6 Comments

T-22/49 जाय ये सर भी अगर जाना है-दीपक रूहानी

जाय ये सर भी अगर जाना है
‘आज हर हद से गुज़र जाना है’

आज भी शाम तवाज़ुन में गयी
उठ के मैख़ाने से घर जाना है

वो जो सोया रहा दिन भर उसने
शाम होने को सहर जाना है

तुमको पाना भी है एक ख़ाबे-हसीं
देखते-देखते मर जाना है

सब के सब मेरे मुख़ालिफ़ हैं जहाँ
कुछ भी हो जाये मगर जाना है

आपसे बात मुसलसल करके
बात करने का हुनर जाना है

दीपक रूहानी 09415142314

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

6 comments on “T-22/49 जाय ये सर भी अगर जाना है-दीपक रूहानी

  1. आपसे बात मुसलसल करके
    बात करने का हुनर जाना है

    वाह खूबसूरत ग़ज़ल दीपक जी !

  2. ग़ज़ल को तम्हीद की दरकार नहीं !! लेकिन दीपक रूहानी जी की ग़ज़ल से पेशतर ये बताना ज़रूरी है कि शाइर गज़ल के लिये एक बडा काम कर रहे हैं और एक बेहद खूबसूरत ,छमाही मोज़िज़े “गज़लकार” के एडिटर हैं – अपने आग़ाज़ के साथ ही इस पुस्तक ने इतनी उमीद और इतना ऐतबार काइम कर लिया है कि ये पुस्तक गज़ल के क्षेत्र में कोई आहट नहीं करवट नहीं बदल नहीं इंकलाब लाने के इम्कान भी रखती है ऐसा इस पुस्तक से पहली बार सरसरी तौर पर गुज़र कर लगा !! लफ़्ज़ ग्रुप के सभी मेम्बर्स और अज़ीम ताबिन्दा सितारों से मेरी गुज़ारिश है कि दीपक रूहानी साहब की इस मुहिम में उनका भरपूर साथ दें और अपने कबीले का सरमाया बढाने की दिशा में शिरकत करें !! इनकी गज़ल भी पूरी तस्दीक़ कर रही है कि गज़ल को निश्चित तौर पर एक नगीना और हासिल हुआ है !!
    जाय ये सर भी अगर जाना है
    ‘आज हर हद से गुज़र जाना है’
    सानी मिसरे के लहजे ने दिल जीत लिया है –गिरह ने एक मुकम्मल शेर दिया है !!!
    आज भी शाम तवाज़ुन में गयी
    उठ के मैख़ाने से घर जाना है
    अच्छा शेर है !!! क्योंकि – क्योंकर वो किसी मील के पत्थर पे ठहर जाय
    क्यों रिन्द की निस्बत हो किसी दैरो हरम से –
    मैखाना शाइरी में transit camp to attain ultimate spiritual height का मर्तबा रखता है इसलिये वापस आने वाला तवाज़ुन का शिकार है !!
    वो जो सोया रहा दिन भर उसने
    शाम होने को सहर जाना है
    वसवसे की ज़द में यकेन रहता है अगर आप देर कर दें तो — ये धुन्धलका खुल के बतलाता नहीं
    सुबह है या शाम का आगाज़ है
    तुमको पाना भी है एक ख़ाबे-हसीं
    देखते-देखते मर जाना है
    हमने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन
    ख़ाक हो जाऊंगा मैं तुमको ख़बर होने तक
    परतबे ख़ुर से है शबनम को फना की तालीम
    मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक –ग़ालिब
    सब के सब मेरे मुख़ालिफ़ हैं जहाँ
    कुछ भी हो जाये मगर जाना है
    तरही मिसरे की जो सिरिश्त है उसे इस शेर में भी जिया गया है !!!
    आपसे बात मुसलसल करके
    बात करने का हुनर जाना है
    अच्छा है और इसको बेहद नर्म और submission के लहजे में मुनव्वर भी कहते हैं – खुद से चल कर नही ये तर्ज़े सुखन आया है // पाँव दाबे हैं बुज़ुर्गों के तो फन आया है –वैसे ग़ज़ल के एक निहितार्थ में इसका अर्थ स्त्रियों से बात चीत करना भी है और इसलिये ये शेर बडा प्रास्ंगिक है कि आपसे बात मुसल्ल्सल करके …
    दीपक रूहानी साहब !! इस पोर्टल पर आपका स्वागत है आपको “गज़लकार” के लिये बहुत बहुत शुभकामनायें –मयंक

  3. खूब अशआर पिरोये हैं दीपक जी आपने ग़ज़ल में।
    अच्छी ग़ज़ल के लिए बधाई स्वीकार करें।
    सादर
    पूजा

  4. बहुत खूब सर।
    चमक रही है ग़ज़ल।
    दाद।
    नवनीत

  5. बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई दीपक साहब
    दिली दाद कुबूल कीजिये

  6. बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है दीपक जी
    हर शे’र कमाल का है

    मतला बहुत धारदार है.
    क्या बात है! बहुत बहुत बधाई

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: