14 Comments

T-22/45 आज का जितना भी हर्जाना है-नवीन सी. चतुर्वेदी

आज का जितना भी हर्जाना है
कल के कल सारा ही भर जाना है

ये जो कलियाँ हैं न! बस खिल जाएँ
फिर तो ख़ुशबूएँ बिखर जाना है

और क्या आब-जनों का मामूल
डूब जाना कि उबर जाना है

ये उदासी तो नहीं हो सकती
ये तो सरसर का ठहर जाना है

हम को गहराई मयस्सर न हुई
हम ने साहिल पे बिखर जाना है

अव्वल-अव्वल हैं उसी के चरचे
आख़िर-आख़िर जो अखर जाना है

क्यों न पहिचानेगी दुनिया हम को
सब ने थोड़े ही मुकर जाना है

नैन लड़ते ही ये तय था एक रोज़
दर्द पलकों पे पसर जाना है

ढल गयी रात वो आये ही नहीं
अब तो नश्शा भी उतर जाना है

जिस पे जो गुजरे मुक़द्दर उस का
मरने वालों ने तो मर जाना है

परसूँ गिद्धेश+ ने भी सोचा था
“आज हर हद से गुजर जाना है”

ब्रज-गजल ऐसे न बिदराओ ‘नवीन’
कल को अज़दाद के घर जाना है

नवीन सी. चतुर्वेदी 09967024593

+ गीधराज सम्पाती जिसने उड़ कर सूर्य तक पहुँचना चाहा था

Advertisements

About Lafz Admin

Lafzgroup.com

14 comments on “T-22/45 आज का जितना भी हर्जाना है-नवीन सी. चतुर्वेदी

  1. हम को गहराई मयस्सर न हुई
    हम ने साहिल पे बिखर जाना है

    Maan Gaye Naveen Bhai – Jiyo

  2. ये जो कलियाँ हैं न! बस खिल जाएँ
    फिर तो ख़ुशबूएँ बिखर जाना है

    और क्या आब-जनों का मामूल
    डूब जाना कि उबर जाना है

    ये उदासी तो नहीं हो सकती
    ये तो सरसर का ठहर जाना है
    आदरणीय नवीन भाईसाहब ,बहुत खुबसूरत ग़ज़ल हुई है ,,इनअशआर पर विशेष दाद कबूल फरमावें …
    नैन लड़ते ही ये तय था एक रोज़
    दर्द पलकों पे पसर जाना है

    ढल गयी रात वो आये ही नहीं
    अब तो नश्शा भी उतर जाना है
    सादर

  3. kya khoob gazal huii hai dada

    dili mubarqbad

    regards
    Alok

  4. नैन लड़ते ही ये तय था एक रोज़
    दर्द पलकों पे पसर जाना है
    kya baat h dada
    puri gazal hi achhiii huii hai

    regards
    Alok

  5. achhi ghazal hui hai Dada..daad
    Sadar
    -Kanha

  6. Kamaal ki gazal hui hai dada…as fresh as morning sun….

    ये उदासी तो नहीं हो सकती
    ये तो सरसर का ठहर जाना है
    Waah…kya baat hai…umda..

  7. वाह नवीन भाई क्या कहने हैं उम्दा ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद

  8. waah Naveen Bhai Sahab…

    Aapke andaaz ki purasar ghazal.

    badhayee sweekar karen…
    sadar
    Navneet

  9. आदरणीय नवनीत जी

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है
    क्या बात है

  10. बहुत ही शानदार ………..कमाल के शेर हुए हैं नवीन भाई …..

  11. Dear Navee ji khoob ghazal hui hai.. waaah!!

    in ash’aar par alag se daad..

    ये जो कलियाँ हैं न! बस खिल जाएँ
    फिर तो ख़ुशबूएँ बिखर जाना है

    अव्वल-अव्वल हैं उसी के चरचे
    आख़िर-आख़िर जो अखर जाना है

    क्यों न पहिचानेगी दुनिया हम को
    सब ने थोड़े ही मुकर जाना है

    नैन लड़ते ही ये तय था एक रोज़
    दर्द पलकों पे पसर जाना है

    जिस पे जो गुजरे मुक़द्दर उस का
    मरने वालों ने तो मर जाना है

    daad kuboolei’n!!

  12. आज का जितना भी हर्जाना है
    कल के कल सारा ही भर जाना है
    वक़्त सौ मुंसिफों का मुंसिफ है !! और तारीख़ गवाह भी है इसकी !! इसलिये कि ये संसार खुद मे मुकम्मल क्रियाविधियों , दैवीय अनुशासन के इख्तियार में चलता है –लिहाजा इस सच से कतई इंकार नहीं !!
    कभी साया है कभी धूप मुकद्दर मेरा
    होता रहता है यूँ ही कर्ज़ बराबर मेरा

    ये जो कलियाँ हैं न! बस खिल जाएँ
    फिर तो ख़ुशबूएँ बिखर जाना है
    मत कहो कि यही सफलता कलियों के लघु जीवन की
    मकरन्द भरी खिल जायें तोडी जायें बेमन की –जयशंकर प्रसाद
    कलियों की सफलता खुश्बू के बिखरने मे ही है सच है –चाहे दिल की कली हो चाहे साहित्य संगीत कला की चाहे बाग़े उल्फत की चाहे अहसास की !!!
    ये उदासी तो नहीं हो सकती
    ये तो सरसर का ठहर जाना है
    मैं चुप था तो बहती नदी रुक हई
    ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़बात की

    जब भी सुकेते शाम मे आया तेरा ख्याल
    पल भारत के लिये ठहर गया अबशार भी –शिकेब
    हम को गहराई मयस्सर न हुई
    हम ने साहिल पे बिखर जाना है
    अरे वाह वाह वाह !! क्या शेर कहा है इस ज़मीन पर !!!
    और इस शेर की गहराई मीलों तक डूबने लायक है
    अव्वल-अव्वल हैं उसी के चरचे
    आख़िर-आख़िर जो अखर जाना है
    चढते सूरज को दोपहर में झेलना बडा क़र्ब है !! उस वक़्त तो साया भी अपकी आड तलाशेगा !!!
    क्यों न पहिचानेगी दुनिया हम को
    सब ने थोड़े ही मुकर जाना है
    सब कैसे नहीं पहचानेगे ??!! कम से कम मैं तो पहचानता ही हूँ नवीन भाई !! मुझे कुछ पैसा उधार चाहिये !!!!
    नैन लड़ते ही ये तय था एक रोज़
    दर्द पलकों पे पसर जाना है
    अय हय हय हय हय !! नैना फाइटिंग पलको पे दर्द लायेगी ये सोचा भी नहीं था !!! क्या बात है !! क्या बात है क्या बात है !!! इस मंज़र से ये बात निकाली !!! इस शेर पर मुस्ल्सल दाद दाद दाद !!!!
    ढल गयी रात वो आये ही नहीं
    अब तो नश्शा भी उतर जाना है
    आधी से ज़ियादा शबे ग़म काट चुका हूँ
    तुम अब भी जो आ जाओ तो ये रात बडी है
    जिस पे जो गुजरे मुक़द्दर उस का
    मरने वालों ने तो मर जाना है
    बाप अमीर हो सामाजिक हो तो अपना समाज और पैसा विरासत में अपने बच्चों को दे जाता है !! गरीब हो तो अपना क़र्ज़ और अपनी दरिद्रता दे जाता है ” मरने वाले को तो मर जाना है ….
    परसूँ गिद्धेश+ ने भी सोचा था
    “आज हर हद से गुजर जाना है”
    बगैर नाम बताये भी ये शेर किसी को सुनाया जाय तो तपाक से कह देगा कि नवीन का शेर है !! पौराणिक सन्दर्भं से बात निकालना एक ये भी विशेषता है नवेन में और मेरे देखे ये –संस्कार के परवरिश और संस्कृति का आदर है !! बाकी इस तरही की सबसे विशेष गिरह भी यही है !! मफ़्हूम ज़बर्दस्त है शेर का !!!
    ब्रज-गजल ऐसे न बिदराओ ‘नवीन’
    कल को अज़दाद के घर जाना है
    ब्रज गज़ल के लिये बहुत बडा काम आपने किया है और आपकी पुस्तक माइल स्टोन हो गई है इस दिशा में नवीन भाई !!!
    नवीन भाई !! बहुत उम्दा शेर कहे –बधाई !! –मयंक

  13. badhiya ghazal hai navin ji.. bahut mubarak

  14. अव्वल अव्वल उसी के चर्चे….
    क्यों न पहचानेगी ये दुनिया…..
    ये जो कलियाँ है न!……वाह…
    ख़ूब ग़ज़ल हुई है नवीन जी।
    दिली दाद क़ुबूल करें।
    सादर
    पूजा

Your Opinion is counted, please express yourself about this post. If not a registered member, only type your name in the space provided below comment box - do not type ur email id or web address.

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: