19 टिप्पणियाँ

T-22/41 जान जानी है जिगर जाना है-आयुष ‘चराग़’

जान जानी है जिगर जाना है
सारा सामाने सफ़र जाना है

रात तक शम्स उजाला तेरा
सब की आंखों से उतर जाना है

जंग अंजाम पे है यारों बस
‘आज हर हद से गुज़र जाना है’

अबके इलज़ाम वफादारी का
किस गुनहगार के सर जाना है

यूं भरा उसने मुझे बाँहो में
जैसे बाँहों में ही मर जाना है

वस्ल में रंग तेरे चेहरे का
आप ही आप निखर जाना है

आयुष ‘चराग़’ 09953925743

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19 comments on “T-22/41 जान जानी है जिगर जाना है-आयुष ‘चराग़’

  1. हाज़रीन सबसे पहले तो आप सब से माफ़ी का तलबगार हूँ कि इतने दिनों बाद मैं आप सब से मुखातिब हो रहा हूँ। दरअसल मैंने आपकी टिप्पणियां आज ही पढ़ीं क्योंकि मुझे इल्म नहीं था कि यहाँ आप सब हज़रात टिप्पणियां भी पोस्ट करते हैं।
    और अब मैं आप सब की दाद क़ुबूल करता हूँ , बहुत शुक्रिया आपकी हिम्मत और हौसला अफ़ज़ाई का।

  2. वाह…साहब।
    क्‍या ख़ूब ग़ज़ल कही है।
    ये शे’र

    यूं भरा उसने मुझे बाँहो में
    जैसे बाँहों में ही मर जाना है

    शायद ताउम्र याद रहेगा।

    दाद दिल से सर।

  3. khoobsoorat gazal Charaag sahab

    dher sari daad

    Alok

  4. यूं भरा उसने मुझे बाँहो में
    जैसे बाँहों में ही मर जाना है

    Matla aur ye she’r khoob hain..Umdaa ghazal
    -Kanha

  5. Bahut khooobsurat gazal hui hai charag sahab….har sher kamyaab hai…dheron daad…

  6. चराग़ साहब !! आपके अशआर नशिस्त को रौशन कर रहे हैं !!
    जान जानी है जिगर जाना है
    सारा सामाने सफ़र जाना है
    मजबूत और् असरदार कहन !! और सानी मिसरे ने तसव्वुफ की बेहतरीन रंगत दी है ख्याल को !! एक शेर “दाग़” साहब का है — होशो हवास ताबो तुवाँ दाग़ खो चुके
    अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया –मिर्ज़ा दाग़ देहलवी
    रात तक शम्स उजाला तेरा
    सब की आंखों से उतर जाना है
    ये घटना तो शाम ढले ही हो जाती है रात तो परवरदिगारे शब की यानी चाँद की है उसकी नशिस्त में कई सितारे चमचई करते हैं –लेकिन ये सब मिलकर सिर्फ रात का ही सिंगार करते हैं !!
    जंग अंजाम पे है यारों बस
    ‘आज हर हद से गुज़र जाना है’
    अच्छी गिरह लगाई है क्योंकि तरही मिसरे का मूल स्वर जंग का शहादत का कुर्बानी का ही है !!!
    अबके इलज़ाम वफादारी का
    किस गुनहगार के सर जाना है
    केजरीवाल के सर पर और किसके !!??
    यूं भरा उसने मुझे बाँहो में
    जैसे बाँहों में ही मर जाना है
    उम्दा शेर है वाकई बहुत सुन्दर !! क्या बात है लेकिन भाई एक बात ध्यान रखियेगा इस शेर का एक पहलू और है आप धृतराष्ट्रों के प्राणघाती आलिंगन से बचे रहियेगा !!
    वस्ल में रंग तेरे चेहरे का
    आप ही आप निखर जाना है
    चेहरे का ही क्या अन्य स्थानो का भी रंग बदल जायेगा !! But the face is index of mind इसलिये सबसे सुन्दर जगह आपने तलाश ली है !!
    आयुष ‘चराग़’ भाई तकल्लुफ बरतरफ !! मैं ज़ियादा खुल गया हूँ तो दिल पर असर मत लीजियेगा आपकी ग़ज़ल 24 कैरेट की है बिलाशक और मुझे इस कहन ने बहुत बहुत प्रभावित किया है – बहुत बहुत बधाई –मयंक

  7. Charag sahab bahut khubsurat gazal hui
    Daad kubul kijiye

  8. चराग़ साहब मतला ता आखिर रौशन ग़ज़ल है.. दाद क़ुबूलें..

  9. अच्छी ग़ज़ल हुई है ज़नाब दाद क़ुबूल करें
    सादर
    पूजा

  10. Waah ! Bahut khub ashaar huye hai Ayush ji….har sher damdar or khubsurat hai. Matla or Girah bhi purasar hai…. Dil se badhai is Gazal ke liye ….

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