तुम्हारे लिये
    मुझमें कुछ रंग भी भरोगे क्या

    आंसुओं का ये राग मीठा है
    मेरी आवाज़ में सुनोगे क्या

    सिर्फ सैलाब है नमक वाला
    मेरी आँखों में तुम बचोगे क्या

    Ahaa….ahaa

    dili daad qubul keejiye

    regards

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